कमजोर मॉनसून ने देश के कई इलाकों में किसानों की चिंता बढ़ा दी है. बारिश की कमी के चलते धान जैसी अधिक पानी मांगने वाली फसल की खेती मुश्किल होती जा रही है. ऐसे हालात में कृषि विशेषज्ञ किसानों को कम पानी में तैयार होने वाली मोटे अनाज और दलहनी फसलों की खेती अपनाने की सलाह दे रहे हैं. कृषि विशेषज्ञ प्रमोद कुमार के अनुसार, ज्वार, बाजरा, मक्का, कोदो, मूंग और उड़द जैसी फसलें कम लागत में बेहतर उत्पादन देने के साथ किसानों की आय बढ़ाने में मदद कर सकती हैं.
कम बारिश में धान की जगह मोटे अनाज बन सकते हैं बेहतर विकल्प
धान की खेती के लिए खेतों में पर्याप्त नमी और ज्यादा पानी की जरूरत होती है. कमजोर मॉनसून की स्थिति में सिंचाई का खर्च बढ़ जाता है और उत्पादन पर भी असर पड़ सकता है. कृषि विशेषज्ञ प्रमोद कुमार बताते हैं कि ऐसे समय में किसानों को फसल चयन में बदलाव करना चाहिए. उन्होंने कहा कि ज्वार, बाजरा और कोदो जैसी फसलें कम पानी में भी अच्छी तरह विकसित हो जाती हैं. इन फसलों की जड़ें जमीन में गहराई तक जाती हैं, जिससे ये कम नमी में भी अपना विकास जारी रखती हैं. इसके अलावा मोटे अनाजों की बाजार में बढ़ती मांग किसानों के लिए अतिरिक्त आमदनी का जरिया बन सकती है.
बाजरा और ज्वार की खेती से घटेगी लागत, बढ़ेगा फायदा
बाजरा और ज्वार ऐसी फसलें हैं जिनमें धान की तुलना में पानी और खाद की जरूरत काफी कम होती है. कम बारिश वाले क्षेत्रों में किसान इन फसलों से अच्छा उत्पादन ले सकते हैं. प्रमोद कुमार के अनुसार, बाजरा पोषण से भरपूर फसल है और इसकी मांग लगातार बढ़ रही है. वहीं ज्वार का इस्तेमाल पशु चारे के साथ-साथ खाद्य पदार्थों में भी किया जाता है. इससे किसानों को एक साथ अनाज और चारे का फायदा मिलता है. उन्होंने किसानों को सलाह दी कि मानसून की स्थिति को देखते हुए ऐसी फसलों का चुनाव करें, जिनमें जोखिम कम हो और बाजार में मांग बनी रहे.
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कोदो, मक्का और दलहनी फसलें भी दे सकती हैं अच्छा मुनाफा
कम पानी वाले क्षेत्रों में कोदो की खेती भी किसानों के लिए फायदे का सौदा साबित हो सकती है. कोदो एक पारंपरिक मोटा अनाज है, जिसे कम सिंचाई में भी उगाया जा सकता है. इसकी खेती में लागत कम आती है और बाजार में इसकी अच्छी कीमत मिल सकती है. वहीं मक्का भी किसानों के लिए बेहतर विकल्प है. मक्का की खेती कम समय में तैयार हो जाती है और इसका उपयोग अनाज, पशु आहार और उद्योगों में किया जाता है. इसके अलावा मूंग और उड़द जैसी दलहनी फसलें मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने के साथ किसानों को अतिरिक्त आमदनी देती हैं.
फसल विविधीकरण अपनाकर किसान कम कर सकते हैं जोखिम
कृषि विशेषज्ञ प्रमोद कुमार का कहना है कि बदलते मौसम में किसानों को सिर्फ एक फसल पर निर्भर नहीं रहना चाहिए. फसल विविधीकरण अपनाकर किसान मौसम की मार से होने वाले नुकसान को कम कर सकते हैं. उन्होंने कहा कि कम पानी वाली फसलों को अपनाने से सिंचाई खर्च घटेगा, मिट्टी की सेहत बेहतर होगी और किसानों की आय में भी सुधार आएगा. कमजोर मानसून के दौर में ज्वार, बाजरा, कोदो, मक्का, मूंग और उड़द जैसी फसलें किसानों के लिए सुरक्षित और लाभदायक विकल्प साबित हो सकती हैं.