Gehun Ki Kheti: भारत में गेहूं प्रमुख खाद्यान्न फसलों में से एक है और देश की खाद्य सुरक्षा में इसकी अहम भूमिका है. पिछले कुछ वर्षों में उन्नत किस्मों, आधुनिक तकनीकों और बेहतर उर्वरक प्रबंधन के कारण गेहूं की पैदावार में काफी बढ़ोतरी हुई है. इसके बावजूद कई क्षेत्रों में किसानों को पोषक तत्वों की कमी जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है. इन्हीं में से एक महत्वपूर्ण समस्या है पौधों में बोरॉन की कमी. इसकी वजह से गेहूं की बालियों के टेढ़ी या मुड़ने लगती है.
बिहार स्थित डॉ. राजेन्द्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय के कृषि वैज्ञानिक डॉ. एस.के. सिंह ने किसान इंडिया (Kisan India) को बताया कि, कई बार किसान गेहूं की बालियों के टेढ़ा या मुड़ जाने को किसी रोग या कीट का असर समझ लेते हैं, जबकि यह बोरॉन की कमी का संकेत होता है.
गेहूं की फसल में बोरॉन का महत्व
बोरॉन एक आवश्यक सूक्ष्म पोषक तत्व है जो पौधों की वृद्धि और विकास में अहम भूमिका निभाता है. यह पौधों में कोशिका विभाजन, फूल बनने की प्रक्रिया और दानों के सही विकास में मदद करता है. इसके अलावा बोरॉन पौधों में पोषक तत्वों के संतुलित परिवहन और परागण की प्रक्रिया को भी मजबूत बनाता है. इसलिए इसकी कमी होने पर पौधों का सामान्य विकास प्रभावित होने लगता है और फसल की गुणवत्ता भी घट जाती है.
बोरॉन की कमी के प्रमुख लक्षण
गेहूं की फसल में बोरॉन की कमी होने पर कुछ विशेष लक्षण दिखाई देते हैं, जिनकी मदद से किसान समय रहते समस्या को पहचान सकते हैं.
- बालियों का टेढ़ा या मुड़ जाना: यह सबसे प्रमुख लक्षण है. बाली हुक के आकार में मुड़ जाती है और उसका सामान्य विकास रुक जाता है.
- पौधों की धीमी ग्रोथ: बोरॉन की कमी से पौधों का तना छोटा रह जाता है और पौधे कमजोर दिखाई देते हैं.
- दानों का सही विकास न होना: कई बार बालियों में फूल तो बन जाते हैं लेकिन दाने ठीक से नहीं भरते, जिससे उत्पादन कम हो जाता है.
- ऊपरी भाग का कमजोर विकास: पौधे का ऊपरी हिस्सा ठीक से विकसित नहीं हो पाता और पौधे का संतुलित विकास बाधित हो जाता है.
बोरॉन की कमी के प्रमुख कारण
खेती में कई कारणों से मिट्टी में बोरॉन की उपलब्धता कम हो सकती है.
- रेतीली मिट्टी – ऐसी मिट्टी में बोरॉन जल्दी बह जाता है.
- अधिक वर्षा या सिंचाई – ज्यादा पानी से पोषक तत्व मिट्टी से बाहर निकल जाते हैं.
- क्षारीय मिट्टी – जिन मिट्टियों का pH 7.5 से अधिक होता है, उनमें बोरॉन की उपलब्धता कम हो जाती है.
- केवल NPK उर्वरकों का उपयोग – लंबे समय तक सिर्फ NPK उर्वरक डालने से सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी हो जाती है.
- देर से शाकनाशी का प्रयोग – कुछ मामलों में देर से किए गए शाकनाशी के प्रयोग से भी ऐसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं.
फसल की पैदावार पर असर
बोरॉन की कमी का सीधा असर गेहूं की उपज और गुणवत्ता पर पड़ता है.
- बालियों का विकास अधूरा रह जाता है
- दानों की संख्या कम हो जाती है
- दाने छोटे और हल्के बनते हैं
- कई फूल निष्फल रह जाते हैं
इन सभी कारणों से कुल मिलाकर 10 से 30 प्रतिशत तक उपज में कमी आ सकती है, जिससे किसानों को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ सकता है.
बोरॉन की कमी का समाधान
यदि खेत में बोरॉन की कमी की पुष्टि हो जाए तो किसान कुछ आसान उपाय अपनाकर इसे नियंत्रित कर सकते हैं.
- बोरॉन युक्त उर्वरक का प्रयोग: खेत में बोरेक्स, सोलूबोर या बोरिक एसिड जैसे उर्वरकों का उपयोग किया जा सकता है. सामान्यतः 10-15 किलोग्राम बोरेक्स प्रति हेक्टेयर मिट्टी में मिलाना लाभकारी माना जाता है.
- पत्तियों पर छिड़काव: फसल में लक्षण दिखाई देने पर 0.2 से 0.3 प्रतिशत बोरॉन घोल का पर्णीय छिड़काव किया जा सकता है.
- संतुलित उर्वरक प्रबंधन: NPK उर्वरकों के साथ-साथ सूक्ष्म पोषक तत्वों का भी संतुलित उपयोग करना जरूरी है.
- जैविक खाद का उपयोग: गोबर की खाद, कम्पोस्ट और हरी खाद मिट्टी की गुणवत्ता सुधारती हैं और पोषक तत्वों की उपलब्धता बढ़ाती हैं.
गेहूं की अच्छी पैदावार के लिए केवल बड़े पोषक तत्व ही नहीं बल्कि सूक्ष्म पोषक तत्व भी उतने ही जरूरी हैं. बोरॉन की कमी को समय पर पहचानकर उचित प्रबंधन किया जाए तो फसल की गुणवत्ता और उत्पादन दोनों को बेहतर बनाया जा सकता है.