Sugarcane Policy India: भारत के गन्ना और चीनी उद्योग से जुड़ी सरकारी नीतियों को लेकर अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सवाल उठने लगे हैं. ऑस्ट्रेलिया ने विश्व व्यापार संगठन (WTO) में भारत की घरेलू गन्ना और चीनी नीतियों पर सवाल उठाते हुए स्पष्टीकरण मांगा है. ऑस्ट्रेलिया का कहना है कि भारत की ओर से गन्ना किसानों को दिया जा रहा बाजार समर्थन WTO के तय नियमों से काफी ज्यादा है. ऑस्ट्रेलिया ने WTO में जमा किए एक दस्तावेज में भारत के चीनी बाजार के वैश्विक असर का भी जिक्र किया है. भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा चीनी उत्पादक और तीसरा सबसे बड़ा चीनी निर्यातक है. ऐसे में भारत की घरेलू चीनी नीतियों का असर अंतरराष्ट्रीय कीमतों और चीनी के कारोबार पर भी पड़ता है.
WTO के नियमों से ज्यादा समर्थन का आरोप
ऑस्ट्रेलिया ने कृषि समझौते यानी एग्रीमेंट ऑन एग्रीकल्चर (AoA) के तहत भारत की गन्ना नीति पर सवाल उठाया है. WTO के नियमों के मुताबिक किसी कृषि उत्पाद को दिया जाने वाला बाजार मूल्य समर्थन उसके कुल उत्पादन मूल्य के 10 फीसदी तक सीमित होना चाहिए. ऑस्ट्रेलिया का दावा है कि 2018-19 से 2024-25 के बीच लगातार सात साल भारत में गन्ने को दिया गया एग्रीगेट मार्केट सपोर्ट (AMS) इस तय सीमा से ऊपर रहा. इसी आधार पर ऑस्ट्रेलिया ने भारत से इस मामले में स्थिति स्पष्ट करने को कहा है. ऑस्ट्रेलिया ने यह भी कहा है कि वह भारत और WTO के दूसरे सदस्य देशों के साथ मार्केट प्राइस सपोर्ट और उससे जुड़े AMS के मुद्दे पर बातचीत के लिए तैयार है.
किसानों को FRP के साथ मिलती है अतिरिक्त मदद
भारत में हर चीनी सीजन की शुरुआत से पहले केंद्र सरकार गन्ने का फेयर एंड रिम्यूनरेटिव प्राइस यानी FRP तय करती है. यह वह न्यूनतम कीमत है, जिसके आधार पर चीनी मिलों को किसानों से खरीदे गए गन्ने का भुगतान करना होता है. इसके अलावा गन्ने में बेहतर रिकवरी और उत्पादन दक्षता के आधार पर किसानों को प्रीमियम भी मिलता है. वहीं उत्तर प्रदेश जैसे कुछ राज्यों में सरकार की ओर से स्टेट एडवाइज्ड प्राइस यानी SAP भी तय किया जाता है. इससे किसानों को केंद्र की ओर से तय FRP के अलावा राज्य स्तर पर भी बेहतर कीमत मिल सकती है. यही वजह है कि भारत की गन्ना नीति में किसानों को कीमत के स्तर पर काफी सुरक्षा मिलती है.
1.52 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचा समर्थन
ऑस्ट्रेलिया की ओर से WTO में दिए गए आंकड़ों के मुताबिक भारत का मार्केट प्राइस सपोर्ट 2018-19 में करीब 1.125 लाख करोड़ रुपये यानी 15.9 अरब डॉलर था. यह बढ़कर 2024-25 में करीब 1.52 लाख करोड़ रुपये यानी 17.7 अरब डॉलर हो गया. इससे पहले 2022-23 में यह आंकड़ा करीब 1.55 लाख करोड़ रुपये यानी 18.9 अरब डॉलर के सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गया था.
ऑस्ट्रेलिया इन्हीं आंकड़ों को आधार बनाकर कह रहा है कि भारत का गन्ना समर्थन WTO की तय सीमा से काफी ज्यादा रहा है. हालांकि, इस पूरे मामले का असर आगे भारत की गन्ना और चीनी नीति पर कितना पड़ेगा, यह WTO में होने वाली चर्चा और भारत के जवाब पर निर्भर करेगा.