Fertiliser subsidy: भारत में खेती की लागत को लेकर एक नई चिंता सामने आ रही है. पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव का असर अब उर्वरक यानी खाद के दामों पर साफ दिखने लगा है. अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें बढ़ने से भारत सरकार पर सब्सिडी का बोझ बढ़ सकता है. अनुमान है कि इस वित्त वर्ष में उर्वरक सब्सिडी करीब 20 प्रतिशत तक बढ़ सकती है, जो सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती बन सकती है.
पश्चिम एशिया संकट से बढ़ी परेशानी
पश्चिम एशिया में जारी तनाव ने वैश्विक सप्लाई चेन को प्रभावित किया है. खासकर ईरान से जुड़े हालात के कारण उर्वरकों की आपूर्ति में दिक्कत आ रही है. जब सप्लाई कम होती है तो कीमतें अपने आप बढ़ जाती हैं. यही स्थिति इस समय देखने को मिल रही है.
भारत जैसे देश पर इसका असर ज्यादा पड़ता है, क्योंकि यहां उर्वरकों की बड़ी मात्रा विदेशों से आती है. ऐसे में अंतरराष्ट्रीय कीमतों में थोड़ी सी बढ़ोतरी भी भारत के खर्च को काफी बढ़ा देती है.
महंगे दाम पर करनी पड़ी बड़ी खरीद
बिजनेस लाइन की खबर के अनुसार, हाल ही में भारत ने लगभग 25 लाख मीट्रिक टन यूरिया खरीदने का फैसला किया है, जो एक रिकॉर्ड स्तर है. लेकिन यह खरीद पहले के मुकाबले लगभग दोगुनी कीमत पर की गई है. इससे साफ है कि बाजार में कीमतें कितनी तेजी से बढ़ी हैं. इतनी बड़ी मात्रा में खरीद करने से वैश्विक बाजार में भी दबाव बढ़ सकता है और आगे चलकर कीमतें और बढ़ने की आशंका है. इसका मतलब है कि आने वाले समय में भारत को और महंगा आयात करना पड़ सकता है.
क्यों बढ़ेगा सब्सिडी का बोझ
भारत सरकार किसानों को सस्ती दर पर खाद उपलब्ध कराती है. इसके लिए सरकार उर्वरक कंपनियों को सब्सिडी देती है. जब बाजार में कीमतें बढ़ती हैं, तो सरकार को कंपनियों को ज्यादा पैसे देने पड़ते हैं, ताकि किसानों पर बोझ न बढ़े. पिछले वित्त वर्ष में सरकार ने करीब 1.87 लाख करोड़ रुपये उर्वरक सब्सिडी पर खर्च किए थे. अब अगर कीमतें इसी तरह बढ़ती रहीं, तो यह खर्च और ज्यादा हो सकता है.
किन उर्वरकों के लिए ज्यादा निर्भरता
भारत यूरिया, डीएपी (डायअमोनियम फॉस्फेट) और पोटाश जैसे उर्वरकों के लिए विदेशों पर काफी निर्भर है. इसके अलावा यूरिया बनाने के लिए जरूरी गैस भी आयात करनी पड़ती है. वहीं सऊदी अरब भारत को डीएपी का बड़ा सप्लायर है, जबकि ओमान से यूरिया की बड़ी मात्रा आती है. कुल मिलाकर भारत की करीब आधी जरूरत पश्चिम एशिया से पूरी होती है, इसलिए वहां का कोई भी संकट सीधे भारत को प्रभावित करता है.
बुवाई के मौसम में बढ़ेगी मांग
जून और जुलाई का समय किसानों के लिए बहुत महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि इसी दौरान खरीफ फसलों की बुवाई शुरू होती है. धान, मक्का, कपास और तिलहन जैसी फसलों के लिए इस समय उर्वरकों की मांग अचानक बढ़ जाती है. हालांकि अभी देश में खाद का स्टॉक मौजूद है, लेकिन जैसे-जैसे बुवाई का समय नजदीक आएगा, मांग और बढ़ेगी. अगर उसी समय कीमतें ऊंची रहीं, तो सरकार पर दबाव और बढ़ जाएगा.
आने वाले महीनों में बढ़ सकती है मुश्किल
सरकार के सामने अब दोहरी चुनौती है. एक तरफ किसानों को सस्ती दर पर उर्वरक देना जरूरी है, ताकि खेती की लागत कम रहे. दूसरी तरफ बढ़ती कीमतों के कारण सब्सिडी का बोझ लगातार बढ़ रहा है. अगर पश्चिम एशिया में हालात जल्दी नहीं सुधरे, तो आने वाले महीनों में स्थिति और मुश्किल हो सकती है. ऐसे में सरकार को नई रणनीति बनानी होगी, ताकि किसानों और अर्थव्यवस्था दोनों को संतुलित रखा जा सके.