पूरी दुनिया में मशहूर है महाराष्ट्र की अंजीर, यूरोप में भी होती है सप्लाई.. जानें कब होती बुवाई और कटाई
पुरंदर अंजीर की खेती मुख्य रूप से सूखे और हल्के गर्म मौसम में होती है. इसकी खेती के लिए मिट्टी लाल-काली और अच्छी जल निकासी होनी चाहिए. यह GI-टैग वाली खास किस्म है. पौधे 5x5 मीटर की दूरी पर लगाए जाते हैं और एक बार लगाने के बाद 30-40 साल तक फल देते हैं.
Fig Farming: अंजीर का नाम सुनते ही लोगों के जेहन में खयाल आता है कि इसकी खेती अफगानिस्तान, तुर्की और ईरान में होती है, लेकिन ऐसी बात नहीं है. महाराष्ट्र में भी किसान अंजीर की बड़े स्तर पर खेती करते हैं. यहां से विदेशों तक में अंजीर की सप्लाई होती है. दरअसल, महाराष्ट्र के पुरंदर तहसील को अंजीर उत्पादन के लिए जाना जाता है. यही वजह है कि पुरंदर की अंजीर को जीआई टैग भी मिला है. इसके बाद से यूरोपीय देशों में इसकी मांग बढ़ गई है.
हालांकि, इस साल पुरंदर तहसील के अंजीर किसानों को मुश्किल मौसम का सामना करना पड़ा. पिछले दो महीनों में लगातार ठंड के कारण फलों का आकार, वजन और कुल पैदावार प्रभावित हुई है. असमय ठंड की वजह से अंजीर समय से पहले गिर रहे हैं, जिससे किसानों पर आर्थिक दबाव बढ़ गया है. यह फल देश के बड़े बाजारों में सप्लाई होता है और विदेश भी निर्यात किया जाता है.
अंजीर से बनने वाले उत्पादों के लिए मशहूर है पुरंदर
किसानों के अनुसार, पुरंदर तहसील अपने अंजीर से बनने वाले उत्पादों के लिए भी मशहूर है. इसलिए उत्पादन में कोई भी गिरावट सीधे ग्रामीण आय और बाजार स्थिरता को प्रभावित करती है. जाधववाड़ी स्थित फिग और कस्टर्ड एप्पल रिसर्च सेंटर के वैज्ञानिकों के अनुसार, फल के विकास के अहम चरण में न्यूनतम तापमान लगातार गिरने से फसल की सामान्य वृद्धि चक्र प्रभावित होता है.
1 एकड़ में करीब 160-170 पौधों की जरूरत होती है
पुरंदर अंजीर की खेती मुख्य रूप से सूखे और हल्के गर्म मौसम में होती है. इसकी खेती के लिए मिट्टी लाल-काली और अच्छी जल निकासी होनी चाहिए. यह GI-टैग वाली खास किस्म है. पौधे 5×5 मीटर की दूरी पर लगाए जाते हैं और एक बार लगाने के बाद 30-40 साल तक फल देते हैं. पुरंदर अंजीर की खेती के लिए कम पानी, गर्म और शुष्क मौसम उपयुक्त है. यह सूखे और अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में अच्छी तरह बढ़ता है. महाराष्ट्र में जून-जुलाई में पौधे 5×5 मीटर (लगभग 16×16 फीट) की दूरी पर लगाए जाते हैं, यानी 1 एकड़ में करीब 160-170 पौधों की जरूरत होती है.
4,300 टन से अधिक है उत्पादन
पौधे को कम पानी की जरूरत होती है, लेकिन फल आने के समय नमी जरूरी है. इसके लिए ड्रिप सिंचाई सबसे अच्छा है. ‘तांबेरा’ नामक रोग से बचाव के लिए फंगीसाइड का छिड़काव जरूरी है. कटाई-छंटाई (Pruning) समय-समय पर करें. खासकर बारिश के बाद, ताकि पौधे मजबूत रहें और अधिक उत्पादन मिले. किसान इसकी खेती से प्रति हेक्टेयर 5-6 लाख रुपये तक का मुनाफा कमा सकते हैं. अभी पुरंदर में अंजीर की खेती लगभग 600 हेक्टेयर में फैली हुई है और इसका वार्षिक उत्पादन 4,300 टन से अधिक है.
मौसम की मार का असर कम पड़ेगा
अंजीर की खेती महंगी होती है, जिसमें पौधे, ड्रिप इरिगेशन, उर्वरक, मजदूर और कीट नियंत्रण के खर्च शामिल हैं. इस सीजन में फसल कम होने की संभावना से किसानों को आर्थिक नुकसान होने की चिंता है. विशेषज्ञों ने किसानों को सलाह दी कि वे मिट्टी और पत्तियों की जांच, संतुलित पोषण प्रबंधन और मौसम के अनुकूल बगीचे की निगरानी जैसी जलवायु-सहिष्णु तकनीक अपनाएं. इससे मौसम की मार का असर कम पड़ेगा.
एक फल का वजन 40 से 60 ग्राम होता है
पुरंदर अंजीर को 2016 में GI टैग प्राप्त हुआ. इसमें 80 फीसदी से ज्यादा गूदा होता है और यह अक्टूबर से अप्रैल के बीच पकती है. ये प्रीमियम फल अब यूरोप और मध्य पूर्व में भी निर्यात किए जा रहे हैं. ये अंजीर घंटी जैसी आकार की होती है, वजन 40-60 ग्राम के बीच होता है. इसका स्वाद मीठा और मक्खन जैसा होता है और इसमें 18-22 Brix की मिठास होती है.
खबर से जुड़े जरूरी आंकड़े
- पुरंदर अंजीर को साल 2016 में मिला जीआई टैग
- जून-जुलाई में किसान करते हैं इसकी रोपाई
- एक फल का वजन 40-60 ग्राम के बीच होता है
- पुरंदर में अंजीर की खेती लगभग 600 हेक्टेयर में फैली हुई है
- इसका वार्षिक उत्पादन 4,300 टन से अधिक है
- विदेशों में होती है अंजीर की सप्लाई