मार्च में भारत का खाद्य तेल आयात 9.2 प्रतिशत घटा, सरसों की अच्छी पैदावार बनी गिरावट की वजह

इस गिरावट का एक बड़ा कारण देश में सरसों की अच्छी पैदावार है. रबी सीजन में सरसों की फसल अच्छी रही, जिससे घरेलू बाजार में तेल की उपलब्धता बढ़ गई. जब स्थानीय स्तर पर पर्याप्त तेल उपलब्ध होता है, तो आयात की जरूरत अपने आप कम हो जाती है.

Kisan India
नई दिल्ली | Published: 14 Apr, 2026 | 07:36 AM

Edible oil imports 2026: भारत में खाद्य तेल यानी कुकिंग ऑयल का बाजार हमेशा से काफी हद तक आयात पर निर्भर रहा है. लेकिन हाल के आंकड़े बताते हैं कि मार्च 2026 में खाद्य तेल के आयात में गिरावट दर्ज की गई है. पहली नजर में यह एक सामान्य बदलाव लग सकता है, लेकिन इसके पीछे कई बड़े आर्थिक, वैश्विक और घरेलू कारण छिपे हुए हैं, जो आने वाले समय में बाजार की दिशा तय कर सकते हैं.

मार्च में क्यों घटी खाद्य तेल की खरीद

सॉल्वेंट एक्सट्रैक्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (SEA) के अनुसार, मार्च 2026 में भारत ने करीब 11.73 लाख टन खाद्य तेल आयात किया, जबकि फरवरी में यह आंकड़ा 12.92 लाख टन था. यानी एक महीने में करीब 9.2 प्रतिशत की गिरावट आई है.

यह गिरावट अचानक नहीं आई, बल्कि बाजार में मांग के संतुलन का परिणाम है. जब कीमतें ज्यादा होती हैं और देश के अंदर पर्याप्त स्टॉक मौजूद होता है, तो आयातक खरीद कम कर देते हैं. इस बार भी कुछ ऐसा ही देखने को मिला.

घरेलू उत्पादन ने दिया सहारा

इस गिरावट का एक बड़ा कारण देश में सरसों की अच्छी पैदावार है. रबी सीजन में सरसों की फसल अच्छी रही, जिससे घरेलू बाजार में तेल की उपलब्धता बढ़ गई. जब स्थानीय स्तर पर पर्याप्त तेल उपलब्ध होता है, तो आयात की जरूरत अपने आप कम हो जाती है. इससे कीमतों पर भी कुछ हद तक नियंत्रण रहता है और उपभोक्ताओं को राहत मिलती है.

महंगे हुए विदेशी तेल, आयात हुआ मुश्किल

वैश्विक बाजार में खाद्य तेलों की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं. पाम ऑयल के दाम 50 से 75 डॉलर प्रति टन तक बढ़े हैं, जबकि सोयाबीन और सूरजमुखी तेल में 190 से 200 डॉलर प्रति टन तक की तेजी आई है. इसके साथ ही भारतीय रुपये की कीमत में भी गिरावट आई है. पिछले एक साल में रुपये में करीब 7.2 प्रतिशत की कमजोरी आई है. इसका सीधा असर यह हुआ कि आयात और महंगा हो गया. ऐसे में आयातक और रिफाइनर अब सोच-समझकर खरीदारी कर रहे हैं और जरूरत से ज्यादा स्टॉक नहीं बना रहे.

पहले क्यों बढ़ गया था आयात

अगर पिछले कुछ महीनों की बात करें, तो दिसंबर से फरवरी के बीच आयात में तेजी देखी गई थी. इसका कारण था वैश्विक अनिश्चितता. रूस-यूक्रेन युद्ध के चलते सूरजमुखी तेल की सप्लाई प्रभावित हो रही थी. वहीं इंडोनेशिया और मलेशिया जैसे देशों से पाम ऑयल की उपलब्धता को लेकर भी चिंता बनी हुई थी. इसके अलावा पश्चिम एशिया में तनाव के कारण माल ढुलाई महंगी हो गई थी. इन सभी कारणों से आयातकों ने पहले ही ज्यादा तेल खरीद लिया, ताकि भविष्य में कोई कमी न हो.

कुल मिलाकर आयात अभी भी ज्यादा

हालांकि मार्च में गिरावट आई है, लेकिन पूरे तेल वर्ष 2025-26 के पहले पांच महीनों (नवंबर से मार्च) की बात करें, तो भारत ने 64.52 लाख टन खाद्य तेल आयात किया है.

यह पिछले साल के 59.30 लाख टन से करीब 8.8 प्रतिशत ज्यादा है. इसका मतलब साफ है कि भारत अभी भी खाद्य तेल के लिए विदेशों पर काफी निर्भर है.

पाम ऑयल का बढ़ता दबदबा

भारत के आयात में पाम ऑयल की हिस्सेदारी सबसे ज्यादा है. नवंबर से मार्च के बीच इसका आयात बढ़कर 34.49 लाख टन हो गया है. इसमें खास बात यह है कि कच्चे पाम ऑयल (CPO) का आयात ज्यादा हुआ है. इसका मतलब है कि भारत अब कच्चा तेल आयात कर उसे देश में ही रिफाइन कर रहा है, जिससे घरेलू उद्योग को बढ़ावा मिल रहा है.

रिफाइंड तेल का घटता हिस्सा

एक बड़ा बदलाव यह भी देखने को मिला है कि रिफाइंड तेल का आयात तेजी से घटा है. पहले जहां इसका हिस्सा 16 प्रतिशत था, अब यह घटकर सिर्फ 3 प्रतिशत रह गया है. इसके उलट कच्चे तेल का हिस्सा बढ़कर 97 प्रतिशत हो गया है. यह बदलाव दिखाता है कि भारत अब वैल्यू एडिशन पर ज्यादा ध्यान दे रहा है.

किन देशों पर निर्भर है भारत

भारत के खाद्य तेल आयात का बड़ा हिस्सा कुछ ही देशों से आता है. पाम ऑयल के लिए इंडोनेशिया और मलेशिया पर निर्भरता है. सोयाबीन तेल के लिए अर्जेंटीना और ब्राजील, जबकि सूरजमुखी तेल के लिए रूस और यूक्रेन प्रमुख सप्लायर हैं. इस तरह की निर्भरता जोखिम भरी होती है, क्योंकि किसी भी देश में संकट या नीति बदलाव का असर सीधे भारत के बाजार पर पड़ता है.

आयात पर दबाव

विशेषज्ञों का मानना है कि अगर अंतरराष्ट्रीय कीमतें ऊंची बनी रहती हैं और रुपये में कमजोरी जारी रहती है, तो आने वाले समय में आयात दबाव में रह सकता है. हालांकि अगर कीमतों में गिरावट आती है या घरेलू उत्पादन कम होता है, तो आयात फिर बढ़ सकता है.

लंबे समय में भारत को तिलहन उत्पादन बढ़ाने, नए आयात स्रोत तलाशने और सप्लाई को विविध बनाने की जरूरत है, ताकि जोखिम कम किया जा सके.

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