यूरिया आयात में बड़ी हलचल, सबसे सस्ती बोली से सरकार को राहत, लेकिन इस बात ने बढ़ाई टेंशन

विशेषज्ञों का मानना है कि फिलहाल सस्ती बोली से सरकार को कुछ राहत जरूर मिलेगी और रबी व खरीफ सीजन में यूरिया की उपलब्धता बेहतर हो सकती है. लेकिन लंबे समय में सिर्फ आयात के सहारे खेती को चलाना सही रणनीति नहीं है. घरेलू उत्पादन बढ़ाने, यूरिया के संतुलित इस्तेमाल और वैकल्पिक उर्वरकों को अपनाने पर जोर देना जरूरी होगा.

Kisan India
नई दिल्ली | Published: 7 Jan, 2026 | 03:40 PM

Urea Import: देश में किसानों के लिए यूरिया सबसे जरूरी खाद मानी जाती है. हर फसल सीजन में इसकी मांग अचानक बढ़ जाती है और अगर आपूर्ति में थोड़ी भी कमी हो जाए, तो बाजार में अफरा-तफरी मच जाती है. ऐसे ही हालात के बीच सरकार की ओर से कराए गए ताजा यूरिया आयात टेंडर से एक तरफ राहत की खबर आई है, तो दूसरी तरफ आयात पर बढ़ती निर्भरता को लेकर नई बहस भी शुरू हो गई है.

सरकार के टेंडर में रिकॉर्ड के करीब कम दाम

बिजनेस लाइन की रिपोर्ट के अनुसार, सरकार की ओर से यूरिया आयात की जिम्मेदारी संभालने वाली नेशनल फर्टिलाइजर्स लिमिटेड (NFL) ने हाल ही में 15 लाख टन यूरिया आयात के लिए वैश्विक टेंडर जारी किया था. इस टेंडर में वेस्ट कोस्ट यानी गुजरात के बंदरगाहों पर डिलीवरी के लिए सबसे कम बोली 424.80 डॉलर प्रति टन सामने आई है. वहीं ईस्ट कोस्ट, यानी आंध्र प्रदेश के बंदरगाहों के लिए यह दर 426.80 डॉलर प्रति टन रही.

इस टेंडर में अमेरिका की कोच फर्टिलाइजर सबसे कम बोली लगाने वाली कंपनी बनी. कंपनी ने गुजरात के पीपावाव, दीनदयाल (पूर्व कांडला) और मुंद्रा बंदरगाहों के लिए सबसे सस्ती कीमत पेश की, जबकि काकीनाडा और विशाखापट्टनम के लिए थोड़ा ज्यादा दाम बताया.

अलग-अलग कंपनियों की अलग सोच

इस टेंडर में जहां कुछ कंपनियों ने प्रतिस्पर्धी दरें रखीं, वहीं कुछ बोली इतनी ऊंची रहीं कि सबको हैरानी हुई. एक कंपनी ने कुछ बंदरगाहों के लिए 500 डॉलर प्रति टन से भी ज्यादा की बोली लगाई. इससे साफ पता चलता है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में यूरिया की कीमतों को लेकर अभी भी अनिश्चितता बनी हुई है. सप्लाई, शिपिंग खर्च और वैश्विक मांग को देखते हुए कंपनियां अपने-अपने हिसाब से दाम तय कर रही हैं.

पिछली बोली से तुलना करें तो क्या बदला

इससे पहले सरकार की ओर से यूरिया आयात का टेंडर इंडियन पोटाश लिमिटेड (IPL) के जरिए कराया गया था. उस समय आयातित यूरिया की कीमत करीब 418 डॉलर प्रति टन रही थी. हालांकि उस टेंडर में भी 20 लाख टन की मांग के बावजूद सरकार ने 15 लाख टन का ही सौदा फाइनल किया था. मौजूदा टेंडर में कीमतें थोड़ी ज्यादा जरूर हैं, लेकिन वैश्विक हालात को देखते हुए इन्हें संतुलित माना जा रहा है.

किसानों तक सस्ती खाद, सरकार पर भारी बोझ

भारत में किसान को 45 किलो की एक बोरी यूरिया सिर्फ 267 रुपये में मिलती है. अगर इसे टन के हिसाब से देखें, तो यह कीमत करीब 5,900 रुपये प्रति टन बैठती है. वहीं आयातित यूरिया की असल लागत 38 हजार रुपये प्रति टन से ज्यादा है. इस अंतर को सरकार सब्सिडी के जरिए पूरा करती है.

यही वजह है कि जैसे-जैसे आयात बढ़ता है, वैसे-वैसे सरकारी खजाने पर बोझ भी बढ़ता जाता है. इसके बावजूद किसानों को समय पर खाद उपलब्ध कराना सरकार की मजबूरी है, क्योंकि खेती की रफ्तार यूरिया पर काफी हद तक निर्भर करती है.

क्यों तेजी से बढ़ रहा है आयात

फर्टिलाइजर एसोसिएशन ऑफ इंडिया (FAI) के आंकड़ों के मुताबिक चालू वित्त वर्ष 2025-26 के अप्रैल से नवंबर के बीच यूरिया आयात में 120 प्रतिशत की जबरदस्त बढ़ोतरी हुई है. इस दौरान देश ने 7.17 मिलियन टन यूरिया आयात किया.

इसी अवधि में यूरिया की बिक्री 25.40 मिलियन टन तक पहुंच गई, जो पिछले साल के मुकाबले ज्यादा है. लेकिन चिंता की बात यह है कि घरेलू उत्पादन में 3.7 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है और यह घटकर 19.75 मिलियन टन रह गया.

उत्पादन घटा, मांग बढ़ी

एफएआई के महानिदेशक सुरेश कुमार चौधरी के अनुसार, भारत में उर्वरक प्रबंधन की दिशा में एक बड़ा बदलाव देखा जा रहा है. एक तरफ मांग लगातार बढ़ रही है, दूसरी तरफ घरेलू उत्पादन उस रफ्तार से नहीं बढ़ पा रहा. यही कारण है कि आयात पर निर्भरता बढ़ी है.

उनका कहना है कि नाइट्रोजन और फॉस्फेट जैसे जरूरी पोषक तत्वों की आपूर्ति के लिए आयात जरूरी हो गया है, लेकिन साथ ही देश में फॉस्फेट आधारित उर्वरकों और वैकल्पिक खादों को भी बढ़ावा दिया जा रहा है, ताकि संतुलन बना रहे.

विशेषज्ञों का मानना है कि फिलहाल सस्ती बोली से सरकार को कुछ राहत जरूर मिलेगी और रबी व खरीफ सीजन में यूरिया की उपलब्धता बेहतर हो सकती है. लेकिन लंबे समय में सिर्फ आयात के सहारे खेती को चलाना सही रणनीति नहीं है.

घरेलू उत्पादन बढ़ाने, यूरिया के संतुलित इस्तेमाल और वैकल्पिक उर्वरकों को अपनाने पर जोर देना जरूरी होगा. तभी किसानों को समय पर खाद मिलेगी और सरकार पर सब्सिडी का दबाव भी कुछ कम हो सकेगा.

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