भारत को DAP के लिए चुकानी पड़ सकती है भारी कीमत, खरीफ सीजन से पहले बड़ा झटका

DAP यानी डाय-अमोनियम फॉस्फेट देश में सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाले उर्वरकों में से एक है. धान, मक्का, सोयाबीन और कई दूसरी फसलों की बुवाई के दौरान किसान इसका बड़े पैमाने पर उपयोग करते हैं. खासकर खरीफ सीजन से पहले इसकी मांग तेजी से बढ़ जाती है. ऐसे समय में अंतरराष्ट्रीय कीमतों में बढ़ोतरी भारत के लिए बड़ी चुनौती बन सकती है.

Kisan India
नई दिल्ली | Updated On: 9 May, 2026 | 07:15 AM

DAP fertilizer price: देश में खरीफ सीजन की तैयारी शुरू हो चुकी है और इसी बीच DAP खाद की बढ़ती कीमतों ने सरकार और किसानों दोनों की चिंता बढ़ा दी है. ताजा अंतरराष्ट्रीय टेंडर में भारत को DAP उर्वरक के लिए 930 डॉलर से लेकर 1100 डॉलर प्रति टन तक के महंगे ऑफर मिले हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि पश्चिम एशिया में जारी तनाव और ईरान युद्ध की वजह से उर्वरकों की वैश्विक सप्लाई और कीमतों पर बड़ा असर पड़ रहा है.

भारतीय पोटाश लिमिटेड की ओर से आयोजित इस टेंडर में दुनिया की 18 कंपनियों ने हिस्सा लिया. कुल मिलाकर करीब 23 लाख टन DAP की पेशकश की गई, जो भारत की मांग से लगभग दोगुनी बताई जा रही है. हालांकि ऊंची कीमतों ने सरकार की चिंता बढ़ा दी है क्योंकि भारत में किसानों को DAP सब्सिडी पर उपलब्ध कराया जाता है.

क्यों बढ़ रही है DAP खाद की कीमत?

बिजनेस लाइन की खबर के अनुसार, पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव का असर अब खाद बाजार पर साफ दिखाई देने लगा है. DAP खाद बनाने में सल्फर की बड़ी भूमिका होती है और दुनिया की लगभग आधी सल्फर सप्लाई उन देशों से आती है जो होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास स्थित हैं. अगर इस समुद्री मार्ग में किसी तरह की रुकावट आती है तो वैश्विक सप्लाई प्रभावित हो सकती है. यही वजह है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में सल्फर की कीमतें तेजी से बढ़ रही हैं.

रिपोर्ट के अनुसार सल्फर की कीमतें 2013 के बाद सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गई हैं. वहीं भारत तक DAP पहुंचाने की लागत भी ईरान युद्ध शुरू होने के बाद 30 प्रतिशत से ज्यादा बढ़ चुकी है.

भारत के लिए क्यों अहम है DAP?

DAP यानी डाय-अमोनियम फॉस्फेट देश में सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाले उर्वरकों में से एक है. धान, मक्का, सोयाबीन और कई दूसरी फसलों की बुवाई के दौरान किसान इसका बड़े पैमाने पर उपयोग करते हैं. खासकर खरीफ सीजन से पहले इसकी मांग तेजी से बढ़ जाती है. ऐसे समय में अंतरराष्ट्रीय कीमतों में बढ़ोतरी भारत के लिए बड़ी चुनौती बन सकती है क्योंकि देश अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है.

किसानों पर कितना असर पड़ेगा?

विशेषज्ञों का कहना है कि फिलहाल किसानों पर सीधे कीमतों का ज्यादा असर नहीं पड़ सकता क्योंकि सरकार DAP पर भारी सब्सिडी देती है. यानी अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें बढ़ने के बावजूद किसानों को खाद कम कीमत पर मिलती रहेगी. लेकिन इससे सरकार पर सब्सिडी का बोझ काफी बढ़ सकता है.

ब्लूमबर्ग इंटेलिजेंस की वरिष्ठ विश्लेषक एलेक्सिस मैक्सवेल के अनुसार सरकार पहले भी बढ़ी हुई सब्सिडी का बोझ उठाती रही है और इस बार भी ऐसा किया जा सकता है.

सरकार के सामने बढ़ी चुनौती

भारत सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह है कि किसानों को समय पर पर्याप्त मात्रा में खाद उपलब्ध कराई जाए. अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें लगातार बढ़ती रहीं तो सरकार का खर्च काफी बढ़ सकता है. ऐसे में सब्सिडी प्रबंधन और आयात व्यवस्था दोनों पर दबाव बढ़ने की आशंका है.

रिपोर्ट का मानना है कि अगर होर्मुज जलडमरूमध्य में हालात लंबे समय तक खराब रहते हैं तो जुलाई और अगस्त में खाद की सप्लाई और महंगी हो सकती है.

यूरिया की कीमतों में भी बड़ा उछाल

सिर्फ DAP ही नहीं, बल्कि यूरिया की कीमतों में भी तेजी देखने को मिल रही है. हाल ही में भारत ने 25 लाख टन यूरिया की खरीद की है और इसके लिए युद्ध से पहले की तुलना में लगभग दोगुनी कीमत चुकानी पड़ी. इससे साफ संकेत मिल रहे हैं कि वैश्विक तनाव का असर कृषि क्षेत्र पर भी गहराने लगा है.

खरीफ सीजन से पहले बढ़ी चिंता

यह पूरा घटनाक्रम ऐसे समय पर सामने आया है जब देश में खरीफ फसलों की तैयारी शुरू होने वाली है. धान, मक्का और सोयाबीन जैसी फसलों की बुवाई मानसून के साथ शुरू होती है और इस दौरान खाद की मांग काफी बढ़ जाती है. अगर सप्लाई प्रभावित होती है तो खेती की लागत बढ़ सकती है. हालांकि सरकार लगातार स्थिति पर नजर बनाए हुए है और खाद उपलब्धता सुनिश्चित करने की कोशिश कर रही है.

अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्या हो रहा?

वैश्विक स्तर पर इस समय खाद बाजार में अस्थिरता बढ़ी हुई है. विशेषज्ञों का कहना है कि पश्चिम एशिया में युद्ध, समुद्री मार्गों पर खतरा और कच्चे माल की कमी ने उर्वरक उद्योग की चिंता बढ़ा दी है. कई देशों में पहले से ही खाद की कीमतें बढ़ रही हैं और इसका असर दुनिया के बड़े आयातक देशों पर पड़ रहा है. भारत भी उन्हीं देशों में शामिल है.

किसानों के लिए क्या जरूरी?

कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि किसानों को फिलहाल घबराने की जरूरत नहीं है, लेकिन खाद का उपयोग संतुलित तरीके से करना जरूरी है. मिट्टी परीक्षण के आधार पर उर्वरकों का इस्तेमाल करने से लागत कम की जा सकती है और उत्पादन भी बेहतर हो सकता है. इसके अलावा जैविक और वैकल्पिक उर्वरकों के उपयोग पर भी जोर दिया जा रहा है.

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Published: 9 May, 2026 | 07:13 AM
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