Ashwagandha: खेतों में उगेगा आयुर्वेद का सोना.. GI टैग मिलते ही नागौरी अश्वगंधा की बढ़ी चमक
औषधीय गुणों से भरपूर अश्वगंधा की खेती अब किसानों के लिए कमाई का सबसे बड़ा जरिया बन गई है. जीआई टैग मिलने से इसकी मांग अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ गई है. कम लागत, कम पानी और कीटों के कम प्रकोप वाली यह फसल सूखे इलाकों के किसानों के लिए किसी वरदान से कम नहीं है, जो उनकी आय को दोगुना करने की ताकत रखती है.
GI Tag Ashwagandha: बदलते दौर में अब खेती सिर्फ पेट भरने का जरिया नहीं, बल्कि मोटी कमाई का बिजनेस बनती जा रही है. पारंपरिक फसलों के बजाय अब औषधीय खेती (Medicinal Farming) का बोलबाला है. इसी कड़ी में अश्वगंधा एक ऐसी फसल बनकर उभरी है जिसने किसानों की तकदीर बदल दी है. जब से खास किस्म की इस अश्वगंधा को भौगोलिक संकेतक यानी जीआई (GI) टैग मिला है, तब से इसकी मांग सातवें आसमान पर पहुंच गई है. बड़ी-बड़ी दवा कंपनियां अब सीधे किसानों के खेतों तक पहुंच रही हैं. सबसे अच्छी बात यह है कि जहां दूसरी फसलें पानी की कमी से दम तोड़ देती हैं, वहीं अश्वगंधा सूखे और कम पानी वाले इलाकों में भी सोना उगल रही है.
GI टैग का जादू
जीआई टैग मिलना किसी भी फसल के लिए सम्मान पदक जैसा होता है. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, इस खास टैग के मिलने के बाद अब इस क्षेत्र की अश्वगंधा को अंतरराष्ट्रीय पहचान मिल गई है. इसका मतलब है कि अब इस नाम से कोई और अपनी फसल नहीं बेच पाएगा. इससे न केवल मिलावट पर लगाम लगेगी, बल्कि किसानों को अपनी फसल का वह दाम मिलेगा जिसके वे असल हकदार हैं. अब यहाँ की अश्वगंधा सिर्फ स्थानीय बाजारों तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि विदेशों के बड़े फार्मास्युटिकल हब तक अपनी खुशबू बिखेरेगी.
कम खर्च, कम पानी और कीटों का झंझट भी खत्म
अश्वगंधा की खेती की सबसे बड़ी खूबसूरती इसकी सादगी है. कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार, यह फसल शुष्क और अर्ध-शुष्क क्षेत्रों के लिए वरदान है. इसमें कीटों और बीमारियों का हमला बहुत कम होता है, जिससे किसानों का कीटनाशकों पर होने वाला भारी खर्च बच जाता है. इस फसल का असली खजाना इसकी जड़ में छिपा होता है. जितनी स्वस्थ और लंबी जड़ होगी, उतनी ही अधिक उसकी औषधीय कीमत होगी. मीडिया रिपोर्ट्स बताती हैं कि वैज्ञानिक अब इसकी ऐसी किस्मों पर काम कर रहे हैं जिनकी जड़ें 140 सेंटीमीटर तक लंबी हो सकती हैं.
वैज्ञानिक तरीका अपनाएं, जड़ को हीरा बनाएं
खेती में मुनाफा तभी बढ़ता है जब उसमें विज्ञान का तड़का लगे. वैज्ञानिकों ने सलाह दी है कि अश्वगंधा की बुवाई से पहले बीजों का जैविक उपचार जरूर करें. इससे पौधों की शुरुआती बढ़वार अच्छी होती है और मिट्टी जनित रोगों का खतरा टल जाता है. इसके अलावा, जैविक खाद और वर्मी कंपोस्ट का इस्तेमाल जड़ों की चमक और गुणवत्ता बढ़ा देता है. कतार में बुवाई और ड्रिप सिंचाई जैसी आधुनिक तकनीकों को अपनाकर किसान कम संसाधनों में रिकॉर्ड पैदावार हासिल कर रहे हैं.
ट्रेनिंग और तकनीक से मजबूत होगी ग्रामीण अर्थव्यवस्था
अश्वगंधा की सफलता को देखते हुए अब सरकारी स्तर पर भी बड़े कदम उठाए जा रहे हैं. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, किसानों को जागरूक करने के लिए विशेष ट्रेनिंग कैंप और प्रदर्शनियां लगाई जा रही हैं. इसमें किसानों को न सिर्फ फसल उगाने, बल्कि उसे वैज्ञानिक तरीके से सुखाने और स्टोर करने की बारीकियां भी सिखाई जा रही हैं. सही समय पर खुदाई और सही भंडारण ही वह चाबी है जिससे अश्वगंधा की औषधीय शक्ति बरकरार रहती है. आने वाले समय में यह औषधीय फसल ग्रामीण इलाकों की अर्थव्यवस्था की रीढ़ साबित होगी.