क्या आपके घर में भी मौजूद है ये धीमा जहर? जो आप रोज अपने बच्चों को खिला रहे हैं

भारत में कई ऐसे खाद्य रंग अभी भी इस्तेमाल होते हैं जिन्हें यूरोप, अमेरिका और जापान जैसे विकसित देशों ने पूरी तरह बैन कर रखा है. लेकिन यहां ये रंग पैक्ड फूड, मिठाई और जूस में आज भी मिल जाते हैं.

नई दिल्ली | Updated On: 31 Aug, 2025 | 03:20 PM

आज के दौर में बच्चों से लेकर बड़ों तक सभी को रंग-बिरंगी चीजें बेहद आकर्षक लगती हैं.आपके बच्चे या आप खुद अगर कोई चमकदार लाल कैंडी, रंग-बिरंग केक या पैक्ड स्नैक्स खा रहे हैं, तो क्या आप जानते हैं कि उस रंग में क्या छुपा हो सकता है? हा, वही रंग जो इतने प्यारे और आकर्षक लगते हैं, असल में हमारे स्वास्थ्य के लिए बेहद खतरनाक भी हो सकते हैं.

तो आइए जानते हैं कि ये कौन से रंग हैं जो आपके रोजमर्रा की जिंदगी में शामिल होने के साथ आपकी सेहत को हर रोज चोट पहुंचा रहे हैं.

कौन से रंग अभी भी मिलते हैं भारत में?

Red 2G (ई-128)

भारत में कई ऐसे खाद्य रंग अभी भी इस्तेमाल होते हैं जिन्हें यूरोप, अमेरिका और जापान जैसे विकसित देशों ने पूरी तरह बैन कर रखा है. लेकिन भारत में अभी भी मिठाइयों और पैक्ड फूड में इसका खुलकर इस्तेमाल होता है. चूहों पर हुए शोध में यह कैंसर से जुड़ा पाया गया. डॉक्टरों का कहना है, इसे लंबे समय तक खाना स्वास्थ्य के लिए बहुत जोखिम भरा हो सकता है.

Red 3 (Erythrosine / लाल 3)

अमेरिका में कॉस्मेटिक्स में बैन है और यूरोप में भी पाबंदी है. भारत में मिठाई और डेसर्ट में कभी-कभी यह मिल जाता है. चूहों पर किए गए अध्ययनों में इसे थायरॉयड ट्यूमर से जोड़ा गया. इंसानों पर प्रमाण पूरी तरह नहीं है, लेकिन खतरा अनदेखा नहीं किया जा सकता.

Orange B और Ponceau 4R

यूरोप और अमेरिका के कई हिस्सों में प्रतिबंधित. भारत में ये कई मिठाइयों, जूस, चटनी और पैक्ड स्नैक्स में पाए जाते हैं. इनके कारण एलर्जी, त्वचा पर दाने और अन्य प्रतिक्रियाएं हो सकती हैं.

Yellow 5 (Tartrazine / पीला 5)

कुछ यूरोपीय देशों में चेतावनी लेबल के साथ इस्तेमाल की अनुमति है. भारत में हलवाई की मिठाई और पैक्ड फूड में ये रंग सबसे आम है. रिसर्च में बच्चों में हाइपरएक्टिविटी, एलर्जी और अस्थमा जैसी समस्याओं से जुड़ा पाया गया है.

कृत्रिम खाद्य रंग क्या हैं?

तो आप सोच रहे होंगे, ये रंग आखिर आते कहां से हैं? दरअसल, ये पेट्रोलियम जैसे रसायनों से बनते हैं. ये नेचुरल नहीं होते, बल्कि रासायनिक प्रोसेस से तैयार किए जाते हैं ताकि खाने में चमक और रंग बनाएं रखें.

जैसे Red 40, Yellow 5, Blue 1ये रंग सिर्फ आंखों को लुभाते हैं, लेकिन इनके साथ स्वास्थ्य जोखिम भी जुड़े हुए हैं. लंबे समय तक इनका सेवन करने से शरीर में कई समस्याए हो सकती हैं.

क्या कहते हैं डॉक्टर?

डॉक्टर शोभित कंसल बताते हैं कि आजकल माता-पिता अनजाने में ही अपने बच्चों को पैक्ड फूड, चिप्स, जूस और मिल्कशेक जैसी चीजें रोजाना दे रहे हैं. बच्चों को यह समझा कर पिलाया जाता है कि इससे उनकी सेहत और ताकत बढ़ेगी, लेकिन असलियत इससे उलटी है. बाजार में मिलने वाले ये सभी उत्पाद लंबे समय तक टिकने के लिए रासायनिक पदार्थों से तैयार किए जाते हैं, और इन्हीं में मौजूद कृत्रिम रंग और केमिकल्स बच्चों की सेहत पर गंभीर प्रभाव डाल सकते हैं. इनके सेवन से एलर्जी, पेट की समस्या, हाइपरएक्टिविटी और अन्य स्वास्थ्य जटिलताएं हो सकती हैं. लगातार रंग मिला भोजन खाना बच्चों या बड़ों के लिए जहर का काम ही करता है, इसलिए डॉक्टर कंसल की सलाह है कि माता-पिता कोशिश करें कि बच्चों को रंग-बिरंगे पैक्ड फूड और ड्रिंक्स से दूर रखें, और उन्हें ताजगी भरे प्राकृतिक भोजन की आदत डालें.

दुनिया में नियम और भारत की स्थिति

यूरोपियन यूनियन 

यूरोपियन यूनियन में खाद्य रंगों को लेकर सख्त नियम लागू हैं. कई कृत्रिम रंगों पर पूरी तरह से प्रतिबंध है, जबकि कुछ रंगों के इस्तेमाल पर चेतावनी लेबल लगाना अनिवार्य है. इसका मकसद उपभोक्ताओं को संभावित स्वास्थ्य जोखिमों के बारे में जागरूक करना और बच्चों में स्वास्थ्य समस्याओं को रोकना है. उदाहरण के लिए, कुछ लाल और पीले रंगों पर विशेष चेतावनी लगती है कि यह बच्चों में ध्यान और व्यवहार पर असर डाल सकता है.

अमेरिका

अमेरिका में कुछ खाद्य रंगों की अनुमति है, लेकिन उनके इस्तेमाल से पहले सुरक्षा जांच अनिवार्य है. एफडीए (FDA) समय-समय पर नए शोध और रिपोर्ट के आधार पर रंगों की सूची अपडेट करता है. कुछ रंग केवल प्राकृतिक स्रोतों से ही इस्तेमाल किए जा सकते हैं, जबकि कृत्रिम रंगों के लिए सख्त मानक निर्धारित हैं.

भारत

भारत में स्थिति अभी भी चिंताजनक है. कई ऐसे कृत्रिम रंग जो पूरी दुनिया में बैन हैं, भारत में आज भी इस्तेमाल किए जा रहे हैं. बाजार में चिप्स, मिठाई, जूस, बर्फी, केक और मिल्कशेक जैसे उत्पादों में ये रंग आसानी से पाए जा सकते हैं.

क्यों ऐसा है?

जागरूकता की कमी: बहुत से उपभोक्ता यह नहीं जानते कि ये रंग उनके और बच्चों के स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव डाल सकते हैं.

सस्ते रंगों का इस्तेमाल: प्राकृतिक और सुरक्षित रंगों की तुलना में कृत्रिम रंग सस्ते और लंबे समय तक टिकाऊ होते हैं.

नियमों का कड़ाई से पालन न होना: कुछ राज्य और केंद्र सरकार के दिशा-निर्देश मौजूद हैं, लेकिन उनका पालन सुनिश्चित करना मुश्किल है.

हाल की घटनाए और चेतावनी

  • स्कूलों में कैंडी और जूस से बच्चों में एलर्जी और उल्टी की शिकायतें.
  • यूरोप में Red 3 और Red 2G के सेवन पर चेतावनी जारी.
  • अमेरिका में स्वास्थ्य की चिंता से प्राकृतिक रंगों की मांग बढ़ी.

यह साफ कर देता है कि कृत्रिम रंग सिर्फ सुंदरता के लिए नहीं हैं, बल्कि स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा भी हैं.

प्राकृतिक रंग और सुरक्षित विकल्प

बचाव का सबसे आसान तरीका है नेचुरल कलर्स. ये सेफ हैं और स्वास्थ्य को भी बढ़ावा देते हैं.

हल्दी (Turmeric): पीला रंग

बीट जूस (Beetroot Juice): लाल रंग

स्पिरुलिना (Spirulina): हरा-नीला रंग

फलों और सब्ियों से: कई रंग प्राकृतिक रूप से मिलते हैं

कृत्रिम रंगों से बचने के आसान तरीके

लेबल ध्यान से पढ़ें-हमेशा उत्पादों पर “Artificial Colour Free” या “Natural Colour” लिखा हो, ऐसा चेक करें. ये संकेत देते हैं कि उत्पाद में हानिकारक रसायन नहीं हैं.

ताजगी भरे खाद्य पदार्थ खाएं-ताजे फल, सब्जियां और साबुत अनाज का सेवन बढ़ाएं. ये न सिर्फ प्राकृतिक रंग देते हैं, बल्कि स्वास्थ्य के लिए भी फायदेमंद हैं.

घर पर खाना बनाएं-स्नैक्स और मिठाइयां घर पर बनाएं. आप हल्दी, चुकंदर, पालक जैसे नेचुरल रंगों का इस्तेमाल कर स्वाद और रंग दोनों बढ़ा सकते हैं.

सुरक्षित और भरोसेमंद ब्रांड चुनें-ऐसे ब्रांड का चयन करें जो स्वास्थ्य को प्राथमिकता देते हों और उनके उत्पादों में कृत्रिम रंगों का इस्तेमाल न हो.

रिपोर्ट-प्रतिभा सारस्वत

Published: 31 Aug, 2025 | 03:00 PM