क्यों इतना खास है नागपुर का संतरा, क्या दूसरे राज्यों में भी हो सकती है इसकी खेती?

नागपुर का संतरा, अपनी खास खुशबू और मीठा-खट्टा स्वाद के लिए मशहूर है. 2014 में GI टैग मिला. महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र में उगाया जाने वाला यह संतरा देश में 80 फीसदी उत्पादन देता है. इसकी खेती 18वीं सदी से हो रही है और अब वैश्विक स्तर पर इसकी पहचान बढ़ी है.

नोएडा | Updated On: 18 Jan, 2026 | 02:34 PM

जब भी संतरे की बात होती है, तो लोगों के जेहन में सबसे पहले नागपुर के संतरे की तस्वीर उभरकर सामने आती है. इस संतरे की मांग देश के हरेक राज्यों में है. अभी देश के हरेक राज्यों के मार्केट नागपुर के संतरे से सजे हुए हैं. लेकिन क्या आपको मालूम है कि विश्व प्रसिद्ध नागपुर के संतरे को जीआई टैग भी मिला हुआ है. इसे साल 2014 में जीआई टैग दिया गया. इसके बाद से नागपुर के संतरे की मांग और बढ़ गई. ऐसे में इसकी खेती करने वाले किसानों की कमाई में भी इजाफा हुआ है. तो आइए आज जानते हैं नागपुर के संतरे की खासियत के बारे में.

नागपुर के संतर के वैज्ञानिक रूप से Citrus reticulata कहा जाता है. यह महाराष्ट्र के नागपुर और आसपास के विदर्भ क्षेत्र में उगाया जाने वाला प्रसिद्ध मंदारिन संतरा है. अप्रैल 2014 में इसे भौगोलिक संकेतक (GI) टैग प्रदान किया गया था. ऑरेंज सिटी के नाम से पहचाने जाने वाले नागपुर का संतरा अपने खास स्वाद, सुगंध और बेहतर गुणवत्ता के लिए देश-विदेश में मशहूर है, जो यहां की अनुकूल जलवायु और मिट्टी  का परिणाम है. नागपुर संतरे की पहचान उसका खास खट्टा-मीठा स्वाद और बेमिसाल खुशबू है. यह स्वाद एसिड और शुगर के अनोखे संतुलन से बनता है, जो दुनिया के किसी और संतरे में नहीं मिलता. यही खासियतें विदर्भ क्षेत्र की विशेष मिट्टी और जलवायु में ही विकसित हो पाती हैं, इसी आधार पर नागपुर संतरे को GI टैग मिला है.

नागपुर के संंतरे की खासियत

मंदारिन को मान्यता देने के लिए पांच मानक तय किए गए हैं, जिनमें फल का आकार, रंग, बीजों की संख्या और जूस के रासायनिक गुण  शामिल हैं, जो उसके स्वाद और खुशबू तय करते हैं. इन मानकों पर खरा न उतरने वाला कोई भी फल ‘नागपुर ऑरेंज’ के नाम से नहीं बेचा जा सकता. वैज्ञानिकों के अनुसार, इससे नागपुर संतरे को दुनिया के बाजारों में दूसरे संतरे की किस्मों पर बढ़त मिलेगी. हालांकि, भारत में कई तरह के मंदारिन संतरे मौजूद हैं. प्रमुख किस्मों में हिमाचल प्रदेश का किन्नू भी है. पहले, विदर्भ के बाहर, जहां नागपुर मंदरिन अच्छी तरह जाना जाता है, वहां अक्सर अन्य किस्मों को नागपुर संतरा बताकर बेचा जाता था.

वैश्विक स्तर पर पहचान मिली

सदियों से नागपुर और उसके आसपास के इलाकों में संतरे की खेती होती आ रही है, जिससे यहां के किसानों को इस क्षेत्र में विशेषज्ञता मिल चुकी है. वे खेती में मुख्य रूप से पारंपरिक तरीके अपनाते हैं. नागपुर के संतरे पहले से ही मशहूर थे, लेकिन GI टैग मिलने के बाद अब इन्हें वैश्विक स्तर पर पहचान मिली है और इसकी मांग और बढ़ गई है.

1.27 लाख हेक्टेयर में संतरे की खेती

महाराष्ट्र संतरा उत्पादन में देश में खास स्थान रखता है. राज्य में 1.27 लाख हेक्टेयर में संतरे की खेती होती है और नागपुर का संतरा  सबसे फेमस है. इसलिए इसे नागपुर संतरा कहा जाता है. नागपुर को ‘ऑरेंज सिटी’ के नाम से भी जाना जाता है. यह संतरा स्वास्थ्य के लिए बहुत लाभकारी है. देश में कुल 4.28 लाख हेक्टेयर में संतरे की खेती होती है, जिससे करीब 51.01 लाख टन संतरा मिलता है. खास बात यह है कि देश के 80 प्रतिशत संतरा उत्पादन महाराष्ट्र में होता है और बाकी 20 प्रतिशत बाकी राज्यों में.

संतरे की खेती 18वीं सदी से शुरू हुई

नागपुर के संतरे की खेती 18वीं सदी से शुरू हुई थी, जब भोंसले शासकों ने विदर्भ की मिट्टी और मौसम को संतरे के लिए उपयुक्त पाया. उन्होंने इसकी खेती को बढ़ावा दिया, जिससे नागपुर ‘ऑरेंज सिटी’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ. शुरुआत में नागपुर का संतरा सिर्फ स्थानीय उपज था, लेकिन अपने खास स्वाद और उच्च गुणवत्ता के कारण यह जल्दी ही कीमती फल बन गया और नागपुर भारत का प्रमुख संतरा उत्पादन, वितरण और व्यापार केंद्र बन गया. इसकी खेती महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र के अलावा मध्य प्रदेश के कुछ जिलों में भी होती है, जहां की मिट्टी और जलवायु इसके लिए बिल्कुल उपयुक्त मानी जाती है.

क्या होता है जीआई टैग

GI मतलब जियोग्राफिकल इंडिकेशन होता है, जो एक एक खास पहचान वाला लेबल होता है. यह किसी चीज को उसके इलाके से जोड़ता है. आसान भाषा में कहें तो ये GI टैग बताता है कि कोई प्रोडक्ट खास तौर पर किसी एक तय जगह से आता है और वही उसकी असली पहचान है. भारत में साल 1999 में ‘जियोग्राफिकल इंडिकेशंस ऑफ गुड्स (रजिस्ट्रेशन एंड प्रोटेक्शन) एक्ट’ लागू हुआ था. इसके तहत किसी राज्य या इलाके के खास प्रोडक्ट को कानूनी मान्यता दी जाती है. जब किसी प्रोडक्ट की पहचान और उसकी मांग देश-विदेश में बढ़ने लगती है, तो GI टैग के जरिए उसे आधिकारिक दर्जा मिल जाता है. इससे उसकी असली पहचान बनी रहती है और वह नकली प्रोडक्ट्स से सुरक्षित रहता है.

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Published: 18 Jan, 2026 | 02:28 PM

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