चीनी संकट के पीछे कई फैक्टर, एक्सपर्ट ने गन्ना क्वालिटी, चीनी रिकवरी समेत कई बिंदुओं को वजह माना

Expert Perspective on the Sugar Crisis: नेशनल शुगर इंस्टीट्यूट कानपुर के पूर्व निदेशक प्रोफेसर नरेंद्र मोहन और सबौर कृषि विश्वविद्यालय के गन्ना विशेषज्ञ डॉ. हरिओम ने कहा कि चीनी में जो तेजी देखने को मिली है, उसके लिए कई कारक जिम्मेदार हैं, सीधे तौर पर एथेनॉल उत्पादन को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता.

Kisan India
नोएडा | Updated On: 23 Aug, 2026 | 06:28 PM

देशभर में चीनी की कीमतों में आई तेजी को लेकर चल रही बहस के बीच कृषि और चीनी उद्योग से जुड़े विशेषज्ञों ने स्पष्ट किया है कि इसकी मुख्य वजह चीनी को इथेनॉल उत्पादन के लिए डायवर्ट करना नहीं, बल्कि गन्ने के उत्पादन और चीनी रिकवरी में आई कमी है. उनका कहना है कि सरकार चीनी, इथेनॉल और निर्यात के बीच संतुलन बनाए रखने के लिए लगातार निगरानी करती है और उपभोक्ताओं की जरूरत को प्राथमिकता दी जाती है.

चीनी में तेजी की कई वजहें, अकेले इथेनॉल जिम्मेदार नहीं

नेशनल शुगर इंस्टीट्यूट कानपुर के पूर्व निदेशक प्रोफेसर नरेंद्र मोहन ने न्यूज एजेंसी आईएएनएस को बताया कि हाल के दिनों में चीनी की कीमतों में जो तेजी देखने को मिली है, वह कुछ हद तक अप्रत्याशित जरूर है, लेकिन इसके लिए सीधे तौर पर एथेनॉल उत्पादन को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता. उन्होंने कहा कि सरकार हर साल चीनी उत्पादन का आकलन करते समय यह सुनिश्चित करती है कि देश की घरेलू जरूरतों के लिए पर्याप्त चीनी उपलब्ध रहे. उन्होंने कहा कि देश में सालाना करीब 280 लाख टन चीनी की जरूरत होती है. इसके बाद ही अतिरिक्त चीनी को एथेनॉल उत्पादन या निर्यात के लिए अनुमति दी जाती है. उन्होंने बताया कि चालू वर्ष में लगभग 31 लाख टन चीनी के बराबर मात्रा का उपयोग एथेनॉल उत्पादन में किया गया, जबकि करीब 7 लाख टन चीनी का निर्यात भी हुआ. इसके बावजूद देश में पर्याप्त बफर स्टॉक मौजूद है.

प्रोफेसर नरेंद्र मोहन ने कहा कि इस वर्ष देश में करीब 306 लाख टन चीनी का उत्पादन हुआ है और इसके अलावा पिछले वर्ष का कैरी-ओवर स्टॉक भी उपलब्ध था. सामान्य परिस्थितियों में भारत के पास 50 लाख टन या उससे अधिक का बफर स्टॉक रहता है, ताकि किसी भी स्थिति में बाजार में आपूर्ति प्रभावित न हो. ऐसे में केवल एथेनॉल डायवर्जन को चीनी महंगी होने का कारण बताना उचित नहीं होगा. उन्होंने कहा कि भारतीय चीनी उद्योग के लिए एथेनॉल एक ‘गेम चेंजर” साबित हुआ है. पहले जब देश में चीनी का उत्पादन जरूरत से कहीं अधिक हो जाता था, तब बाजार में कीमतें गिर जाती थीं और चीनी मिलों को नुकसान उठाना पड़ता था, जिसका सीधा असर किसानों के भुगतान पर पड़ता था.

उन्होंने बताया कि पहले अतिरिक्त चीनी को निर्यात करने का विकल्प था, लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्थितियों में बदलाव के चलते यह हमेशा लाभकारी नहीं रहता था. ऐसे में सरकार ने अतिरिक्त चीनी को इथेनॉल उत्पादन में उपयोग करने की नीति अपनाई, जिससे न केवल चीनी उद्योग को स्थिरता मिली, बल्कि ऊर्जा सुरक्षा, पेट्रोलियम आयात में कमी और स्वच्छ ईंधन को बढ़ावा देने जैसे कई लाभ हुए. उन्होंने कहा कि सरकार लगातार उत्पादन की स्थिति की समीक्षा करती है और उसी के अनुसार तय करती है कि कितनी चीनी इथेनॉल के लिए डायवर्ट की जा सकती है. यदि उत्पादन कम होने की आशंका होती है, तो सरकार डायवर्जन और निर्यात दोनों पर नियंत्रण कर सकती है.

बीएयू के गन्ना विशेषज्ञ ने गन्ना क्वालिटी पर जताई चिंता

बिहार कृषि विश्वविद्यालय (बीएयू) सबौर के गन्ना शोध विभाग के कृषि वैज्ञानिक डॉ. हरिओम ने आईएएनएस से कहा कि मौजूदा स्थिति की एक बड़ी वजह गुणवत्तापूर्ण गन्ना उत्पादन में कमी भी है. उन्होंने बताया कि महाराष्ट्र और तमिलनाडु जैसे राज्यों में गन्ने की फसल की अवधि अधिक होने के कारण वहां चीनी रिकवरी भी ज्यादा होती है, जबकि उत्तर भारत में अपेक्षाकृत कम अवधि में गन्ने की कटाई और पेराई हो जाती है. उन्होंने कहा कि फिलहाल उत्तर भारत में गन्ना पेराई का ‘लीन सीजन” चल रहा है. जैसे ही कटाई और पेराई का मुख्य सीजन शुरू होगा, चीनी उत्पादन में वृद्धि होगी और बाजार में आपूर्ति बेहतर होने से कीमतों पर दबाव कम हो सकता है.

चीनी रिकवरी के लिए फसल का समय काफी अहम

डॉ. हरिओम ने आगे बताया कि उत्तर भारत में ज्यादातर किसान अप्रैल-मई के दौरान गन्ने की बुआई करते हैं और लगभग 10 से 11 महीने में फसल तैयार हो जाती है. इसके विपरीत महाराष्ट्र में किसान अक्टूबर-नवंबर में गन्ना लगाते हैं और फसल को 13 से 14 महीने तक खेत में रहने देते हैं. इस लंबी अवधि के कारण गन्ने में चीनी संचय अधिक होता है और रिकवरी बेहतर मिलती है. उन्होंने बताया कि तमिलनाडु में गन्ना जुलाई-अगस्त के दौरान लगाया जाता है और इसकी फसल अवधि 18 महीने तक पहुंच जाती है. यही वजह है कि तमिलनाडु में प्रति हेक्टेयर उत्पादकता देश में सबसे अधिक मानी जाती है. वहीं, महाराष्ट्र में चीनी रिकवरी लगभग 13-14 फीसदी तक पहुंच जाती है, जो देश में सबसे बेहतर स्तरों में शामिल है.

डॉ. हरिओम ने कहा कि उत्तर भारत के किसान यदि धान की कटाई के बाद अक्टूबर-नवंबर में गन्ने की खेती शुरू करें और उसके साथ अंतरवर्ती फसलें जैसे गेहूं, सरसों, मसूर चना या सब्जियां लगाएं, तो उन्हें अतिरिक्त आय मिल सकती है और गन्ने की गुणवत्ता में भी सुधार हो सकता है. उन्होंने बताया कि बिहार कृषि विश्वविद्यालय द्वारा किए गए शोध में पाया गया कि गन्ने के साथ लौकी, करेला, नेनुआ, भिंडी, मूंग और अन्य फसलें उगाने से गन्ने के उत्पादन पर कोई नकारात्मक असर नहीं पड़ता. इसके विपरीत किसानों को अतिरिक्त उत्पादन और आय का लाभ मिलता है.

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Published: 23 Aug, 2026 | 06:26 PM

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