लीची के फल फट रहे हैं? आपकी 1 गलती कर सकती है पूरी फसल बर्बाद, एक्सपर्ट टिप्स पढ़ें

Litchi Farming Tips: लीची की खेती में फल फटने (क्रैकिंग) की समस्या तेजी से बढ़ रही है, जिससे किसानों को 20 से 60 प्रतिशत तक नुकसान हो सकता है. इसका मुख्य कारण मौसम में उतार-चढ़ाव, पानी का असंतुलन और बोरॉन-कैल्शियम की कमी है. सही सिंचाई, बोरॉन का छिड़काव, मल्चिंग और बैगिंग तकनीक अपनाकर इस समस्या को काफी हद तक कम किया जा सकता है और उत्पादन व गुणवत्ता दोनों को बेहतर बनाया जा सकता है.

Isha Gupta
नोएडा | Published: 19 Apr, 2026 | 06:43 PM

Litchi Fruit Cracking: लीची की खेती बिहार, उत्तर प्रदेश और झारखंड जैसे राज्यों में किसानों की कमाई का एक बड़ा जरिया है. लेकिन पिछले कुछ सालों से बदलते मौसम की वजह से एक बड़ी परेशानी सामने आ रही है लीची के फलों का फटना, जिसे क्रैकिंग कहा जाता है. यह समस्या किसानों के लिए काफी नुकसानदायक साबित हो रही है. इससे न केवल पैदावार कम हो जाती है, बल्कि फल की गुणवत्ता भी खराब हो जाती है. नतीजा यह होता है कि बाजार में लीची को सही दाम नहीं मिल पाते और किसानों की आमदनी पर सीधा असर पड़ता है.

बिहार स्थित डॉ. राजेन्द्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय के कृषि वैज्ञानिक डॉ. एस.के. सिंह ने किसान इंडिया (Kisan India) को बताया कि, लीची में फल फटने के कई कारण होते हैं. उन्होंने बताया कि, अगर ऐसे में किसान समय रहते सही प्रबंधन नहीं करते हैं तो उन्हें भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है.

क्यों फटते हैं लीची के फल?

कृषि वैज्ञानिक डॉ. एस.के. सिंह के अनुसार लीची में फल फटना एक शारीरिक विकार है, जो खासकर अंतिम विकास चरण में दिखाई देता है. इसके पीछे कई कारण होते हैं:

  • दिन में तेज गर्मी और रात में अचानक ठंडक का असर
  • बीच में अचानक बारिश होना
  • लंबे सूखे के बाद अचानक ज्यादा पानी मिलना
  • फल की त्वचा और अंदरूनी विकास में असंतुलन

इसके अलावा, पोषक तत्वों की कमी भी बड़ा कारण है. खासकर बोरॉन और कैल्शियम की कमी से फल की त्वचा कमजोर हो जाती है और उसमें दरारें पड़ने लगती हैं.

किसानों को कितना नुकसान होता है?

लीची के फटने की समस्या किसानों के लिए बड़ा आर्थिक नुकसान लेकर आती है. कई बार यह नुकसान 20 से 60 प्रतिशत तक पहुंच जाता है, जिससे उनकी पूरी मेहनत पर पानी फिर जाता है. इसके कारण उत्पादन में भारी गिरावट देखने को मिलती है और फलों की गुणवत्ता भी खराब हो जाती है. बाजार में ऐसे खराब फलों को कम कीमत पर बेचना पड़ता है, जिससे आमदनी घट जाती है. इतना ही नहीं, लीची की निर्यात संभावनाएं भी प्रभावित होती हैं और किसानों को अंतरराष्ट्रीय बाजार में अवसरों का नुकसान उठाना पड़ता है.

सही सिंचाई प्रबंधन है सबसे जरूरी

लीची के पेड़ों में सही नमी बनाए रखना बहुत जरूरी है, क्योंकि यही फल को अच्छा और सुरक्षित रखता है. इसके लिए हर 5 से 7 दिन में हल्का पानी देना चाहिए, ताकि मिट्टी सूखने न पाए. लेकिन अगर लंबे समय तक पानी नहीं दिया है, तो अचानक बहुत ज्यादा पानी नहीं डालना चाहिए, वरना लीची के फल फट सकते हैं. इसलिए मिट्टी में नमी को संतुलित रखना बहुत जरूरी है. इसके अलावा बोरॉन और सही पोषण देने से भी लीची के फलों के फटने की समस्या काफी हद तक कम हो जाती है और पैदावार अच्छी मिलती है.

वैज्ञानिकों के अनुसार, 15 अप्रैल तक बोरॉन का छिड़काव (0.2 से 0.4 प्रतिशत घोल) बहुत लाभकारी होता है. यह फल की त्वचा को मजबूत बनाता है और फटने की समस्या को काफी कम करता है. साथ ही कैल्शियम की पूर्ति भी जरूरी होती है ताकि फल का विकास संतुलित रहे.

मल्चिंग और बैगिंग तकनीक का फायदा

  • मल्चिंग (भूसा या पुआल) से मिट्टी की नमी बनी रहती है
  • तापमान नियंत्रित रहता है
  • बैगिंग तकनीक से फल सीधे धूप और गर्मी से बचते हैं
  • इससे फलों के फटने की समस्या 30 से 40 प्रतिशत तक कम हो सकती है

आधुनिक तकनीक से मिलेगा बेहतर नियंत्रण

आज के समय में किसान ड्रोन स्प्रे, मौसम ऐप और स्मार्ट फार्मिंग तकनीक का उपयोग करके समय पर सिंचाई और पोषण प्रबंधन कर सकते हैं. इससे नुकसान कम होता है और उत्पादन बेहतर मिलता है. लीची में फल फटने की समस्या गंभीर जरूर है, लेकिन यह असंभव नहीं है. अगर किसान सही समय पर सिंचाई, पोषण प्रबंधन और आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल करें, तो वे इस नुकसान से बच सकते हैं और अपनी आय को भी बढ़ा सकते हैं.

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