डिजिटल विटीकल्चर से अंगूर की खेती बढ़ा देगी मुनाफा, किसान जान लें तकनीक

डिजिटल विटीकल्चर तकनीक ने अंगूर की खेती में उत्पादन और लाभ को बढ़ा दिया है. किसानों को जल प्रबंधन, कीट और रोग नियंत्रण में मदद मिलने के साथ क्वालिटी सुधार में भी मदद मिल रही है. आईसीएआर ने भी मॉडल विकसित किया है.

Kisan India
Noida | Published: 23 Mar, 2025 | 06:24 PM

अंगूर की खेती भारतीय किसानों के लिए एक प्रमुख व्यवसाय रही है, लेकिन आज के दौर में इसे काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है. जलवायु परिवर्तन, पानी की कमी और कीट-पतंगों की समस्या किसानों के लिए दिन पर दिन और भी चैलेंजिंग होते जा रही है. ऐसे में डिजिटल विटीकल्चर तकनीक के माध्यम से अंगूर की खेती को एक नई दिशा मिली है. यह न केवल खेती को आसान बनाता है, बल्कि किसानों को ज्यादा मुनाफा कमाने में भी मदद करता है. तो आइए जानते हैं डिजिटल विटीकल्चर की मदद से अंगूर की खेती कैसे की जाती है और इसके फायदे क्या हैं.

स्मार्ट खेती का नाम है डिजिटल विटीकल्चर

डिजिटल विटीकल्चर स्मार्ट खेती का तरीका है जिसमें नई तकनीकों का इस्तेमाल किया जाता है. इस तकनीक में IoT सेंसर, ड्रोन, सैटेलाइट इमेज और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) जैसी मॉडर्न तकनीक के इस्तेमाल से उपज बढ़ाने में मदद मिलती है. यह तकनीक किसानों को अपने बागों की निगरानी करने, जल प्रबंधन में सुधार करने और पौधों के स्वास्थ्य का सटीक आकलन करने में मदद करता हैं. IoT सेंसर मिट्टी की नमी, तापमान और वर्षा जैसे आंकड़े को इकट्ठा करता है. तो वहीं ड्रोन की मदद से किसान अपने बगान का निरीक्षण कर सकते हैं. जिससे किसान समय रहते पौधों की स्थिति ,कीटों की समस्या और पोषक तत्वों की कमी की जानकारी पा सकते हैं. इसके साथ ही AI के जरिए, जो भी डेटा इकट्ठा किया जाता है, उसका विश्लेषण कर किसानों को यह जानकारी दी जाती है कि उनकी फसल का स्वास्थ्य कैसा है, कौन सी बीमारियां हो सकती हैं, और उपज का अनुमान क्या है.

अंगूर की खेती का तरीका

अंगूर की खेती के लिए जल निकासी वाली दोमट या बलुई मिट्टी इस फसल के लिए सबसे अच्छी मानी जाती है. साथ ही इसकी खेती के लिए गर्म और नम जलवायु सबसे अच्छा माना जाता है. खाद का उपयोग मिट्टी की गुणवत्ता के हिसाब से करें. इसके लिए जैविक खाद (गोबर की खाद) का इस्तेमाल फायदेमंद रहता है. बता दें अंगूर की बेलों को बुवाई के पहले अच्छे से सिंचाई करने से  मिट्टी में नमी बनी रहती है. ध्यान रहें की पौधों के बीच कम से कम 2-3 मीटर की दूरी हो इसके बेलों को अधिक पानी की जरूरत नहीं होती है. इसके लिए ड्रिप इरिगेशन के प्रोसेस का उपयोग करना बेहतर होता है, क्योंकि यह पानी की खपत को कम कर, जड़ों तक पानी  आसानी से पहुंचाने में मदद करता हैं.

100 दिन में अंगूर की कटाई शुरू कर दें

अंगूर की कटाई आमतौर पर 100-120 दिन बाद की जाती है. इसकी कटाई तब करें जब फल पूरी तरह से रंग बदलने लगे और स्वाद में मिठास आ जाए. बता दें कि अगर फल सही समय पर नहीं तोड़ा जाए तो उनका स्वाद कम और खट्टा हो सकता हैं. डिजिटल विटीकल्चर तकनीक के जरिए अंगूर की खेती करना काफी आसान हो गया है. इससे किसानों को समय पर सिंचाई, उर्वरक और कीटनाशकों के छिड़काव की सटीक जानकारी मिल जाती है. इस तकनीक की मदद से उत्पादन बढ़ती है और लागत कम होती है. डिजिटल उपकरणों के माध्यम से किसान अपनी उपज का सही अनुमान लगा सकते हैं, जिससे वे अधिक कीमत पर अपनी फसल बेच सकते हैं.

ICAR ने डिजिटल विटीकल्चर मॉडल बनाया

भारत में डिजिटल विटीकल्चर तकनीक को अपनाने में धीरे-धीरे कदम बढ़ाए जा रहे हैं. ICAR-राष्ट्रीय अंगूर अनुसंधान केंद्र (NRCG) और कई विश्वविद्यालयों ने AI और मशीन लर्निंग आधारित निगरानी सिस्टम शुरू किए हैं. महाराष्ट्र के बड़े अंगूर बगानों में IoT और सटीक सिंचाई प्रॉसेस को अपनाया जा रहा है. इसके अलावा सरकार की डिजिटल इंडिया पहल के तहत AgriTech स्टार्टअप्स को बढ़ावा दिया जा रहा है, ताकि वे किसानों के लिए स्थानीय समाधान विकसित कर सकें.

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