अरहर की ज्यादा पैदावार का तरीका जान लें किसान, कृषि विभाग ने बताए बुवाई से कटाई तक के टिप्स

अरहर की खेती में सही समय पर बुवाई, उन्नत किस्मों का चयन और वैज्ञानिक प्रबंधन किसानों की कमाई बढ़ा सकते हैं. जुलाई के अंत तक कम अवधि वाली किस्मों की बुवाई करने से फसल सर्दियों के नुकसान से बचती है और बेहतर उत्पादन मिलने की संभावना बढ़ जाती है.

Saurabh Sharma
नोएडा | Published: 26 Jul, 2026 | 10:49 AM

Pigeon Pea Farming: खरीफ सीजन में अरहर किसानों के लिए एक महत्वपूर्ण दलहनी फसल मानी जाती है. कम लागत में तैयार होने वाली यह फसल न केवल अच्छी आमदनी का जरिया बनती है, बल्कि मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने में भी मदद करती है. कृषि विभाग के अनुसार, अरहर की खेती में बेहतर उत्पादन के लिए समय पर बुवाई, उन्नत किस्मों का चयन और वैज्ञानिक प्रबंधन बेहद जरूरी है. यदि किसान जुलाई के अंत तक कम अवधि वाली किस्मों की बुवाई करते हैं, तो फसल सर्दियों में पाले और कोहरे से बच सकती है और बेहतर पैदावार मिलने की संभावना बढ़ जाती है.

जुलाई अंत तक करें बुवाई, सर्दियों में मिलेगा बड़ा फायदा

कृषि विभाग के अनुसार, अरहर की बुवाई का सही समय  उत्पादन पर सीधा असर डालता है. यदि किसान जून या मध्य जुलाई तक बुवाई नहीं कर पाए हैं, तो जुलाई के अंत तक कम अवधि वाली किस्मों की बुवाई कर सकते हैं. ऐसी किस्में जल्दी तैयार हो जाती हैं और सर्दियों के मौसम में फसल को नुकसान का खतरा कम रहता है. विशेषज्ञों के अनुसार, जुलाई अंत में बोई गई अरहर की फसल अक्टूबर के आसपास फूल देने लगती है. इस समय तापमान अनुकूल रहने से सूंडी जैसे कीटों का प्रभाव कम हो सकता है. वहीं, नवंबर-दिसंबर तक फसल तैयार होने से जनवरी के पाले और घने कोहरे से फसल को बचाया जा सकता है.

इन उन्नत किस्मों से मिलेगा बेहतर उत्पादन

अरहर की अच्छी पैदावार  के लिए किसानों को कम अवधि में तैयार होने वाली उन्नत किस्मों का चयन करना चाहिए. कृषि विभाग के अनुसार, उपास-120, पूसा अगेती, पूसा-74, पूसा-84, आईसीपीएल-88039, पूसा-991 और पूसा-992 जैसी किस्में बेहतर उत्पादन देने वाली मानी जाती हैं. अरहर की खेती के लिए 25 से 35 डिग्री सेल्सियस तापमान और 600 से 1000 मिलीमीटर तक बारिश उपयुक्त रहती है. सही किस्म के चयन से पौधों का विकास बेहतर होता है और दानों की गुणवत्ता भी अच्छी रहती है.

बीज उपचार और सिंचाई से बढ़ेगी फसल की ताकत

कृषि विभाग के अनुसार, बुवाई से पहले बीज उपचार  करना बेहद जरूरी है. किसान बीजों को राइजोबियम कल्चर और पीएसबी (फॉस्फेट सॉल्युबिलाइजिंग बैक्टीरिया) से उपचारित करें. इसके अलावा ट्राइकोडर्मा विरिडे का इस्तेमाल करने से पौधों की जड़ों का विकास अच्छा होता है और मिट्टी से जुड़े रोगों से सुरक्षा मिलती है. अरहर को सामान्य तौर पर बारिश आधारित फसल माना जाता है, लेकिन लंबे समय तक बारिश न होने पर फूल आने और फलियां बनने के समय जीवनरक्षक सिंचाई करना फायदेमंद रहता है. खरपतवार नियंत्रण के लिए बुवाई के 20 से 25 दिन बाद पहली और 40 से 45 दिन बाद दूसरी निराई-गुड़ाई करनी चाहिए.

जलभराव से बचाएं फसल, उकठा रोग पर रखें नजर

बरसात के मौसम में खेत में अधिक नमी और जलभराव से अरहर  में उकठा रोग का खतरा बढ़ सकता है. कृषि विभाग के अनुसार, किसान खेत में पानी निकासी की बेहतर व्यवस्था रखें और रोगग्रस्त पौधों को तुरंत हटाकर नष्ट कर दें. यदि रोग के लक्षण दिखाई दें तो विशेषज्ञों की सलाह के अनुसार कार्बेन्डाजिम 50 डब्ल्यूपी या थायोफेनेट मिथाइल का घोल बनाकर पौधों की जड़ों के पास प्रयोग किया जा सकता है. नियमित निगरानी, संतुलित पोषण और वैज्ञानिक तकनीक अपनाकर किसान अरहर की खेती से बेहतर उत्पादन और अधिक लाभ प्राप्त कर सकते हैं.

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