मुफ्त राशन योजना में लोगों को अच्छी क्वालिटी का चावल दिया जाएगा. केंद्र सरकार ने राशन वितरण में क्वालिटी मानकों में बदलाव करते हुए टूटे चावल की मात्रा को 15 फीसदी तक घटा दिया है. यानी अब लोगों को साबुत चावल की सप्लाई बढ़ाई जाएगी. वहीं, टूटे चावल का औद्योगिक इस्तेमाल बढ़ेगा और इथेनॉल बनाने में इसकी सप्लाई बढ़ाई जाएगी. वहीं, केंद्र सरकार को इन बदलावों से सालाना लगभग 2161 करोड़ रुपए की बचत होगी.
30 साल में पहली बार चावल क्वालिटी मानक बदले
आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति (CCEA) ने प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना (PMGKAY) और अन्य कल्याणकारी योजनाओं के तहत वितरित किए जाने वाले चावल की गुणवत्ता में सुधार के लिए बड़ा फैसला लिया है. करीब 30 वर्षों में पहली बार सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) के तहत दिए जाने वाले चावल के गुणवत्ता मानकों में संशोधन किया गया है. इससे 80 करोड़ से अधिक लाभार्थियों को पहले की तुलना में कम टूटे दानों वाला बेहतर गुणवत्ता का चावल मिलेगा. लाभार्थियों की राशन पात्रता में कोई बदलाव नहीं किया गया है.
टूटे दानों की सीमा में 15 फीसदी घटाकर 10 फीसदी की गई
सरकार के फैसले के अनुसार पीएमजीकेएवाई के तहत दिए जाने वाले कच्चे चावल में टूटे दानों की अधिकतम सीमा 25 फीसदी से घटाकर 10 फीसदी कर दी गई है. वहीं, उसना चावल में यह सीमा 16 फीसदी से घटाकर 5 फीसदी कर दी गई है. बेहतर गुणवत्ता वाले चावल की खरीद तत्काल प्रभाव से शुरू होगी और इसे खरीफ मार्केटिंग सीजन 2027-28 तक सभी खरीद करने वाले राज्यों में चरणबद्ध तरीके से इस व्यवस्था को लागू किया जाएगा. वितरण भी चरणबद्ध तरीके से किया जाएगा, ताकि सभी राज्यों में नई व्यवस्था सुचारू रूप से लागू हो सके.
टूटे चावल का औद्योगिक इस्तेमाल बढ़ेगा
सरकार ने कहा कि इस फैसले का उद्देश्य केवल खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करना नहीं, बल्कि लाभार्थियों को बेहतर गुणवत्ता वाला, अधिक साबुत और देखने में बेहतर चावल उपलब्ध कराना भी है. नई व्यवस्था के तहत राशन की मात्रा में कोई बदलाव नहीं होगा, लेकिन गुणवत्ता में उल्लेखनीय सुधार होगा.नई व्यवस्था के तहत चावल की कुटाई के दौरान निकलने वाले टूटे चावल को अलग कर उसका औद्योगिक और अन्य उत्पादक कार्यों में उपयोग किया जाएगा. इसे इथेनॉल बनाने में सप्लाई किए जाने की बात कही जा रही है.
सालाना 2161 करोड़ रुपए की होगी बचत
सरकार के अनुसार इस सुधार से परिवहन, भंडारण और रखरखाव की लागत में कमी आएगी. टूटे चावल की नीलामी सीधे चावल मिलों से की जाएगी. इसके अलावा जूट के बोरों के स्थान पर एचडीपीई बैग के उपयोग से पैकेजिंग लागत भी घटेगी. इन उपायों से सरकार को हर वर्ष लगभग 2161 करोड़ रुपए की बचत होने का अनुमान है. साथ ही टूटे चावल की बिक्री से अतिरिक्त राजस्व भी प्राप्त होगा, जिससे खाद्य सब्सिडी का बोझ कम होगा.
कई राज्यों में सफल रहा पायलट प्रोजेक्ट
इस व्यवस्था का हरियाणा, आंध्र प्रदेश, पंजाब, ओडिशा, तेलंगाना और छत्तीसगढ़ में पायलट आधार पर सफल परीक्षण किया जा चुका है. सरकार का कहना है कि इससे बड़े पैमाने पर बेहतर गुणवत्ता वाले चावल का उत्पादन और वितरण परिचालन की दृष्टि से पूरी तरह संभव साबित हुआ है.