Dhaincha Green Manure: खेती में बढ़ती लागत और मिट्टी की घटती उर्वरता के बीच किसानों को प्राकृतिक खेती की ओर बढ़ने की सलाह दी जा रही है. भारतीय किसान यूनियन (मान) के हरियाणा प्रदेश अध्यक्ष गुणी प्रकाश ठाकुर ने बताया कि किसान यदि ढैंचा की हरी खाद का उपयोग करें तो DAP, यूरिया और कई रासायनिक उत्पादों पर निर्भरता कम की जा सकती है. यह न केवल मिट्टी की सेहत सुधारता है, बल्कि फसल उत्पादन बढ़ाने में भी मददगार साबित होता है.
ढैंचा से मिलता है प्राकृतिक नाइट्रोजन का भंडार
गुणी प्रकाश ठाकुर ने बताया कि ढैंचा एक दलहनी फसल है, जिसकी जड़ों में विशेष ग्रंथियां विकसित होती हैं. ये ग्रंथियां हवा से नाइट्रोजन लेकर मिट्टी में जमा करती हैं. जब ढैंचा को हरी खाद के रूप में खेत में मिलाया जाता है, तो यह मिट्टी को भरपूर प्राकृतिक नाइट्रोजन उपलब्ध कराता है. उन्होंने कहा कि ढैंचा की खेती करने वाले किसानों को अगली फसल में यूरिया की कम आवश्यकता पड़ती है. इससे रासायनिक खादों पर होने वाला खर्च घटता है और खेती अधिक लाभकारी बनती है. धान, गेहूं और अन्य प्रमुख फसलों में इसके सकारात्मक परिणाम देखने को मिल रहे हैं.
25 से 30 प्रतिशत तक कम हो सकता है यूरिया का खर्च
किसान नेता के अनुसार, ढैंचा को खेत में मिलाने से यूरिया पर होने वाला खर्च लगभग 25 से 30 प्रतिशत तक कम किया जा सकता है. ये मिट्टी में कार्बनिक पदार्थों और जैविक कार्बन की मात्रा बढ़ाता है, जिससे भूमि की उर्वरता में सुधार होता है. उन्होंने बताया कि लगातार रासायनिक खादों के उपयोग से मिट्टी की गुणवत्ता प्रभावित होती है, जबकि ढैंचा जैसी हरी खाद भूमि को लंबे समय तक उपजाऊ बनाए रखने में मदद करती है. इससे किसानों को कम लागत में बेहतर उत्पादन प्राप्त हो सकता है.
पानी बचाने और भूमि सुधारने में भी कारगर
ढैंचा केवल पोषण ही नहीं देता, बल्कि मिट्टी की संरचना को भी बेहतर बनाता है. रेतीली मिट्टी में यह पानी रोकने की क्षमता बढ़ाता है, जबकि भारी मिट्टी में जल निकासी और वायु संचार को सुधारता है. गुणी प्रकाश ठाकुर ने बताया कि ढैंचा की पत्तियों से निकलने वाला कैल्शियम क्षारीय और लवणीय मिट्टी में मौजूद अतिरिक्त सोडियम को कम करने में मदद करता है. इससे खराब और बंजर होती जमीन को फिर से खेती योग्य बनाया जा सकता है. यही कारण है कि इसे भूमि सुधारक फसल भी माना जाता है.
खरपतवार और रोगों पर भी लगती है रोक
ढैंचा तेजी से बढ़ने वाली फसल है, जो खेत में घनी छाया बनाकर खरपतवारों को बढ़ने से रोकती है. इसके अलावा जब इसे खेत में दबाया जाता है, तो मिट्टी में लाभकारी सूक्ष्मजीवों की संख्या बढ़ जाती है. इससे फफूंद और अन्य मिट्टी जनित रोगों का खतरा कम होता है. उन्होंने किसानों को सलाह दी कि खरीफ सीजन से पहले ढैंचा की बुवाई करें और 45 से 50 दिन बाद इसे खेत में पलट दें. इससे मिट्टी को प्राकृतिक पोषण मिलेगा, रासायनिक खादों पर निर्भरता घटेगी और अगली फसल का उत्पादन बेहतर होने की संभावना बढ़ेगी.