कीचड़, पानी और खून-पसीना! खेत से प्लेट तक ऐसे पहुंचता है मखाना, पढ़ें इनसाइड स्टोरी
सेहत के लिए वरदान माना जाने वाला मखाना आपकी प्लेट तक बड़ी मुश्किल से पहुंचता है. गर्दन तक पानी में डूबे किसान, नुकीले कांटे और आग की भयंकर तपिश के बीच मखाने का जन्म होता है. मिथिलांचल के किसानों के खून-पसीने से तैयार इस सुपरफूड के बनने का पूरा सफर आपको हैरान कर देगा.
Makhana Farming Process : जब आप शाम की चाय के साथ कुरकुरे भुने हुए मखाने खाते हैं या किसी शादी की पार्टी में मखाने की खीर का लुत्फ उठाते हैं, तो क्या कभी सोचा है कि यह सफेद मोती आपकी थाली तक पहुंचता कैसे है? सफेद और हल्का दिखने वाला यह मखाना असल में कांटों के ताज से निकलकर आता है. इसकी खेती का सफर जितना दिलचस्प है, उसे पानी से बाहर निकालने वाले किसान की मेहनत उतनी ही रोंगटे खड़े कर देने वाली है. इसे उगाने में किसान को अपनी जान जोखिम में डालकर घंटों पानी के अंदर कांटों के बीच रहना पड़ता है. आइए देखते हैं कि आपकी सेहत बनाने वाला यह मखाना आखिर बनता कैसे है.
कांटों के बीच और 5 फीट पानी में किसान का संघर्ष
मखाने की खेती किसी तपस्या से कम नहीं है. इसके लिए खेत में चार से पांच फीट पानी का होना जरूरी है. किसान कड़ाके की धूप हो या बारिश, घंटों गर्दन तक पानी में डूबे रहते हैं. सबसे बड़ी चुनौती है मखाने के पौधे की कांटेदार परत. इसके पत्ते और तने इतने नुकीले होते हैं कि जरा सी चूक हुई नहीं कि शरीर पर गहरा घाव दे देते हैं. किसान पानी की गहराई में जाकर जमीन की सफाई करते हैं जिसे बहारन कहा जाता है. इसके बाद बीज बोए जाते हैं और फिर महीनों तक उसकी देखभाल कांटो के साये में होती है.
कीचड़ से गोरिया निकालने का थका देने वाला प्रोसेस
मखाना सीधे सफेद नहीं निकलता. जब फसल तैयार होती है, तो इसके बीज पानी के नीचे कीचड़ में बैठ जाते हैं. किसान सुबह-सुबह पानी के अंदर उतरते हैं और शाम तक हाथों और पैरों की मदद से कीचड़ को छानकर मखाने के बीज बाहर निकालते हैं, जिसे स्थानीय भाषा में गोरिया कहते हैं. बाहर निकालते हैं. घंटों पानी में रहने की वजह से किसानों की त्वचा तक गलने लगती है. इसके बाद इन बीजों को पैरों से रगड़कर साफ किया जाता है और फिर इन्हें कड़ी धूप में सुखाया जाता है.
आग की तपिश में जलकर चमकता है यह सफेद मोती
सुखाने के बाद असली खेल शुरू होता है-मखाना फोड़ने का. इसे लोहे की कढ़ाई में बहुत तेज आंच पर भूना जाता है. जैसे ही बीज चटकने की आवाज आती है, एक लकड़ी के हथौड़े से उसे जोर से मारा जाता है और तब निकलता है वह दूध जैसा सफेद लावा जिसे हम मखाना कहते हैं. इसके बाद इसे 17 अलग-अलग क्वालिटी के दानों में छांटा जाता है. मखाने के पाउडर से लेकर कुकीज तक बनाने की प्रक्रिया यहीं से शुरू होती है. आज भले ही मशीनें आ गई हैं, लेकिन आज भी असली स्वाद हाथों की मेहनत से ही आता है.
सेहत का खजाना- दूध से भी ज्यादा ताकतवर है मखाना
मखाना सिर्फ स्वाद नहीं, बल्कि सेहत की खान है. इसे सुपरफूड इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह हड्डियों को फौलाद जैसा मजबूत बनाता है. डॉक्टरों के मुताबिक, इसमें कैल्शियम और प्रोटीन की मात्रा इतनी ज्यादा होती है कि यह दूध को भी टक्कर देता है. बच्चों की लंबाई बढ़ानी हो या बुजुर्गों के जोड़ों का दर्द कम करना हो, मखाना हर मर्ज की दवा है. बता दें कि पूरी दुनिया में 80 से 90 प्रतिशत मखाना हमारे बिहार के मिथिलांचल इलाके से ही आता है. अगली बार जब आप मखाना खाएं, तो उस किसान की मेहनत को जरूर याद कीजिएगा जिसने अपनी थकान बेचकर आपको सेहत दी है.