edible oil imports: भारत में खाद्य तेलों की बढ़ती मांग और घरेलू उत्पादन की कमी के बीच अब नेपाल से होने वाले ड्यूटी फ्री आयात ने नया असर दिखाना शुरू कर दिया है. वित्त वर्ष 2025-26 में भारत का कुल खाद्य तेल आयात करीब 3 प्रतिशत बढ़ गया है. उद्योग संगठन सॉल्वेंट एक्सट्रैक्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (SEA) के आंकड़ों के मुताबिक इस दौरान भारत ने 166.51 लाख टन खाद्य तेल आयात किया, जबकि पिछले वित्त वर्ष 2024-25 में यह आंकड़ा 161.82 लाख टन था.
दिलचस्प बात यह है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में खाद्य तेलों की कीमतें ऊंची रहने और डॉलर के मुकाबले रुपये के कमजोर होने के बावजूद भारत का आयात बढ़ा है. विशेषज्ञों का मानना है कि इसके पीछे सबसे बड़ी वजह नेपाल से बढ़ा ड्यूटी फ्री आयात है.
नेपाल से दोगुना बढ़ा खाद्य तेल आयात
बिजनेस लाइन की खबर के अनुसार, सॉल्वेंट एक्सट्रैक्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया के कार्यकारी निदेशक बीवी मेहता के अनुसार नेपाल से आने वाले खाद्य तेलों में इस साल रिकॉर्ड बढ़ोतरी हुई है. नेपाल ने SAFTA यानी दक्षिण एशियाई मुक्त व्यापार समझौते के तहत भारत को ड्यूटी फ्री यानी बिना आयात शुल्क के खाद्य तेल निर्यात किया. इसी सुविधा का फायदा उठाकर नेपाल से भारत आने वाले खाद्य तेल का आयात एक साल में दोगुने से ज्यादा बढ़ गया.
वित्त वर्ष 2025-26 में नेपाल ने भारत को करीब 7.36 लाख टन खाद्य तेल निर्यात किया, जबकि पिछले साल यह केवल 3.45 लाख टन था. यानी इसमें करीब 113 प्रतिशत की भारी बढ़ोतरी दर्ज की गई.
सबसे ज्यादा आया रिफाइंड सोयाबीन तेल
नेपाल से आने वाले खाद्य तेलों में सबसे बड़ा हिस्सा रिफाइंड सोयाबीन तेल का रहा. इसके अलावा थोड़ी मात्रा में सूरजमुखी तेल, RBD पामोलीन और रेपसीड तेल भी भारत आया. विशेषज्ञों का कहना है कि नेपाल को SAFTA समझौते के तहत मिलने वाली शून्य शुल्क सुविधा ने भारतीय बाजार में उसकी स्थिति मजबूत कर दी है. अगर यह सुविधा नहीं होती, तो भारत का कुल खाद्य तेल आयात शायद पिछले साल से भी कम रहता.
भारत अब भी आयात पर निर्भर
भारत दुनिया के सबसे बड़े खाद्य तेल आयातकों में शामिल है. देश में घरेलू उत्पादन कुल जरूरत का केवल करीब 40 प्रतिशत ही पूरा कर पाता है. बाकी जरूरतों के लिए भारत को विदेशों पर निर्भर रहना पड़ता है.
बीवी मेहता के मुताबिक भारत में तिलहन उत्पादन बढ़ाने में कई चुनौतियां हैं. कम उत्पादकता, छोटे और बंटे हुए खेत, सिंचाई की कमी और किसानों का गेहूं-धान जैसी फसलों की ओर ज्यादा झुकाव इसकी बड़ी वजहें हैं. यही कारण है कि देश में सोयाबीन, सरसों, सूरजमुखी और दूसरी तिलहन फसलों का उत्पादन मांग के मुकाबले काफी कम है.
रुपये की कमजोरी और महंगे तेल का असर
इस साल अंतरराष्ट्रीय बाजार में खाद्य तेलों की कीमतें लगातार ऊंची बनी हुई हैं. वहीं डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया भी कमजोर हुआ है. आमतौर पर ऐसे हालात में आयात घटता है, क्योंकि विदेशों से सामान खरीदना महंगा पड़ता है. लेकिन घरेलू मांग इतनी ज्यादा है कि भारत को महंगे दामों पर भी खाद्य तेल खरीदना पड़ रहा है. यही वजह है कि खाद्य तेलों की कीमतों का असर सीधे आम लोगों की रसोई पर दिखाई दे रहा है.
सरकार की चिंता बढ़ी
खाद्य तेलों पर बढ़ती निर्भरता सरकार की चिंता भी बढ़ा रही है. अधिक आयात का मतलब है कि देश से ज्यादा विदेशी मुद्रा बाहर जाएगी. इससे व्यापार घाटा और आर्थिक दबाव बढ़ सकता है. इसी को देखते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में लोगों से खाद्य तेल की खपत में संयम बरतने की अपील की थी. उनका कहना था कि जरूरत से ज्यादा तेल का इस्तेमाल कम करने और घरेलू उत्पादन बढ़ाने से आयात पर निर्भरता घटाई जा सकती है.
घरेलू उत्पादन बढ़ाने पर जोर
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को लंबे समय में खाद्य तेल आयात पर निर्भरता कम करनी होगी. इसके लिए तिलहन उत्पादन बढ़ाना बेहद जरूरी है. अगर किसानों को बेहतर बीज, आधुनिक तकनीक, सिंचाई सुविधा और सही समर्थन मूल्य मिले तो देश में उत्पादन बढ़ाया जा सकता है. साथ ही खाद्य तेल उद्योग में वैल्यू एडिशन और प्रोसेसिंग को बढ़ावा देने की भी जरूरत है. SEA का कहना है कि घरेलू उत्पादन मजबूत होने से न केवल आयात कम होगा, बल्कि देश की खाद्य तेल सुरक्षा भी मजबूत होगी.