सूखे में भी देगा अच्छी कमाई! कम बारिश के बीच किसानों की नई पसंद बना कोदो

अल नीनो और कम बारिश की आशंका के बीच किसान धान छोड़कर कोदो जैसी कम पानी वाली मिलेट फसल अपना रहे हैं. बीज की मांग 10 गुना तक बढ़ गई है. कम लागत, MSP और बेहतर उत्पादन की उम्मीद ने किसानों का भरोसा मजबूत किया है.

Saurabh Sharma
नोएडा | Published: 18 Jul, 2026 | 08:01 PM

इस साल अल नीनो के प्रभाव और सामान्य से कम बारिश की आशंका ने किसानों की खेती की रणनीति बदलनी शुरू कर दी है. खासकर कई राज्यों में किसान पारंपरिक धान की खेती छोड़कर कम पानी और कम लागत वाली मिलेट फसल कोदो की ओर तेजी से रुख कर रहे हैं. सरकार के मिलेट मिशन और बदलते मौसम को देखते हुए इस खरीफ सीजन में दोनों संभागों में करीब 20 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में कोदो की बुवाई का लक्ष्य रखा गया है. कृषि विशेषज्ञ प्रमोद कुमार के अनुसार, यदि मानसून कमजोर रहता है, तो कोदो जैसी फसलें किसानों के लिए सुरक्षित और लाभदायक विकल्प साबित हो सकती हैं.

10 गुना बढ़ी बीज की मांग, किसानों का बढ़ता भरोसा

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, किसानों की बढ़ती रुचि  का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि सरकारी बीज विकास निगम अब तक 500 क्विंटल से अधिक कोदो बीज किसानों को उपलब्ध करा चुका है. इसके मुकाबले धान के केवल 1,200 क्विंटल बीज की ही मांग दर्ज हुई है. सबसे खास बात यह है कि पिछले वर्ष जहां पूरे संभाग में केवल 50 क्विंटल कोदो बीज की मांग थी, वहीं इस बार यह आंकड़ा कई गुना बढ़ चुका है. उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार रीवा में 150 क्विंटल, सीधी में 75 क्विंटल, शहडोल में 150 क्विंटल और सतना में 110 क्विंटल कोदो बीज की आपूर्ति की जा चुकी है. मौसम विभाग और कृषि वैज्ञानिकों द्वारा कम वर्षा की संभावना जताए जाने के बाद किसानों ने समय रहते फसल चयन में बदलाव करना शुरू कर दिया.

कम पानी, कम लागत और MSP ने बनाया कोदो को पहली पसंद

कृषि विभाग के अनुसार, विभाग लगातार किसानों को कम पानी वाली फसलों  की खेती के लिए प्रोत्साहित कर रहा है. इसी का असर है कि अकेले रीवा जिले में पिछले साल 5 हजार हेक्टेयर में हुई कोदो की खेती का लक्ष्य इस बार बढ़ाकर 6,500 हेक्टेयर कर दिया गया है, जबकि अनुमान है कि यह रकबा 7 हजार हेक्टेयर तक पहुंच सकता है. किसानों का कहना है कि धान की तुलना में कोदो की खेती कहीं अधिक किफायती है. इसमें कम सिंचाई, कम खाद, कम कीटनाशक और केवल एक बार निराई-गुड़ाई की जरूरत पड़ती है, जिससे उत्पादन लागत काफी घट जाती है. इसके साथ ही सरकार द्वारा कोदो, रागी और अन्य मिलेट्स की न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर खरीद किए जाने से किसानों का भरोसा और मजबूत हुआ है.

अल नीनो के दौर में मिलेट्स बन सकते हैं खेती का भविष्य

जलवायु परिवर्तन और अल नीनो जैसे मौसमीय प्रभावों  के कारण भविष्य में कम वर्षा की संभावना लगातार बढ़ रही है. ऐसे में कृषि विशेषज्ञ प्रमोद कुमार के अनुसार, किसानों को फसल विविधीकरण अपनाने की सलाह दे रहे हैं. उनका मानना है कि कोदो जैसी मिलेट फसलें कम पानी में भी बेहतर उत्पादन देने की क्षमता रखती हैं और सूखे जैसी परिस्थितियों में भी किसानों को आर्थिक नुकसान से बचा सकती हैं. यही कारण है कि इस खरीफ सीजन में कोदो केवल एक वैकल्पिक फसल नहीं, बल्कि बदलते मौसम के बीच किसानों के लिए सुरक्षित, टिकाऊ और मुनाफेदार खेती का नया मॉडल बनकर उभर रही है. यदि बारिश सामान्य से कम रहती है, तो कोदो की खेती किसानों के लिए लाभ का सौदा साबित हो सकती है और आने वाले वर्षों में भारतीय कृषि को जलवायु परिवर्तन के अनुकूल बनाने में अहम भूमिका निभा सकती है.

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Published: 18 Jul, 2026 | 08:01 PM