सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया है. इस याचिका में कहा गया है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) तय करते समय खेती की पूरी लागत यानी C2 को सही तरीके से शामिल किया जाए, ताकि किसानों को उनकी असली लागत के अनुसार उचित कीमत मिल सके. मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की बेंच ने अधिवक्ता प्रशांत भूषण की दलीलें सुनीं. उन्होंने कहा कि यह मुद्दा देशभर के किसानों के लिए बेहद अहम है, क्योंकि किसानों की आत्महत्या और खरीद व्यवस्था की कमियां गंभीर चिंता का विषय हैं.
उन्होंने यह भी बताया कि कई बार MSP खेती की पूरी लागत से भी कम तय किया जाता है. साथ ही MSP पर खरीद मुख्य रूप से गेहूं और चावल तक सीमित रहती है, जबकि बाकी फसलों के किसान आर्थिक संकट में रहते हैं. अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने स्पष्ट किया कि याचिका में लागत पर 50 फीसदी लाभ देने की मांग नहीं की गई है, बल्कि केवल खेती की वास्तविक लागत (C2) देने की बात कही गई है. उन्होंने कहा कि ये लागत सरकार खुद पहले से ही निकालती है, इसलिए किसानों को कम से कम उनकी पूरी उत्पादन लागत वापस मिलनी चाहिए. उन्होंने यह भी तर्क दिया कि मुफ्त राशन जैसी कल्याणकारी योजनाओं का खर्च किसानों को उनकी फसल की सही कीमत न देकर पूरा नहीं किया जाना चाहिए.
सुनवाई के दौरान क्या बोले मुख्य न्यायाधीश
‘लाइव लॉ’ की रिपोर्ट के मुताबिक, सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि खेती की लागत तय करने में कई कठिनाइयां आती हैं, खासकर जमीन और पूंजी जैसी लागतों का आकलन अलग-अलग राज्यों में अलग हो सकता है. न्यायमूर्ति बागची ने टिप्पणी की कि ऐसी मांगों को मानने का मतलब होगा कि अदालत को आर्थिक नीति को दोबारा लिखना पड़ेगा. इस पर अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने कहा कि सरकार अगर मुफ्त राशन दे रही है तो यह ठीक है, लेकिन इसका असर किसानों पर ऐसा नहीं होना चाहिए कि उन्हें अपनी फसल की लागत भी न मिल पाए, जिससे वे आत्महत्या करने को मजबूर हों.
इन किसानों ने दाखिल की पीएलआई
यह याचिका महाराष्ट्र के तीन किसानों- प्रकाश गोपालराव पोहरे, पुरुषोत्तम गावडे और विशाल ओमप्रकाश रावत ने संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत दाखिल की है. इसमें मांग की गई है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) को कम से कम उत्पादन की वास्तविक औसत लागत (C2) के आधार पर तय किया जाए और उसी कीमत पर फसलों की खरीद सुनिश्चित की जाए. याचिकाकर्ताओं का कहना है कि देश के किसान गंभीर आर्थिक संकट से गुजर रहे हैं, क्योंकि उन्हें कई बार अपनी फसल लागत मूल्य पर भी नहीं बेच पाते, जिससे बड़ी परेशानी और आत्महत्या जैसी घटनाएं बढ़ रही हैं.
17,000 से ज्यादा किसानों ने आत्महत्या की
याचिका में यह भी बताया गया है कि पिछले पांच वर्षों में सिर्फ महाराष्ट्र में ही 17,000 से ज्यादा किसानों ने आत्महत्या की है. याचिका में बताया गया है कि खेती की पूरी लागत (C2) में केवल बीज, खाद और मजदूरी ही नहीं, बल्कि परिवार के श्रम का मूल्य, अपनी जमीन का किराया, किराए पर ली गई जमीन का खर्च और खेती के लिए लिए गए कर्ज पर ब्याज भी शामिल होता है.
A2+FL पर आधारित है मौजूदा MSP
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि मौजूदा MSP तय करने का तरीका मुख्य रूप से A2+FL पर आधारित है, जिसमें भुगतान की गई लागत और पारिवारिक श्रम को शामिल किया जाता है, लेकिन जमीन और पूंजी जैसी अहम लागतों को नहीं जोड़ा जाता. इससे किसानों की असली लागत कम दिखाई जाती है. यह भी कहा गया है कि MSP पर खरीद मुख्य रूप से गेहूं और चावल तक सीमित है, जबकि बाकी फसलों की खरीद बहुत कम होती है, जिससे किसानों को नुकसान होता है. याचिका में यह भी चिंता जताई गई है कि गेहूं और चावल के सस्ते वितरण से बाजार में असंतुलन पैदा होता है और बाजरा जैसी फसलों की मांग कम हो जाती है. इसीलिए मांग की गई है कि MSP को C2 लागत के अनुसार तय किया जाए और ऐसी व्यवस्था बनाई जाए जिससे किसानों से उनकी फसल तय कीमत पर खरीदी जा सके.