इस विधि से करें खेतों की सिंचाई, किसानों की लागत घटेगी और पानी बचेगा

यह सिंचाई की एक ऐसी तकनीक है जिसमें पानी को पाइपलाइन की मदद से पंप किया जाता है. इसके बाद स्प्रिंलकर के जरिए बारिश की तरह पूरे खेत पर छिड़का जाता है

अनामिका अस्थाना
नोएडा | Updated On: 7 May, 2025 | 07:49 PM

किसानों की लहलहाती फसल और अच्छी उपज के लिए जिम्मेदार कई कारणों में से एक है खेत की सिंचाई. फसलों की गुणवत्ता और उपज इस बात पर भी निर्भर करता है कि फसलों के सही समय और उचित मात्रा में पानी दिया गया या नहीं. पर्याप्त पानी न मिल पाने के कारण फसल अकसर सूख जाता है. कई बार किसान पानी के अभाव के चलते भी फसलों में सही से सिंचाई नहीं कर पाते हैं. ऐसे में बहुत से ऐसी तकनीक हैं जिनके इस्तेमाल से कम पानी में भी फसलों को भरपूर मात्रा में पानी दिया जा सकता है. हम सिंचाई की ऐसी ही एक तकनीक के बारे में बात करेंगे जिसका नाम है स्प्रिंकलर सिंचाई.

क्या है स्प्रिंकलर सिंचाई

यह सिंचाई की एक ऐसी तकनीक है जिसमें पानी को पाइपलाइन की मदद से पंप किया जाता है. इसके बाद स्प्रिंलकर के जरिए बारिश की तरह पूरे खेत पर छिड़का जाता है. यह बारिश के फव्वारे की तरह खेतों पर गिरता है. इसको खेत में इस तरह से लगाया जाता है कि ये सारी फसलों पर बराबर मात्रा में पानी डाल सके. जिससे पौधों के विकास में मदद मिलता है.

क्या हैं इस विधि के फायदे

स्प्रिंलकर सिंचाई के माध्यम से फसलों पर समान रुप से पानी मिलता है. क्योंकि इस विधि से पानी केवल पौधों पर ही पड़ता है इसलिए इसके इस्तेमाल से पानी की खपत भी कम होती है. पारंपरिक सिंचाई की तुलना में इस विधि से सिंचाई करने में कम मेहनत और कम समय लगता है. स्प्रिंकलर सिंचाई फसलों को बीमारियों और कीटों से बचाने में भी मदद करती है, क्योंकि इसके द्वारा सिंचाई होने से पौधों की पत्तियां साफ रहती हैं. इसकी सबसे खास बात यह है कि इसका इस्तेमाल हर मौसम में किया जा सकता है.

स्प्रिंकलर सिंचाई के नुकसान

सिंचाई की इस विधि के अपने कुछ नुकसान भी हैं. स्प्रिंकलर सिंचाई के लिए ज्यादा बिजली की जरूरत होती है, साथ ही पंप और अन्य उपकरणों की भी जरूरत होती है. किसानों के लिहाज से इसे इस्तेमाल करना मुश्किल होता है क्योंकि इसमें लागत ज्यादा आती है. इसके रखरखाव का खास ध्यान रखना पड़ता है, जैसे स्प्रिंकलर को साफ करना, पाइपों की जांच करना और मरम्मत करना आदि. ध्यान देने वाली बात यह है कि इस विधि का इस्तेमाल रेतीली मिट्टी वाले इलाकों में नहीं करना चाहिए.

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Published: 7 May, 2025 | 07:49 PM
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