litchi farming: भारत में लीची की खेती खास तौर पर बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल के कई इलाकों में बड़े पैमाने पर की जाती है. इन क्षेत्रों में हजारों किसान लीची की खेती से अपनी आजीविका चलाते हैं. लेकिन लीची की फसल बहुत संवेदनशील मानी जाती है और इसके उत्पादन में मौसम तथा समय पर की गई देखभाल की अहम भूमिका होती है.
सरकारी वेबसाइट ppqs.gov.in के अनुसार, मार्च का महीना लीची की फसल के लिए सबसे महत्वपूर्ण समय होता है. इसी दौरान पेड़ों में फूल आने शुरू हो जाते हैं और फल बनने की प्रक्रिया की शुरुआत होती है. यदि इस समय बाग की सही तरह से देखभाल नहीं की जाए तो साल भर की मेहनत पर पानी फिर सकता है. इस अवधि में पौधों पर कई तरह के कीट और रोगों का खतरा बढ़ जाता है, जिससे उत्पादन पर सीधा असर पड़ता है.
मार्च में क्यों बढ़ जाता है खतरा
मार्च के महीने में तापमान धीरे-धीरे बढ़ने लगता है और मौसम में नमी भी बनी रहती है. यह वातावरण लीची के पौधों में फूल आने के लिए अनुकूल तो होता है, लेकिन इसी समय कई प्रकार के कीट तेजी से सक्रिय हो जाते हैं.
यदि इन कीटों को समय रहते नियंत्रित नहीं किया गया तो वे फूलों और नई टहनियों को नुकसान पहुंचा सकते हैं. इसका परिणाम यह होता है कि फूल झड़ने लगते हैं और फल बनने की प्रक्रिया प्रभावित हो जाती है. इसलिए इस समय किसानों को बाग की नियमित निगरानी और सही प्रबंधन पर विशेष ध्यान देना चाहिए.
किसानों के लिए एडवाइजरी
लीची की खेती करने वाले किसानों को सतर्क करने के लिए बिहार सरकार ने एक विशेष एडवाइजरी जारी की है. इस एडवाइजरी में बताया गया है कि मार्च के महीने में लीची के बागों में कुछ खास कीटों का प्रकोप तेजी से बढ़ता है.
इनमें मुख्य रूप से लीची स्टिंक बग, दहिया कीट और लीची माइट शामिल हैं. ये तीनों कीट पौधों के अलग-अलग हिस्सों को नुकसान पहुंचाते हैं और यदि इनका समय पर नियंत्रण नहीं किया गया तो फसल की गुणवत्ता और उत्पादन दोनों पर असर पड़ सकता है.
किसानों को मिल रहा है कीटनाशक पर अनुदान
लीची की फसल को सुरक्षित रखने के लिए बिहार सरकार किसानों को आर्थिक सहायता भी दे रही है. सरकार की ओर से लीची बागों में कीटनाशक छिड़काव के लिए 75 प्रतिशत तक अनुदान उपलब्ध कराया जा रहा है. इस योजना का उद्देश्य किसानों को समय पर कीट नियंत्रण के लिए प्रोत्साहित करना है ताकि उत्पादन में गिरावट न आए और किसानों को बेहतर मुनाफा मिल सके.
दहिया कीट से पौधों को होता है बड़ा नुकसान
दहिया कीट लीची के पेड़ों के लिए काफी खतरनाक माना जाता है. यह कीट पौधों की कोशिकाओं में प्रवेश कर उनका रस चूसने लगता है. इसके कारण तने और शाखाएं धीरे-धीरे अंदर से कमजोर हो जाती हैं.
यदि इसका प्रकोप बढ़ जाए तो पौधे सूखने लगते हैं और कभी-कभी पूरा पेड़ भी खराब हो सकता है. इससे बचाव के लिए किसानों को समय-समय पर बाग में निराई-गुड़ाई करनी चाहिए ताकि मिट्टी में मौजूद कीटों के अंडे नष्ट हो सकें.
इसके अलावा पेड़ों के तने के नीचे प्लास्टिक या चिकना पदार्थ जैसे ग्रीस लगाने से भी कीटों को पेड़ पर चढ़ने से रोका जा सकता है. कई किसान तने के निचले हिस्से पर चूने की पुताई भी करते हैं, जिससे दहिया कीट का खतरा कम हो जाता है.
लीची स्टिंक बग फूलों और फलों को करता है नुकसान
लीची स्टिंक बग मुख्य रूप से पौधों के कोमल हिस्सों को प्रभावित करता है. जब पेड़ों में फूल आने लगते हैं तो यह कीट उनका रस चूसकर उन्हें नुकसान पहुंचाता है. इसके कारण फूल काले पड़ जाते हैं और झड़ने लगते हैं.
इसी तरह यह नई टहनियों और छोटे फलों को भी प्रभावित करता है. इससे बचाव के लिए विशेषज्ञों द्वारा क्लोरफेनापायर 10 फीसदी एससी दवा का घोल बनाकर छिड़काव करने की सलाह दी जाती है.
लीची माइट से पत्तियां हो जाती हैं खराब
लीची माइट एक छोटा लेकिन बेहद नुकसानदायक कीट है. इसके प्रकोप से पौधों की पत्तियों का रंग बदलने लगता है और वे मखमल जैसी बनकर सिकुड़ जाती हैं. धीरे-धीरे पत्तियां सूखने लगती हैं और पौधे की वृद्धि प्रभावित होती है. इससे बचाव के लिए सबसे जरूरी है कि संक्रमित पत्तियों और टहनियों को काटकर नष्ट कर दिया जाए. कई किसान इन्हें जलाकर भी नष्ट करते हैं ताकि कीट दूसरे पौधों तक न फैल सके.
समय पर देखभाल से मिल सकता है बेहतर उत्पादन
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि किसान मार्च के महीने में लीची के बागों की सही तरीके से देखभाल करें, नियमित निगरानी रखें और कीटों का समय पर नियंत्रण करें तो उत्पादन में काफी बढ़ोतरी हो सकती है. सही प्रबंधन अपनाकर किसान न केवल फसल को नुकसान से बचा सकते हैं बल्कि लीची की गुणवत्ता भी बेहतर बना सकते हैं. इससे बाजार में अच्छे दाम मिलने की संभावना बढ़ जाती है और किसानों को ज्यादा मुनाफा मिलता है.