Paddy Cultivation: जब भी असम की चर्चा होती है, तो लोगों की जुबान पर सबसे पहले असम चाय का नाम आता है. लोगों को लगता है कि असम में केवल चाय की खेती की जाती है, लेकिन ऐसी बात नहीं है. असम में किसान बड़े स्तर पर धान की भी खेती करते हैं. यहां पर किसान अलग-अलग धान की किस्मों को उगाते हैं, जिसकी मांग विदेशों में बहुत है. इन किस्मों से एक है ‘जोहा चावल’ जिसे जीआई टैग भी मिला हुआ है. इसे असम में लोग पूरे चाव के साथ खाते हैं. अब विदेशों में भी इसकी सप्लाई शुरू हो गई है. हालांकि, समय के साथ-साथ इसका रकब बढ़ने के बजाए कम होते जा रहा है.
असम का प्रसिद्ध जोहा चावल अपनी खास खुशबू, बेहतरीन स्वाद और पोषण गुणों के लिए जाना जाता है. यह मुख्य रूप से असम और पूर्वोत्तर भारत में उगाई जाने वाली एक प्रीमियम सुगंधित चावल की किस्म है, जिसकी देश-विदेश में अच्छी मांग है. जोहा चावल को इसकी विशिष्ट पहचान के कारण भौगोलिक संकेतक (GI) टैग भी मिला हुआ है. इसकी सबसे बड़ी खासियत इसकी अनोखी सुगंध है, जो बासमती समेत अन्य सुगंधित चावलों से अलग मानी जाती है. इसके दाने छोटे से मध्यम आकार के होते हैं और पकने के बाद इसका स्वाद बेहद उम्दा होता है.
जोहा चावल की क्या है खासियत
स्वास्थ्य के लिहाज से भी जोहा चावल काफी फायदेमंद माना जाता है. इसमें एंटी-ऑक्सीडेंट, ओमेगा-3 और ओमेगा-6 फैटी एसिड के साथ-साथ सामान्य चावल की तुलना में अधिक प्रोटीन पाया जाता है. कुछ शोधों के अनुसार, यह रक्त शर्करा (ब्लड शुगर) को नियंत्रित करने में भी मदद कर सकता है. इसकी खेती मुख्य रूप से ब्रह्मपुत्र घाटी के उपजाऊ क्षेत्रों में की जाती है. जोहा चावल को ‘साली’ धान के रूप में उगाया जाता है और इसकी कटाई सर्दियों के मौसम में होती है. असम की संस्कृति में भी इसका विशेष महत्व है. बिहू जैसे त्योहारों, खीर, पुलाव, पीठा और विशेष अवसरों पर मेहमानों के स्वागत में इसका व्यापक उपयोग किया जाता है.
कितनी है जोहा चावल की पैदावार
ऐसे जोहा चावल की खेती मुख्य रूप से खरीफ (साली) सीजन में की जाती है. इसकी फसल तैयार होने में करीब 135 से 165 दिन का समय लगता है और नवंबर-दिसंबर में इसकी कटाई की जाती है. किसान इसकी खेती पारंपरिक तरीकों से करते हैं, जिसमें गोबर की खाद जैसे जैविक उर्वरकों का उपयोग अधिक होता है. हालांकि जोहा चावल की पैदावार अपेक्षाकृत कम है और औसतन लगभग 1 टन प्रति हेक्टेयर उत्पादन मिलता है, लेकिन इसकी खास सुगंध और गुणवत्ता के कारण बाजार में इसे बेहतर कीमत मिलती है. इसकी प्राकृतिक खुशबू बनाए रखने के लिए कटाई के बाद भी पारंपरिक बांस के बने कंटेनरों (लूम) में इसका भंडारण किया जाता है.
कितने हेक्टेयर में होती है जोहा चावल की खेती
असम का प्रसिद्ध सुगंधित जोहा चावल राज्य की महत्वपूर्ण पारंपरिक धान किस्मों में से एक है. यह कुल धान क्षेत्र के लगभग 5 प्रतिशत हिस्से में उगाया जाता है. कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार, जोहा चावल की खेती करीब 20,000 हेक्टेयर क्षेत्र में की जाती है, जिससे हर साल लगभग 30,000 मीट्रिक टन उत्पादन होता है. हालांकि इसकी पैदावार अन्य आधुनिक धान किस्मों की तुलना में कम है, लेकिन इसकी खास खुशबू, स्वाद और बेहतर बाजार मूल्य के कारण किसानों के बीच इसकी लोकप्रियता बनी हुई है. यही वजह है कि जोहा चावल आज भी असम की कृषि और सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है.
यूके और इटली में जोहा चावल का निर्यात
जोहा चावल की विदेशों में भी डिमांड है. इसी साल मार्च महीने में असम से जोहा चावल की पहली खेप यूनाइटेड किंगडम (यूके) और इटली के लिए रवाना की गई थी. यह निर्यात कृषि एवं प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (APEDA) और असम कृषि विभाग के सहयोग से किया गया था. करीब 25 मीट्रिक टन जोहा चावल की इस खेप को एपीडा की उस रणनीति के तहत निर्यात किया गया था, जिसका उद्देश्य जीआई टैग वाले उत्पादों के उत्पादकों और विदेशी खरीदारों के बीच सीधे व्यापारिक संबंध स्थापित करना है.
खबर से जुड़े महत्वपूर्ण आंकड़े
- जोहा चावल को साल 2017 में मिला जीआई टैग
- 25 टन जोहा चावल का विदेश में निर्यात
- 20,000 हेक्टेयर है जोहा चावल का रकबा
- 30,000 मीट्रिक टन है उत्पादन
- 135 दिनों में तैयार हो जाती है फसल