Stubble Management: इस साल पंजाब में गेहूं की कटाई के दौरान पराली जलाने के मामलों में बड़ी बढ़ोतरी देखने को मिली है. गेहूं सीजन में खेतों में आग लगाने की 9,771 घटनाएं दर्ज की गईं, जो पिछले धान सीजन की 5,114 घटनाओं के मुकाबले करीब 91 फीसदी ज्यादा हैं. हालांकि, 2025 के गेहूं सीजन की तुलना में इस बार मामलों में करीब 5 फीसदी की मामूली कमी आई है.
द ट्रिब्यून की रिपोर्ट के मुताबिक, प्रदूषण निगरानी एजेंसियां हर साल 1 अप्रैल से 28 मई तक गेहूं की फसल के अवशेष जलाने के मामलों का रिकॉर्ड तैयार करती हैं. इस बार सबसे ज्यादा पराली जलाने की घटनाएं फिरोजपुर जिले में दर्ज हुईं, जहां 920 मामले सामने आए. इसके बाद मोगा, बठिंडा, तरनतारन, अमृतसर, गुरदासपुर और लुधियाना का स्थान रहा. गेहूं सीजन में सबसे ज्यादा एक दिन में 1,447 पराली जलाने के मामले 8 मई को दर्ज किए गए. वहीं 7 मई से 10 मई के बीच कुल 4,198 घटनाएं सामने आईं. इसके अलावा 23 मई के बाद भी 154 मामले दर्ज किए गए हैं.
गुरजीत सिंह बराड़ ने इन आंकड़ों पर सवाल उठाए
हालांकि, पंजाब कृषि विभाग के निदेशक गुरजीत सिंह बराड़ ने इन आंकड़ों पर सवाल उठाए हैं. उनका कहना है कि राज्य के हर खेत से गेहूं के अवशेष इकट्ठा कर ‘तूड़ी’ बनाई गई है, इसलिए इतने बड़े पैमाने पर पराली जलाने के दावे सही नहीं हैं. उन्होंने कहा कि कई मामलों में ‘तूड़ी’ तैयार करने के बाद खेतों में बचे अवशेषों में गलती से आग लग गई थी. सैटेलाइट ने इन्हें पराली जलाने की घटना के रूप में रिकॉर्ड कर लिया, जबकि वास्तविक स्थिति अलग थी. उन्होंने दावा किया कि इस संबंध में राज्य सरकार ने वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (CAQM) के सामने सबूत भी पेश किए हैं.
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धान की पराली प्रबंधन में इस्तेमाल होती थीं
ब्रार ने यह भी बताया कि फसल अवशेष प्रबंधन (CRM) मशीनें, जैसे बेलर और रैकर, जो पहले केवल धान की पराली प्रबंधन में इस्तेमाल होती थीं, अब गेहूं के खेतों में भी उपयोग की जा रही हैं. वहीं, कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि गेहूं की पराली जलाने के वास्तविक मामले सरकारी आंकड़ों से कहीं ज्यादा हो सकते हैं. उनका आरोप है कि कई किसान सैटेलाइट से बचने के लिए शाम के समय खेतों में आग लगाते हैं, जिससे कई घटनाएं रिकॉर्ड नहीं हो पातीं.
किसान दोपहर या शाम के समय पराली जलाने लगे हैं
हाल की रिपोर्ट्स और भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन के अध्ययनों में भी सामने आया है कि पंजाब और हरियाणा के किसान अब सैटेलाइट की निगरानी से बचने के लिए देर दोपहर या शाम के समय पराली जलाने लगे हैं. इससे सरकारी आंकड़ों में कई मामलों की सही गिनती नहीं हो पाती है.