Apple Crop Loss: कश्मीर की अर्थव्यवस्था में सेब की खेती की बड़ी भूमिका है. हर साल सेब का सीजन शुरू होते ही किसान अपनी फसल को देश के अलग-अलग हिस्सों की मंडियों तक पहुंचाने की तैयारी करते हैं. लेकिन जम्मू-श्रीनगर नेशनल हाईवे बार-बार बंद होने से किसानों की परेशानी बढ़ जाती है. इस बार भी बारिश, लैंडस्लाइड और सड़क के काम के कारण हाईवे कई बार बंद हुआ है. इसका सीधा असर सेब के साथ-साथ नाशपाती और प्लम जैसे फलों की सप्लाई पर पड़ा है.
हाईवे बंद होते ही अटक जाते हैं फल से लदे ट्रक
कश्मीर से दिल्ली की आजादपुर मंडी तक सेब से भरा ट्रक सामान्य तौर पर करीब 15 से 18 घंटे में पहुंच जाता है. लेकिन हाईवे बंद होने पर यही सफर कई दिनों और कभी-कभी हफ्तों तक खिंच जाता है. बीजनेस लाइन की एक रिपोर्ट में कश्मीर वैली फ्रूट ग्रोअर्स-कम-डीलर्स यूनियन के चेयरमैन बशीर अहमद बशीर ने बाताया कि, लंबे समय तक ट्रक फंसे रहने पर उसकी बड़ी मात्रा में फल खराब हो जाता है. सेब और दूसरे फल जल्दी खराब होने वाली फसल हैं, इसलिए कुछ दिनों की देरी भी किसानों के लिए भारी नुकसान का कारण बन सकती है.
2018 से 2024 के बीच 284 दिन बंद रहा हाईवे
आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, 2018 से 2024 के बीच जम्मू-श्रीनगर नेशनल हाईवे कुल 284 दिनों तक बंद रहा. यानी औसतन हर साल कई दिनों तक कश्मीर का यह अहम सड़क संपर्क प्रभावित रहा. पिछले साल फल उद्योग ने हाईवे बंद होने के कारण करीब 1,500 से 2,000 करोड़ रुपये के नुकसान का अनुमान लगाया था. हालांकि इस साल हुए नुकसान का अभी तक पूरा आकलन नहीं किया गया है. पिछले कुछ हफ्तों में लगातार बारिश के कारण हाईवे तीन से चार बार बंद हुआ. इससे फलों से लदे सैकड़ों ट्रक रास्ते में फंस गए.
फसल कटने के बाद भी बड़ी मात्रा में होता है नुकसान
हाईवे की समस्या के साथ-साथ कश्मीर में सेब की फसल को कटाई के बाद सुरक्षित रखने की भी चुनौती है. NABARD कंसल्टेंसी सर्विसेस यानी NABCONS की 2020-22 की एक स्टडी के मुताबिक, जम्मू-कश्मीर में पैदा होने वाले सेब का करीब 9.51 प्रतिशत हिस्सा कटाई के बाद खराब हो जाता है. इसमें सही भंडारण की कमी और फसल को समय पर बाजार तक नहीं पहुंचा पाना बड़ी वजहों में शामिल हैं. किसानों के लिए यह नुकसान इसलिए भी गंभीर है क्योंकि सेब तैयार होने के बाद उसे लंबे समय तक सामान्य तापमान पर रखना आसान नहीं होता.
वैकल्पिक रास्ते से भी नहीं मिल रही पूरी राहत
किसानों के सामने सबसे बड़ी समस्या यह है कि, जम्मू-श्रीनगर हाईवे बंद होने पर कोई भरोसेमंद वैकल्पिक रास्ता उपलब्ध नहीं है. ऐतिहासिक मुगल रोड जम्मू को पुंछ के रास्ते कश्मीर से जोड़ती है, लेकिन फल किसानों के लिए यह रास्ता पूरी तरह कारगर नहीं है. किसानों के मुताबिक, 12-टायर वाले बड़े ट्रकों को मुगल रोड पर चलाने में दिक्कत होती है. सड़क पर कई तीखे मोड़ और कठिन पहाड़ी रास्ते हैं, जिसके कारण बड़े मालवाहक वाहनों की आवाजाही सीमित रहती है.
रेलवे से उम्मीद, लेकिन सुविधाएं बढ़ाने की जरूरत
किसानों को रेलवे से कुछ राहत मिली है. पिछले साल भारतीय रेलवे ने फल किसानों के लिए पार्सल ट्रेन की सुविधा शुरू की थी. इससे कुछ किसानों को अपनी फसल बाजार तक पहुंचाने में मदद मिली. हालांकि किसानों का कहना है कि, अगस्त से नवंबर के बीच, जब सेब की तुड़ाई और बिक्री का सीजन अपने चरम पर होता है, और ज्यादा पार्सल ट्रेनें चलाने की जरूरत है.
इसके साथ सोपोर, अनंतनाग, पंपोर और शोपियां जैसे प्रमुख फल उत्पादक इलाकों में अलग से लोडिंग की सुविधा बनाने की मांग भी उठ रही है. इससे किसानों को ट्रकों पर निर्भरता कम करने और फल जल्द बाजार तक पहुंचाने में मदद मिल सकती है.
कंट्रोल्ड एटमॉस्फियर स्टोरेज बढ़ाने पर भी काम
सरकार कटाई के बाद होने वाले नुकसान को कम करने के लिए कंट्रोल्ड एटमॉस्फियर स्टोरेज की क्षमता भी बढ़ा रही है. फिलहाल कश्मीर घाटी में करीब 2.92 लाख मीट्रिक टन की कंट्रोल्ड एटमॉस्फियर स्टोरेज क्षमता मौजूद है. इसके अलावा जल्द ही 30 नए चैंबर जोड़ने की तैयारी है. ऐसी स्टोरेज सुविधा में सेब को लंबे समय तक बेहतर स्थिति में रखा जा सकता है, जिससे किसान तुरंत कम कीमत पर फसल बेचने के लिए मजबूर नहीं होंगे. कश्मीर के सेब किसानों के लिए अब जरूरत सिर्फ अच्छी फसल पैदा करने की नहीं, बल्कि उसे समय पर और सुरक्षित तरीके से देश की मंडियों तक पहुंचाने की भी है. बे