गंभीर संकट में कपास की खेती, प्रोत्साहन राशि के बावजूद किसान बना रहे दूरी.. ये है वजह

कृषि एवं किसान कल्याण विभाग के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, हरियाणा में कपास का रकबा पिछले पांच साल में करीब 47 फीसदी घट गया है. वर्ष 2020-21 में जहां कपास की खेती लगभग 7.4 लाख हेक्टेयर में होती थी, वहीं 2025-26 में यह घटकर करीब 3.9 लाख हेक्टेयर रह गई.

Kisan India
नोएडा | Published: 16 May, 2026 | 10:30 PM

Cotton Cultivation: हरियाणा में कपास की खेती इस समय गंभीर संकट में है. बार-बार कीटों के हमले, कम पैदावार, बढ़ती लागत और फसल के लगातार खराब होने से किसानों को भारी नुकसान हो रहा है. पहले जिस कपास को ‘सफेद सोना’ कहा जाता था और जो किसानों के लिए मुनाफे की फसल मानी जाती थी, अब उसी फसल से किसान दूर होते जा रहे हैं. राज्य के कई पुराने कपास उत्पादक इलाकों में किसान अब कपास छोड़कर धान की खेती की ओर बढ़ रहे हैं. किसानों का कहना है कि धान की खेती में उन्हें ज्यादा और तय आमदनी मिलने की उम्मीद रहती है, इसलिए वे अब उसी फसल को ज्यादा प्राथमिकता दे रहे हैं. हालांकि इसमें पानी की खपत भी अधिक होती है.

किसानों और कृषि विशेषज्ञों के मुताबिक, हरियाणा में कपास की खेती तेजी से घाटे का सौदा बनती जा रही है. इसका सबसे ज्यादा असर सिरसा, फतेहाबाद, हिसार, भिवानी, चरखी दादरी, जींद और झज्जर जैसे जिलों में देखने को मिल रहा है. यह स्थिति राज्य सरकार की ‘मेरा पानी मेरी विरासत’ योजना के लिए भी बड़ा झटका मानी जा रही है. सिरसा और हिसार जैसे इलाकों में कपास की खेती भूजल स्तर को संतुलित रखने में मदद करती थी, लेकिन अब किसान ज्यादा पानी मांगने वाली धान की खेती की ओर बढ़ रहे हैं. इससे भूजल का तेजी से दोहन बढ़ने और पर्यावरण पर दबाव और ज्यादा बढ़ने की आशंका है.

15.33 लाख हेक्टेयर में होती थी धान की खेती

कपास की खेती लगातार घट रही है, जबकि हरियाणा में धान का रकबा तेजी से बढ़ा है. वर्ष 2021-22 में जहां धान की खेती 15.33 लाख हेक्टेयर में होती थी, वहीं 2024-25 में यह बढ़कर 18.37 लाख हेक्टेयर पहुंच गई. हरियाणा आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 के मुताबिक, राज्य में चावल उत्पादन भी बढ़कर 71.37 लाख मीट्रिक टन हो गया है. कपास विभाग के संयुक्त निदेशक राम प्रताप सिहाग ने ‘हिन्दुस्तान टाइम्स’ से कहा कि किसानों के कपास छोड़ने के पीछे कई वजहें हैं. उन्होंने कहा कि कीटों के हमले के अलावा मजदूरी लागत में बढ़ोतरी और खराब मौसम भी बड़ी समस्याएं हैं. हालांकि, सरकार बीजों की गुणवत्ता सुधारने के लिए लगातार प्रयास कर रही है.

कपास की खेती में गिरावट

कृषि एवं किसान कल्याण विभाग के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, हरियाणा में कपास का रकबा पिछले पांच साल में करीब 47 फीसदी घट गया है. वर्ष 2020-21 में जहां कपास की खेती लगभग 7.4 लाख हेक्टेयर में होती थी, वहीं 2025-26 में यह घटकर करीब 3.9 लाख हेक्टेयर रह गई. इसके साथ ही उत्पादन भी 18.24 लाख गांठों से घटकर 9.75 लाख गांठों पर पहुंच गया, जो पिछले सात साल का सबसे निचला स्तर है. आईसीएआर-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान के पूर्व प्रधान वैज्ञानिक वीरेंद्र लाठर के मुताबिक, बीटी-कॉटन की प्रभावशीलता कमजोर पड़ने से यह संकट बढ़ा है. उन्होंने कहा कि लंबे समय तक बीटी तकनीक के इस्तेमाल से कीटों में जेनेटिक बदलाव आ गए, जिससे वे फसल की प्रतिरोधक क्षमता को पार करने लगे. इसी वजह से अब बीटी-कॉटन किसानों के लिए आर्थिक रूप से फायदे का सौदा नहीं रह गया है.

नई किस्में तैयार करने में 4 साल लगते हैं

चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय (CCSHAU) के कृषि अर्थशास्त्र विभाग के अनुसार, पिछले खरीफ सीजन में कपास किसानों को प्रति एकड़ करीब 15,143 रुपये का शुद्ध नुकसान हुआ. वैज्ञानिक फिलहाल गुलाबी सुंडी से बचाव करने वाले नए जीएम बीज विकसित करने पर काम कर रहे हैं, लेकिन विश्वविद्यालय के कपास विभाग प्रमुख कर्मल सिंह का कहना है कि ऐसी नई किस्में तैयार करने में आमतौर पर 4 से 5 साल का समय लग जाता है. हालांकि मौजूदा हालात चुनौतीपूर्ण हैं, फिर भी राज्य के अधिकारी तकनीक और बेहतर बीज गुणवत्ता के सहारे भविष्य को लेकर उम्मीद बनाए हुए हैं.

 

 

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Published: 16 May, 2026 | 10:30 PM
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