Silk Farming: भारत में रेशम उत्पादन को बढ़ावा देने की कोशिशों के बीच केरल का पालक्काड जिला एक अहम केंद्र बनकर उभर रहा है. अच्छी क्वालिटी के रेशम के कीड़े के बीज के लिए पहचान रखने वाला पलक्कड़ उन 218 जिलों में शामिल है, जिन्हें देश के रेशम कारोबार को मजबूत करने के लिए चुना गया है. इसका मकसद रेशम के वैश्विक बाजार में चीन के दबदबे को कम करना और किसानों को आधुनिक तकनीक से जोड़ना है. पालक्काड के सिल्कवर्म सीड प्रोडक्शन सेंटर से मिलने वाले कीड़ों के बीज जम्मू-कश्मीर के पंपोर स्थित सेंट्रल सेरिकल्चर रिसर्च एंड ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट (CSR&TI) के लिए भी काफी अहम हैं. संस्थान इन्हीं बीजों की मदद से रेशम के कीड़ों की नई किस्मों को विकसित करने पर काम कर रहा है.
‘मेरा देश, मेरा रेशम’ योजना से किसानों को फायदा
CSR&TI के वैज्ञानिक डॉ. इरफान इलाही के मुताबिक केरल की मिट्टी और मौसम रेशम की खेती यानी सेरीकल्चर के लिए काफी अनुकूल हैं. द न्यू इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, उन्होंने बताया कि ‘मेरा देश, मेरा रेशम’ योजना के तहत देश के 218 जिलों को चुना गया है. इस पहल के जरिए किसानों को रेशम के कीड़े पालने और रेशम निकालने की आधुनिक तकनीक उपलब्ध कराने पर जोर दिया जा रहा है. साथ ही उत्पादन की क्वालिटी बेहतर करने, जरूरी ढांचा तैयार करने और फसल को बीमारी व कीटों से बचाने के वैज्ञानिक तरीकों पर भी काम किया जा रहा है.
सेब के साथ रेशम की खेती से J&K के किसानों को फायदा
जम्मू-कश्मीर में रेशम की खेती का उदाहरण देते हुए डॉ. इलाही ने बताया कि वहां 29 हजार से ज्यादा किसान सिल्कवर्म पालन से जुड़े हुए हैं. वहां कई किसान इसे मुख्य फसल के बजाय दूसरी फसल के रूप में करते हैं. किसानों की मुख्य कमाई सेब से होती है. सेब के तैयार होने में लगने वाले समय के दौरान किसान रेशम के कीड़े पालने का काम करते हैं. इससे उन्हें एक ही जमीन और साल में अतिरिक्त आमदनी का मौका मिलता है. उत्पादन के हिसाब से कई किसान सालाना करीब 1 से 2 लाख रुपये तक कमा लेते हैं. इसी मॉडल को केरल के किसान भी अपनाकर अपनी आमदनी बढ़ा सकते हैं.
केरल में 18 टन कच्चे रेशम का उत्पादन
उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2025-26 में केरल ने करीब 18 मीट्रिक टन कच्चे रेशम का उत्पादन किया. राज्य में पलक्कड़ के अलावा वायनाड, इडुक्की और त्रिशूर के कुछ इलाकों में भी रेशम की खेती की जाती है. हालांकि, पलक्कड़ में शहतूत की खेती का रकबा पिछले कुछ वर्षों में घटा है. 2019-20 में यहां करीब 144 हेक्टेयर जमीन पर शहतूत उगाया जा रहा था, जो अब घटकर करीब 90 हेक्टेयर रह गया है.
खेती का रकबा बढ़ाने की तैयारी
शहतूत रेशम के कीड़े पालने के लिए जरूरी पौधा है. इसलिए इसका रकबा बढ़ाना रेशम उत्पादन बढ़ाने के लिए जरूरी माना जा रहा है. वैज्ञानिकों की टीम ने पलक्कड़ में सर्वे किया है और अब शहतूत की खेती को फिर से बढ़ाने की योजना तैयार की जा रही है. अगर किसानों को बेहतर बीज, आधुनिक तकनीक और सही बाजार उपलब्ध होता है, तो केरल में रेशम की खेती को और बढ़ावा मिल सकता है. पलक्कड़ की पहल न सिर्फ स्थानीय किसानों की कमाई बढ़ाने में मदद कर सकती है, बल्कि भारत के रेशम क्षेत्र को वैश्विक बाजार में और मजबूत बनाने की दिशा में भी अहम कदम साबित हो सकती है.