मौसम की ताजा जानकारी बुरी खबरें लेकर आई है. अल नीनो का खतरा और बढ़ गया है. बल्कि 76 साल के बाद सबसे मजबूत अल नीनो की आशंका बन गई है. ऑस्ट्रेलिया के ब्यूरो ऑफ मेटियोरोलॉजी ने अपने ताजा अपडेट में कहा है कि जून के मध्य से सक्रिय अल नीनो लगातार मजबूत हो रहा है. एजेंसी के अनुसार आने वाले महीनों में इसकी तीव्रता और बढ़ सकती है. वर्तमान संकेत बताते हैं कि यह 1950 के बाद दर्ज सबसे मजबूत अल नीनो घटनाओं में शामिल हो सकता है.
रिपोर्ट के अनुसार मध्य और पूर्वी उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर का तापमान लगातार सामान्य से अधिक बना हुआ है. सप्ताह समाप्ति 26 जुलाई तक अल नीनो 3.4 इंडेक्स का मान +1.94 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया. यह अल नीनो की सीमा +0.80 डिग्री सेल्सियस से काफी ऊपर है. पिछले दो सप्ताह में इसमें लगभग 0.5 डिग्री सेल्सियस की अतिरिक्त वृद्धि भी दर्ज की गई है. विशेषज्ञों का मानना है कि प्रशांत महासागर में यह लगातार बढ़ती गर्माहट अल नीनो के और अधिक मजबूत होने का स्पष्ट संकेत है.
हिंद महासागर में भी बदल रहे हैं संकेत
रिपोर्ट के अनुसार हिंद महासागर डाइपोल यानी IOD फिलहाल तटस्थ स्थिति में है. हालांकि साप्ताहिक IOD इंडेक्स +0.44 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया है. यह पहली बार सकारात्मक सीमा को पार कर गया है. यदि यह स्थिति कुछ समय तक बनी रहती है तो सकारात्मक IOD की आधिकारिक घोषणा की जा सकती है.
मौसम मॉडल संकेत दे रहे हैं कि सकारात्मक IOD दक्षिणी गोलार्ध की सर्दियों के दौरान विकसित हो सकता है और वसंत तक बना रह सकता है. हालांकि इसकी तीव्रता और अवधि को लेकर अभी भी कुछ अनिश्चितता बनी हुई है.
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि पश्चिमी उष्णकटिबंधीय प्रशांत क्षेत्र में ट्रेड विंड सामान्य से कमजोर हैं. वहीं सदर्न ऑसिलेशन इंडेक्स भी लगातार नकारात्मक बना हुआ है. ये दोनों संकेत मजबूत अल नीनो की दिशा में इशारा करते हैं.
भारत के मॉनसून और खेती पर क्यों है नजर
अल नीनो का भारत के कृषि क्षेत्र से सीधा संबंध माना जाता है. सामान्य तौर पर मजबूत अल नीनो के दौरान दक्षिण पश्चिम मानसून कमजोर पड़ सकता है और कई राज्यों में सामान्य से कम वर्षा दर्ज हो सकती है. हालांकि हर अल नीनो वर्ष में ऐसा हो यह जरूरी नहीं है. भारतीय मौसम विभाग बार बार स्पष्ट कर चुका है कि भारतीय मानसून केवल एल नीनो से तय नहीं होता. हिंद महासागर डाइपोल, अरब सागर. बंगाल की खाड़ी और अन्य समुद्री तथा वायुमंडलीय परिस्थितियां भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं.
यदि अल नीनो आने वाले महीनों में और मजबूत होता है तो खरीफ फसलों के अंतिम चरण और रबी सीजन की तैयारी पर इसकी नजर रखी जाएगी. धान, मक्का, दालें, तिलहन और जलाशयों में पानी की उपलब्धता पर मौसम की स्थिति का असर पड़ सकता है. ऐसे में मौसम एजेंसियों और कृषि वैज्ञानिकों की सलाह के अनुसार खेती की योजना बनाना किसानों के लिए महत्वपूर्ण होगा.
भारत सरकार और भारतीय मौसम विभाग लगातार प्रशांत महासागर और हिंद महासागर की गतिविधियों की निगरानी कर रहे हैं. यदि मौसम प्रणाली में बड़े बदलाव के संकेत मिलते हैं तो राज्यों और किसानों के लिए समय समय पर एडवाइजरी भी जारी की जाएगी.
कृषि और मौसम पर पड़ सकता है व्यापक असर
ऑस्ट्रेलियाई मौसम एजेंसी का अनुमान है कि उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर में गर्माहट पूरे दक्षिणी गोलार्ध के वसंत यानी नवंबर तक बनी रहेगी. इसके बाद यह फरवरी से अप्रैल 2027 के बीच अपने चरम स्तर पर पहुंच सकती है. इसके बाद शरद ऋतु 2027 तक इसका प्रभाव जारी रहने की संभावना जताई गई है.
अल नीनो का असर केवल प्रशांत महासागर तक सीमित नहीं रहता. यह दुनिया के कई हिस्सों में वर्षा के पैटर्न, तापमान, सूखे, बाढ़ और कृषि उत्पादन को प्रभावित करता है. भारत में भी एल नीनो का संबंध मॉनसून की स्थिति से जोड़ा जाता है. हालांकि भारतीय मॉनसून पर इसका वास्तविक प्रभाव हिंद महासागर डाइपोल और अन्य समुद्री तथा वायुमंडलीय परिस्थितियों पर भी निर्भर करता है.
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि जून 2026 वैश्विक स्तर पर अब तक के जून सबसे गर्म महीनों में शामिल रहा. वैश्विक समुद्री सतह का औसत तापमान 1991 से 2020 के औसत की तुलना में 0.51 डिग्री सेल्सियस अधिक दर्ज किया गया. इससे संकेत मिलता है कि समुद्री गर्माहट और जलवायु परिवर्तन की पृष्ठभूमि में अल नीनो का प्रभाव और अधिक महत्वपूर्ण हो सकता है.