सांगली की हल्दी जो बढ़ाए हर खाने का स्वाद, मई में शुरू करें बुवाई.. जानें खेती का वैज्ञानिक तरीका

सांगली की हल्दी अपनी औषधीय गुणों  के लिए जानी जाती है और यह महाराष्ट्र के कुल उत्पादन का लगभग 70 फीसदी हिस्सा देती है. राज्य में सांगली और परभणी हल्दी की प्रमुख खेती वाले जिले हैं. सरकारी आंकड़ों के अनुसार, महाराष्ट्र में करीब 11,300 हेक्टेयर में हल्दी की खेती होती है, जिससे हर साल लगभग 1,90,000 मीट्रिक टन उत्पादन होता है.

Kisan India
नोएडा | Published: 22 Mar, 2026 | 02:29 PM

Turmeric Farming: हल्दी एक ऐसा खाद्य पदार्थ है, जिसके बगैर हम स्वादिष्ट सब्जी और दाल की कल्पना भी नहीं कर सकते हैं. कई राज्यों में प्राकृतिक खेती के तहत हल्दी को बढ़ावा दिया जा रहा है. हिमाचल प्रदेश में तो सरकार हल्दी की एमएसपी पर सरकारी खरीदी भी कर रही है. ऐसे तेलंगाना, कर्नाटक, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र और ओडिशा देश के प्रमुख हल्दी उत्पादक राज्य हैं. ऐसे में किसान अगर हल्दी की खेती करते हैं, तो उन्हें अच्छी कमाई होगी. लेकिन हल्दी की बुवाई करने से पहले किसानों को सांगली हल्दी के बारे में जरूर जान लेना चाहिए, क्योंकि इसकी क्वालिटी काफी अच्छी होती है. इसे जीआई टैग भी मिला हुआ है. इसके चलते इसकी मांग भारत ही नहीं पूरी दुनिया में है.

दरअसल, सांगली हल्दी की खेती महाराष्ट्र के सांगली जिले में होती है. यह जिला हल्दी के उत्पादन और व्यापार  के लिए काफी प्रसिद्ध है. इसलिए इसे ‘हल्दी नगर’ कहा जाता है. यह शहर कृष्णा नदी के किनारे स्थित है और एशिया के सबसे बड़े हल्दी व्यापारिक केंद्रों में गिना जाता है. यहां 1900 के दशक से हल्दी की खेती हो रही है. सांगली की हल्दी अपनी बेहतरीन गुणवत्ता के लिए जानी जाती है और इसका उपयोग कई तरह के व्यंजनों और उत्पादों में किया जाता है.

साल 2018 में मिला जीआई टैग

साल 2018 में भारतीय पेटेंट कार्यालय ने महाराष्ट्र के सांगली की हल्दी को भौगोलिक संकेतक (GI) टैग दिया.  यहां के किसान लंबे समय से ‘सांगली की हल्दी’ को यह पहचान दिलाने की मांग कर रहे थे. यह फसल सांगली के किसानों के लिए बहुत महत्वपूर्ण है. माना जाता है कि करीब 200 साल पहले सांगली के किसानों ने हल्दी के उत्पादन और भंडारण का एक खास तरीका खोजा था. इसमें हल्दी को जमीन के नीचे गहराई में दबाकर रखा जाता था, जिससे उसमें ऑक्सीजन नहीं पहुंचती थी और वह जल्दी खराब नहीं होती थी. इस तकनीक से न सिर्फ उत्पादन बढ़ा, बल्कि हल्दी की गुणवत्ता और स्वाद भी बेहतर हुआ, जिससे यह पूरे भारत में मशहूर हो गई.

सांगली में करीब 1,40,000 मीट्रिक टन हल्दी का उत्पादन होता है

सांगली की हल्दी अपनी औषधीय गुणों  के लिए जानी जाती है और यह महाराष्ट्र के कुल उत्पादन का लगभग 70 फीसदी हिस्सा देती है. राज्य में सांगली और परभणी हल्दी की प्रमुख खेती वाले जिले हैं. सरकारी आंकड़ों के अनुसार, महाराष्ट्र में करीब 11,300 हेक्टेयर में हल्दी की खेती होती है, जिससे हर साल लगभग 1,90,000 मीट्रिक टन उत्पादन होता है. इसमें से अकेले सांगली में करीब 1,40,000 मीट्रिक टन हल्दी का उत्पादन होता है.

इससे हल्दी की गुणवत्ता और करक्यूमिन की मात्रा बढ़ती है

सांगली हल्दी की बुवाई अप्रैल से जुलाई के बीच होती है. इस क्षेत्र में कृष्णा और वारणा नदियों से अच्छी सिंचाई मिलती है, जो इस फसल के लिए जरूरी है. किसान जैविक खाद जैसे गोबर, नीम पेस्ट और फार्मयार्ड मैन्योर का उपयोग करते हैं. करीब 9 महीने बाद जब पत्ते पीले होकर सूखने लगते हैं, तब फसल तैयार होती है. खुदाई के बाद हल्दी को साफ कर अलग किया जाता है और फिर तांबे या मिट्टी के बर्तनों में उबाल या भाप दी जाती है. इससे हल्दी की गुणवत्ता और करक्यूमिन की मात्रा बढ़ती है. इसके बाद हल्दी को साफ जगह पर फैलाकर धूप में सुखाया जाता है.

इतने महीने में तैयार हो जाती है फसल

सांगली जिला उपजाऊ मिट्टी और सूखे मौसम के लिए जाना जाता है, जो हल्दी की खेती के लिए बिल्कुल उपयुक्त है. सांगली के दक्षिणी हिस्से जैसे मिरज, तसगांव, पालुस, कडेगांव, वालवा, विटा, खानापुर और चिंचली मुख्य हल्दी उत्पादन क्षेत्र हैं. ऐसे सांगली में हल्दी की खेती मुख्य रूप से मई-जून में होती है. बुवाई के लिए प्रति एकड़ 10-12 क्विंटल बीज चाहिए. फसल 7-9 महीने में तैयार होती है और अच्छी देखभाल में 18-20 क्विंटल प्रति एकड़ उपज मिल सकती है. प्रमुख किस्में राजापुरी और परपेठ हैं. अच्छी जल निकासी वाली उपजाऊ मिट्टी सबसे अच्छी मानी जाती है. कतारों के बीच 30-45 सेमी और पौधों के बीच 15-20 सेमी दूरी रखें. औसतन उपज 10-12 क्विंटल होती है, उन्नत तरीकों से 18-20 क्विंटल तक मिल सकती है. प्रति एकड़ लागत 40,000-50,000 रुपये है, जिससे यह फसल बहुत लाभदायक है.

कटाई के बाद हल्दी को 10-15 दिन धूप में सुखाया जाता है

सांगली की मशहूर हल्दी की कटाई बुवाई के 7-9 महीने बाद, यानी जनवरी से मार्च के बीच होती है. हल्दी की प्रोसेसिंग  में पहले इसे साफ किया जाता है, फिर 45-60 मिनट भाप में पकाया जाता है, ताकि कर्क्यूमिन बढ़े. इसके बाद हल्दी को 10-15 दिन धूप में सुखाया जाता है और पॉलिश किया जाता है. इससे हल्दी का रंग चमकीला पीला होता है और यह लंबे समय तक टिकती है. ऐसे सांगली हल्दी अपने गहरे रंग और अधिक करक्यूमिन के लिए मशहूर है. यह महाराष्ट्र से विदेशों में निर्यात की जाने वाली प्रमुख हल्दी है. सांगली एशिया के सबसे बड़े हल्दी व्यापारिक केंद्रों में से एक है. इसका मुख्य निर्यात अमेरिका, बांग्लादेश, ईरान, यूएई, मलेशिया और जर्मनी में होता है.

सांगली हल्दी से जुड़े 6 प्रमुख आंकड़े

  • बुवाई का समय: अप्रैल से जुलाई (मुख्य रूप से मई-जून)
  • बीज की आवश्यकता: प्रति एकड़ 10-12 क्विंटल
  • फसल तैयार होने का समय: 7-9 महीने
  • औसत उपज: 10-12 क्विंटल प्रति एकड़
  • उन्नत तरीके से 18-20 क्विंटल प्रति एकड़
  • पौधों और कतारों की दूरी: कतारों के बीच 30-45 सेमी, पौधों के बीच 15-20 सेमी
  • लागत: प्रति एकड़ 40,000-50,000 रुपये

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