Mango Shoulder Browning Disease: आम को फलों का राजा कहा जाता है और इसकी सुंदरता ही बाजार में उसकी असली पहचान बनती है. चमकदार, दाग-धब्बों से मुक्त और आकर्षक रंग वाले आमों की मांग हमेशा अधिक रहती है. लेकिन पिछले कुछ सालों में बदलते मौसम, बढ़ती नमी और अनियमित मानसून ने आम उत्पादकों के सामने एक नई समस्या खड़ी कर दी है. यह समस्या है ‘शोल्डर ब्राउनिंग’ रोग, जो धीरे-धीरे आम की बाहरी गुणवत्ता को खराब कर देता है. बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड और पश्चिम बंगाल जैसे आर्द्र क्षेत्रों में यह समस्या तेजी से बढ़ रही है.
बिहार स्थित डॉ. राजेन्द्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय के कृषि वैज्ञानिक डॉ. एस.के. सिंह ने किसान इंडिया (Kisan India) को बताया कि, यह रोग देखने में सामान्य लगता है, लेकिन इसका असर सीधे किसानों की कमाई, भंडारण क्षमता और निर्यात गुणवत्ता पर पड़ता है.
क्या है शोल्डर ब्राउनिंग रोग?
इस रोग में आम के डंठल के पास वाले हिस्से यानी ‘शोल्डर’ पर भूरे या काले धब्बे बनने लगते हैं. शुरुआत में ये धब्बे छोटे दिखाई देते हैं, लेकिन अधिक नमी और बारिश के कारण तेजी से फैलने लगते हैं. धीरे-धीरे पूरा फल बदरंग और कमजोर हो जाता है. कई किसान इसे मामूली दाग समझकर नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन यही संक्रमण आगे चलकर फल सड़न, एन्थ्रेक्नोज और डंठल सड़न जैसी गंभीर समस्याओं को जन्म देता है.
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आखिर क्यों बढ़ रही है यह समस्या?
- जलवायु परिवर्तन का असर: अनियमित बारिश, लंबे समय तक बादल छाए रहना और ज्यादा नमी फफूंद के विकास के लिए अनुकूल वातावरण तैयार कर रहे हैं. दिन और रात के तापमान में अचानक बदलाव भी फलों की त्वचा को कमजोर बना देता है.
- घने बाग और कम हवा: जहां पेड़ बहुत घने होते हैं और नियमित छंटाई नहीं की जाती, वहां हवा का फ्लो रुक जाता है. इससे नमी लंबे समय तक बनी रहती है और रोग तेजी से फैलता है.
- अधिक नाइट्रोजन उर्वरक: जरूरत से ज्यादा नाइट्रोजन देने से कोमल वृद्धि बढ़ती है, जो फफूंद संक्रमण के प्रति अधिक संवेदनशील होती है.
- रस चूसने वाले कीट: मिलीबग, थ्रिप्स और हॉपर जैसे कीट फलों पर मधुरस छोड़ते हैं, जिस पर कालिखी फफूंद तेजी से विकसित होती है और फल काला पड़ने लगता है.
किन किस्मों में ज्यादा खतरा?
पतली त्वचा और देर से पकने वाली किस्मों में यह समस्या अधिक देखने को मिलती है. खासतौर पर दशहरी, लंगड़ा, चौसा, मालदा और अम्रपाली जैसी लोकप्रिय किस्में ज्यादा प्रभावित होती हैं.
रोग से बचाव के वैज्ञानिक उपाय
- गिरे हुए संक्रमित फल और पत्तियों को तुरंत हटाएं. जलभराव न होने दें और पेड़ों के बीच पर्याप्त दूरी बनाए रखें.
- मानसून से पहले हल्की छंटाई करने से हवा और धूप का प्रवाह बेहतर होता है.
- फल बनने के बाद उन्हें विशेष कागज या कपड़े के बैग से ढकने पर बारिश और फफूंद से सुरक्षा मिलती है.
फफूंदनाशी का सही उपयोग
विशेषज्ञों के अनुसार मानसून शुरू होने से पहले और लगातार बारिश के दौरान सुरक्षात्मक फफूंदनाशी छिड़काव बेहद जरूरी है. इसके लिए आप नीचे दिए गए फफूंदनाशी (कोई एक) का इस्तेमाल कर सकते हैं.
- डाइफेनोकोनाजोल 0.05 फीसदी
- प्रोपिनेब 70 डब्ल्यूपी 0.2 फीसदी
- कार्बेन्डाजिम + मैनकोजेब मिश्रण
- एजॉक्सीस्ट्रोबिन + डाइफेनोकोनाजोल संयोजन
- कॉपर ऑक्सीक्लोराइड का सुरक्षात्मक उपयोग
छिड़काव का सही समय
- पहली बारिश से पहले
- लगातार वर्षा के बाद
- 12-15 दिन के अंतराल पर आवश्यकता अनुसार
एक ही रसायन का बार-बार इस्तेमाल न करें, नहीं तो फफूंद में प्रतिरोधक क्षमता विकसित हो सकती है.
तुड़ाई और पैकिंग में बरतें सावधानी
तुड़ाई के समय फल को 1-2 सेंटीमीटर डंठल सहित तोड़ना चाहिए. इसके बाद फल को उल्टा रखकर दूधिया रस निकाल देना चाहिए, क्योंकि यही रस बाद में काले धब्बों का कारण बनता है. गर्म पानी उपचार भी एक असरदार तकनीक मानी जा रही है. इसमें आम को 52-55 डिग्री सेल्सियस गर्म पानी में कुछ मिनट तक डुबोया जाता है, जिससे सड़न कम होती है और भंडारण क्षमता बढ़ती है.