Navratri Special: व्रत का साबूदाना दिखता जितना सादा, असल में उतनी ही चौंकाने वाली है इसकी कहानी! जानें
Sabudana Kaise Banta Hai: क्या आपने कभी सोचा है कि नवरात्रि के व्रत में खाया जाने वाला छोटा-सा सफेद साबूदाना आखिर बनता कैसे है? देखने में साधारण लगने वाला यह दाना दरअसल एक लंबी और दिलचस्प प्रक्रिया का नतीजा होता है. खासकर नवरात्रि में इसका खूब इस्तेमाल होता है, लेकिन इसकी असली कहानी बहुत कम लोग जानते हैं. खेत में उगने वाले कसावा पौधे की जड़ों से लेकर चमकदार मोतियों में बदलने तक, साबूदाना कई चरणों से गुजरता है… आइए जानते हैं इसकी पूरी सच्चाई.

साबूदाना सीधे किसी अनाज से नहीं, बल्कि कसावा (टैपिओका) नाम के पौधे की जड़ों से बनाया जाता है. इन जड़ों में स्टार्च की मात्रा बहुत अधिक होती है, जो साबूदाना बनाने की सबसे अहम सामग्री होती है.

कसावा की जड़ें जल्दी तैयार नहीं होतीं, बल्कि इन्हें पूरी तरह विकसित होने में करीब 8 से 24 महीने लगते हैं. इसके बाद ही इन्हें खेत से निकालकर प्रोसेसिंग के लिए भेजा जाता है.

जड़ों को निकालने के बाद सबसे पहले उन्हें अच्छी तरह धोया जाता है, ताकि मिट्टी, धूल और बाकी अशुद्धियां पूरी तरह हट जाएं. यह स्टेप बहुत जरूरी होता है, क्योंकि इससे साबूदाना की गुणवत्ता तय होती है.

साफ की गई जड़ों को मशीनों की मदद से पीसकर एक गाढ़ा पेस्ट या गूदा तैयार किया जाता है. इस गूदे में पानी और स्टार्च का मिश्रण होता है, जो आगे साबूदाना बनाने का बेस बनता है.

इस गूदे को छानकर उसमें से शुद्ध स्टार्च अलग किया जाता है. फिर इसी स्टार्च को छोटे-छोटे गोल मोतियों का रूप दिया जाता है, जो देखने में साबूदाने जैसे सफेद दाने बन जाते हैं.

आखिर में इन छोटे-छोटे दानों को सुखाया जाता है और पॉलिश किया जाता है, ताकि वे साफ, चमकदार और खाने लायक बन जाएं. इसके बाद यही साबूदाना व्रत में खाया जाने वाला हल्का, पचने में आसान और ऊर्जा देने वाला भोजन बन जाता है.
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