बीमारी फैलने से झींगा किसानों को नुकसान, 2000 रुपये तक गिरा रेट.. अब मिलेगी सब्सिडी ?

मत्स्य पालन विभाग ने किसानों को सलाह दी है कि वे तालाबों की साफ-सफाई रखें, सही मात्रा में मछली/झींगा डालें और अच्छी गुणवत्ता वाले बीज का उपयोग करें. हालांकि, विभाग के अधिकारियों ने माना है कि अभी तक हुए नुकसान का सटीक आंकड़ा उपलब्ध नहीं है. फिर भी यह स्पष्ट है कि जलवायु परिवर्तन और बीमारियों के प्रकोप से इस क्षेत्र पर गंभीर असर पड़ रहा है.

Kisan India
नोएडा | Updated On: 24 Apr, 2026 | 04:38 PM

Shrimp Business: आंध्र प्रदेश के एलुरु जिले में झींगा (श्रिम्प) पालन करने वाले किसानों के सामने इस समय बड़ा संकट है. लगातार गिरती कीमतें, बढ़ती लागत और बीमारियों के फैलाव ने इस व्यवसाय को काफी मुश्किल बना दिया है. जो काम पहले हजारों किसानों की आजीविका का मजबूत सहारा था, अब वह लगातार घाटे का सौदा बनता जा रहा है और किसानों की चिंता बढ़ा रहा है. खासकर झींगे की कीमतों में तेज उतार-चढ़ाव सबसे बड़ी समस्या है. हाल ही में थोड़ी बढ़त के बाद दाम अचानक गिरकर लगभग 20,000 रुपये प्रति टन तक कम हो गए. यानी 2000 रुपये प्रति क्विंटल कीमत कम हो गई है, जिससे किसानों को बहुत नुकसान हुआ.

किसानों का आरोप है कि व्यापारी और बिचौलिए कीमतों में हेरफेर कर रहे हैं, जिससे उन्हें सही दाम नहीं मिल पा रहे हैं. इसके साथ ही व्हाइट स्पॉट सिंड्रोम जैसी बीमारियां और जलवायु परिवर्तन से जुड़ी अनियमित मौसम स्थितियां भी संकट बढ़ा रही हैं. तापमान में अचानक बदलाव और पानी की खराब गुणवत्ता  के कारण कई तालाबों में झींगों की बड़े पैमाने पर मौत हो रही है. कम ऑक्सीजन स्तर भी स्थिति को और खराब कर रहा है, जिससे फसल बचाना किसानों के लिए बेहद मुश्किल हो गया है.

3 लाख एकड़ में जलीय कृषि क्षेत्र को नुकसान

कंसल्टेंट रोक्कम सुब्बाराव ने ‘द न्यू इंडियन एक्सप्रेस’ से कहा कि वैश्विक स्तर पर चल रहे भू-राजनीतिक तनावों के कारण झींगा उत्पादों की निर्यात मांग घट रही है और कीमतों में अस्थिरता बढ़ रही है. उन्होंने यह भी कहा कि क्षेत्र में मौसम में तेजी से हो रहे बदलाव वायरल संक्रमणों को तेजी से फैला रहे हैं, जिसमें ‘क्विक वायरस’ जैसे संक्रमण शामिल हैं. इसके कारण लगभग 3 लाख एकड़ में फैले जलीय कृषि क्षेत्र को भारी नुकसान हो रहा है.

फीड की कीमतों में बंपर बढ़ोतरी

इसके अलावा, किसानों पर इनपुट लागत का भी भारी बोझ बढ़ गया है. फीड की कीमत बढ़कर लगभग 2,000 रुपये प्रति 25 किलो बैग तक पहुंच गई है, जबकि बीज की लागत भी अधिक बनी हुई है और उसकी गुणवत्ता को लेकर चिंता है. साथ ही बिजली शुल्क  और एरेटर चलाने के लिए डीजल जैसे खर्चों ने उत्पादन लागत को और बढ़ा दिया है. झींगा पालन के लिए तालाबों को किराए पर लेना ही काफी महंगा पड़ता है, जिससे यह काम जोखिम भरा हो गया है. बिजली की बढ़ी हुई दरें भी किसानों के लिए बड़ी समस्या बन गई हैं.

एरेटर नहीं चला पा रहे हैं किसान

किसानों का कहना है कि ज्यादा बिजली शुल्क के कारण वे एरेटर नहीं चला पा रहे हैं, जो तालाब में ऑक्सीजन बनाए रखने के लिए जरूरी होते हैं. ऐसे में किसान सरकार से मांग कर रहे हैं कि जलीय कृषि को बचाने के लिए फिर से सब्सिडी वाली बिजली उपलब्ध कराई जाए. इसके अलावा, क्रेडिट पर फीड खरीदने से भी किसानों पर अतिरिक्त बोझ बढ़ रहा है, जिससे उनका कर्ज बढ़ता जा रहा है और आर्थिक अस्थिरता का खतरा बना हुआ है. विशेषज्ञों के अनुसार, खराब गुणवत्ता वाले बीज और तालाबों में ज्यादा भीड़ भी बड़ी समस्या है. इससे पानी की गुणवत्ता खराब हो रही है और बीमारियां तेजी से फैल रही हैं.

बिजली पर सब्सिडी देने की उठी मांग

मत्स्य पालन विभाग ने किसानों को सलाह दी है कि वे तालाबों की साफ-सफाई रखें, सही मात्रा में मछली/झींगा डालें और अच्छी गुणवत्ता वाले बीज का उपयोग करें. हालांकि, विभाग के अधिकारियों ने माना है कि अभी तक हुए नुकसान का सटीक आंकड़ा उपलब्ध नहीं है. फिर भी यह स्पष्ट है कि जलवायु परिवर्तन और बीमारियों के प्रकोप से इस क्षेत्र पर गंभीर असर पड़ रहा है. बीमा की सुविधा मौजूद होने के बावजूद किसानों को यह स्पष्ट नहीं है कि उन्हें कितना मुआवजा मिलेगा. अचानक बारिश होने पर वायरस के फैलने का खतरा और बढ़ जाता है, जिससे स्थिति और भी गंभीर हो रही है. किसान अब सरकार से तुरंत हस्तक्षेप की मांग कर रहे हैं. उनकी मांग है कि उचित मूल्य प्रणाली लागू की जाए, इनपुट लागत पर नियंत्रण हो और खासकर बिजली पर सब्सिडी दी जाए, ताकि इस संकट से निपटा जा सके.

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Published: 24 Apr, 2026 | 03:20 PM
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