दुनियाभर के मौसम वैज्ञानिकों की चेतावनी, अल नीनो से भारत समेत एशिया में सूखा और गर्मी बढ़ने का खतरा

El Nino 2026 impact: मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार, अल नीनो हर 3 से 5 साल में एक बार आता है, जबकि ला नीना 3 से 7 साल के बीच देखने को मिलता है. इन दोनों घटनाओं का असर वैश्विक स्तर पर पड़ता है और कई बार सूखा, बाढ़ और तापमान में बड़े बदलाव देखने को मिलते हैं. इसलिए सरकारों और किसानों को पहले से तैयारी करनी होगी.

Kisan India
नई दिल्ली | Published: 24 Apr, 2026 | 03:17 PM

El Nino 2026 impact: दुनिया भर में मौसम के बड़े बदलावों को प्रभावित करने वाली प्राकृतिक घटना अल नीनो एक बार फिर चर्चा में है. मौसम वैज्ञानिकों का अनुमान है कि साल 2026 के दूसरे हिस्से में यह घटना फिर से सक्रिय हो सकती है और इसका असर एशिया समेत कई हिस्सों में साफ दिखाई देगा. खासतौर पर भारत, दक्षिण-पूर्व एशिया और ऑस्ट्रेलिया जैसे क्षेत्रों में कम बारिश और ज्यादा गर्मी का खतरा बढ़ सकता है.

मौसम विभागों के अनुमान क्या कहते हैं

बिजनेस लाइन की खबर के अनुसार, दुनिया के कई प्रमुख मौसम संस्थानों ने अल नीनो की संभावना जताई है. जापान के मौसम विभाग का कहना है कि उत्तरी गोलार्ध की गर्मियों के दौरान अल नीनो बनने की 70 प्रतिशत संभावना है. वहीं यूएस क्लाइमेट प्रिडिक्शन सेंटर के अनुसार मई से जुलाई के बीच इसके सक्रिय होने की 61 प्रतिशत संभावना है.

चीन के मौसम अधिकारियों का अनुमान है कि यह स्थिति मई से शुरू होकर साल के अंत तक बनी रह सकती है. भारत के मौसम विशेषज्ञों ने भी चेतावनी दी है कि इस बार मानसून सामान्य से कम रह सकता है, जो पिछले तीन सालों में पहली बार होगा.

एशिया और भारत पर सबसे ज्यादा असर

मौसम विशेषज्ञों के अनुसार, अल नीनो का सबसे ज्यादा असर एशिया में देखने को मिलता है. मौसम मॉडल बताते हैं कि भारत, दक्षिण-पूर्व एशिया और ऑस्ट्रेलिया में बारिश सामान्य से कम और तापमान सामान्य से ज्यादा रहेगा. इससे खेती पर बड़ा असर पड़ सकता है, क्योंकि पानी की कमी से फसलों की पैदावार घट सकती है.

भारत जैसे देश में, जहां खेती मानसून पर निर्भर है, यह स्थिति किसानों के लिए चिंता बढ़ाने वाली हो सकती है.

ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण-पूर्व एशिया में सूखे का खतरा

ऑस्ट्रेलिया के मौसम विभाग ने भी पूर्वी हिस्सों में मई से अगस्त के बीच सामान्य से कम बारिश का अनुमान जताया है. यह समय वहां की खेती के लिए बेहद अहम होता है. दक्षिण-पूर्व एशिया में भी इसी तरह की स्थिति देखने को मिल सकती है, जहां गर्मी और सूखे का असर बढ़ सकता है.

अमेरिका में मिल सकते हैं बेहतर हालात

जहां एशिया में सूखे का खतरा है, वहीं अमेरिका के कुछ हिस्सों में इसके उलट असर देखने को मिल सकता है. मौसम विशेषज्ञों के अनुसार, अमेरिका के मिडवेस्ट क्षेत्र में इस बार खेती के लिए हालात बेहतर रह सकते हैं. हालांकि कुछ जगहों पर ज्यादा बारिश के कारण फसल कटाई के समय परेशानी भी हो सकती है.

अल नीनो और ला नीना क्या होते हैं

अल नीनो और ला नीना दोनों प्रशांत महासागर में होने वाले तापमान बदलाव से जुड़े होते हैं. अल नीनो तब बनता है, जब समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से ज्यादा गर्म हो जाता है और हवाओं का पैटर्न बदल जाता है. इससे दुनिया के कई हिस्सों में मौसम असामान्य हो जाता है. वहीं ला नीना इसके उलट स्थिति होती है, जब समुद्र का तापमान कम हो जाता है और हवाएं मजबूत हो जाती हैं, जिससे कुछ क्षेत्रों में ज्यादा बारिश होती है.

कितनी बार आता है अल नीनो

मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार, अल नीनो हर 3 से 5 साल में एक बार आता है, जबकि ला नीना 3 से 7 साल के बीच देखने को मिलता है. इन दोनों घटनाओं का असर वैश्विक स्तर पर पड़ता है और कई बार सूखा, बाढ़ और तापमान में बड़े बदलाव देखने को मिलते हैं.

पिछले अल नीनो के प्रभाव

इतिहास में अल नीनो के कई बड़े असर देखे गए हैं. 2015-16 का अल नीनो काफी शक्तिशाली था, जिसने ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण-पूर्व एशिया में सूखा पैदा किया और भारत में मानसून को कमजोर कर दिया. इससे अनाज, पाम ऑयल और चीनी की पैदावार प्रभावित हुई.

  • 2009-10 में आए मध्यम स्तर के अल नीनो के कारण भी भारत और एशिया में चावल और गेहूं की पैदावार घट गई थी.
  • सबसे शक्तिशाली अल नीनो 1997-98 में दर्ज किया गया, जिसने एशिया में सूखा और अमेरिका में बाढ़ जैसी स्थिति पैदा कर दी थी.

खेती और अर्थव्यवस्था पर असर

अल नीनो का सबसे बड़ा असर खेती पर पड़ता है. कम बारिश और ज्यादा गर्मी से फसलों की पैदावार घट सकती है, जिससे खाद्य आपूर्ति प्रभावित होती है. इसका असर कीमतों पर भी पड़ता है और आम लोगों को महंगाई का सामना करना पड़ सकता है.

क्या करना होगा

विशेषज्ञों का कहना है कि इस बार अल नीनो का समय और उसकी तीव्रता बहुत अहम होगी. अगर यह ज्यादा मजबूत होता है, तो एशिया में सूखा और गर्मी बढ़ सकती है. इसलिए सरकारों और किसानों को पहले से तैयारी करनी होगी, ताकि इसके असर को कम किया जा सके.

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