आंध्र प्रदेश के आम पल्प सेक्टर को भारी नुकसान, 3 लाख टन से ज्यादा स्टॉक गोदामों में फंसा, ये है वजह

इस संकट के कारण निर्यात की लागत भी काफी बढ़ गई है. कंटेनर कंपनियों ने अब हर कंटेनर पर करीब 2000 डॉलर का ‘वॉर रिस्क सरचार्ज’ लगाना शुरू कर दिया है. इसके अलावा बीमा कंपनियों ने भी अपने चार्ज तीन से चार गुना तक बढ़ा दिए हैं.

Kisan India
नई दिल्ली | Published: 21 Apr, 2026 | 09:09 AM

Andhra mango pulp export crisis: भारत में आम सिर्फ एक फल नहीं, बल्कि किसानों और उद्योगों की आजीविका का बड़ा आधार है. खासकर आंध्र प्रदेश का चित्तूर जिला आम के प्रोसेस्ड उत्पादों, खासकर आम के पल्प (गूदे) के लिए दुनियाभर में जाना जाता है. लेकिन इस समय यह पूरा उद्योग एक बड़े संकट से गुजर रहा है. पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष ने इस कारोबार पर गहरा असर डाला है, जिससे निर्यात लगभग ठप हो गया है और हजारों किसानों व कारोबारियों की चिंता बढ़ गई है.

पश्चिम एशिया संकट का सीधा असर

द न्यू इंडियन एक्सप्रेस की खबर के अनुसार, पश्चिम एशिया में चल रहे युद्ध जैसे हालातों के कारण समुद्री मार्ग प्रभावित हो गए हैं. कई बंदरगाह अपनी पूरी क्षमता से काम नहीं कर पा रहे हैं, जिससे आम पल्प की खेप समुद्र में ही अटक गई है या गोदामों में पड़ी रह गई है. इसका सबसे बड़ा असर यह हुआ है कि चित्तूर जिले से होने वाला निर्यात लगभग रुक गया है. उद्योग से जुड़े लोगों के मुताबिक, 90 प्रतिशत से ज्यादा पल्प स्टॉक फिलहाल गोदामों और पोर्ट वेयरहाउस में फंसा हुआ है.

3 लाख टन से ज्यादा पल्प फंसा

उद्योग के आंकड़ों के अनुसार, इस समय 3 लाख टन से ज्यादा आम का पल्प गोदामों में पड़ा हुआ है. यह एक बहुत बड़ी मात्रा है, जो यह दिखाती है कि संकट कितना गहरा है. निर्यात रुकने के कारण कंपनियों के पास स्टॉक बढ़ता जा रहा है, लेकिन उसे बेचने का कोई रास्ता नहीं मिल रहा. इससे उद्योग की आर्थिक स्थिति कमजोर हो रही है.

बढ़ती लागत ने तोड़ी कमर

इस संकट के कारण निर्यात की लागत भी काफी बढ़ गई है. कंटेनर कंपनियों ने अब हर कंटेनर पर करीब 2000 डॉलर का ‘वॉर रिस्क सरचार्ज’ लगाना शुरू कर दिया है. इसके अलावा बीमा कंपनियों ने भी अपने चार्ज तीन से चार गुना तक बढ़ा दिए हैं. इसका मतलब यह है कि अब निर्यात करना पहले की तुलना में कहीं ज्यादा महंगा हो गया है.

एक कंटेनर, जिसमें करीब 7.4 टन पल्प होता है, उस पर अब बहुत कम मुनाफा बच रहा है. कई कंपनियां तो अपना पुराना स्टॉक निकालने के लिए कम कीमत पर बेचने को मजबूर हैं.

भुगतान में देरी से बढ़ी मुश्किल

विदेशी खरीदारों से भुगतान समय पर नहीं मिल पा रहा है, जिससे प्रोसेसिंग यूनिट्स के सामने नकदी की समस्या खड़ी हो गई है. इसका सीधा असर यह हुआ है कि इस सीजन में कंपनियां किसानों से आम खरीदने में भी असमर्थ हो रही हैं. इससे पूरी सप्लाई चेन प्रभावित हो गई है.

किसानों पर पड़ा सबसे बड़ा असर

चित्तूर जिले में हर साल 6 से 7 लाख टन आम किसानों से खरीदा जाता है, जिससे करीब 3 से 4 लाख टन पल्प तैयार होता है. इसमें ज्यादातर हिस्सा टोटापुरी किस्म का होता है. करीब 70 प्रतिशत पल्प विदेशों, खासकर खाड़ी देशों और यूरोप में निर्यात किया जाता है, जबकि बाकी 30 प्रतिशत घरेलू बाजार में बिकता है. अब जब निर्यात रुक गया है, तो प्रोसेसिंग यूनिट्स की मांग कम हो गई है और किसानों के सामने अपने फल बेचने की समस्या खड़ी हो गई है.

यूरोप निर्यात भी प्रभावित

सिर्फ खाड़ी देशों ही नहीं, बल्कि यूरोप को होने वाला निर्यात भी प्रभावित हुआ है. रेड सी (लाल सागर) में हो रहे हमलों के कारण जहाजों की आवाजाही प्रभावित हुई है, जिससे यूरोप तक सामान भेजना मुश्किल हो गया है.

कितना बड़ा आर्थिक नुकसान?

विशेषज्ञों के अनुसार, इस संकट के कारण आम पल्प उद्योग को करीब 750 करोड़ रुपये का नुकसान होने का अनुमान है. यह नुकसान केवल कंपनियों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका असर किसानों, मजदूरों और पूरे व्यापार तंत्र पर पड़ रहा है.

तकनीक और पैकेजिंग में बदलाव

आजकल अंतरराष्ट्रीय मानकों को ध्यान में रखते हुए आम पल्प को 215 किलो के छह-लेयर एसेप्टिक बैग्स में पैक किया जा रहा है, जो पहले इस्तेमाल होने वाले टिन पैकिंग से ज्यादा सुरक्षित और बेहतर है. लेकिन मौजूदा संकट ने यह दिखा दिया है कि केवल तकनीक और गुणवत्ता ही काफी नहीं है, बल्कि मजबूत लॉजिस्टिक्स और स्थिर वैश्विक स्थिति भी जरूरी है.

इसी के साथ उद्योग से जुड़े संगठनों ने सरकार से हस्तक्षेप की मांग की है. उनका कहना है कि अगर जल्द कदम नहीं उठाए गए, तो यह संकट और गहरा सकता है.

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