अफरा रोग का खतरा, किसानों की बढ़ी टेंशन, समय पर नहीं की पहचान तो जा सकती है पशु की जान

Bloat Disease In Cattle: अफरा दुधारू पशुओं में होने वाली एक गंभीर समस्या है, जिसमें पेट में अत्यधिक गैस भरने से सूजन आ जाती है. यह बीमारी अधिक हरा चारा, खराब पाचन और अचानक आहार बदलने के कारण होती है. इसके लक्षणों में पेट फूलना, बेचैनी, सांस लेने में दिक्कत और खाना छोड़ देना शामिल हैं. समय पर इलाज न मिलने पर पशु की जान को भी खतरा हो सकता है.

Isha Gupta
नोएडा | Published: 20 May, 2026 | 04:45 PM

Pashu Me Afra Rog: भारत में पशुपालन गांवों की अर्थव्यवस्था का बड़ा सहारा है. लाखों किसान दूध और पशुपालन से अपनी रोजी-रोटी चलाते हैं. लेकिन कई बार पशुओं में होने वाली बीमारियां किसानों के लिए बड़ी चिंता बन जाती हैं. ऐसी ही एक खतरनाक बीमारी है ‘अफरा’ रोग. डेयरी, मत्स्य पालन और पशु संसाधन विभाग (बिहार) के अनुसार, यह बीमारी ज्यादातर गाय और भैंस जैसे दुधारू पशुओं में होती है. अगर समय रहते इसका इलाज न किया जाए, तो पशु की हालत गंभीर हो सकती है और उसकी जान भी जा सकती है.

क्या है अफरा रोग?

अफरा ऐसी बीमारी है जिसमें पशु के पेट, खासकर उसके पहले पेट यानी रूमेन में ज्यादा गैस भर जाती है. यह गैस बाहर नहीं निकल पाती, जिससे पेट फूलने लगता है. यह समस्या अक्सर ज्यादा हरा चारा खाने, खाना सही से न पचने या अचानक चारा बदल देने की वजह से होती है. विभाग के अनुसार, बारिश और मौसम बदलने के समय यह बीमारी ज्यादा देखने को मिलती है. अगर पशु को संतुलित और सही आहार न मिले, तो उसका पाचन खराब हो सकता है और अफरा की समस्या हो सकती है.

अफरा रोग के प्रमुख लक्षण

अफरा बीमारी के शुरुआती लक्षणों को देखकर इसे पहचाना जा सकता है. इसका सबसे बड़ा संकेत है पशु का पेट अचानक ज्यादा फूल जाना. इसके साथ ही पशु बेचैन रहने लगता है और बार-बार उठने-बैठने की कोशिश करता है.

इस बीमारी में पशु को सांस लेने में भी परेशानी होने लगती है. कई बार वह ठीक से बैठ नहीं पाता और खाना-पीना भी छोड़ देता है. गंभीर हालत में उसके मुंह से झाग निकलने लगते हैं और तबीयत तेजी से बिगड़ सकती है. अगर समय पर इलाज न मिले, तो पेट में भरी गैस शरीर के दूसरे अंगों पर दबाव डालने लगती है, जिससे पशु की जान को खतरा हो सकता है.

किन कारणों से बढ़ता है खतरा?

पशुओं को जरूरत से ज्यादा हरा और गीला चारा खिलाना अफरा बीमारी की सबसे बड़ी वजह माना जाता है. खासकर बरसीम, हरी घास और ताजा दलहनी चारा ज्यादा मात्रा में देने से यह समस्या बढ़ सकती है. इसके अलावा अचानक चारा बदलना भी पशु के लिए नुकसानदायक होता है. अगर कोई पशु लंबे समय से सूखा चारा खा रहा हो और उसे अचानक बहुत ज्यादा हरा चारा दे दिया जाए, तो उसका पाचन तंत्र उसे आसानी से पचा नहीं पाता. इससे अफरा होने का खतरा बढ़ जाता है.

बचाव के लिए क्या करें?

विशेषज्ञों के मुताबिक, सही देखभाल और संतुलित आहार देकर पशुओं को अफरा रोग से काफी हद तक बचाया जा सकता है. पशुओं को ज्यादा मात्रा में हरा चारा नहीं देना चाहिए, बल्कि उसके साथ सूखा चारा भी मिलाकर खिलाना जरूरी है. इसके अलावा चारा अचानक बदलने से बचना चाहिए. अगर नया चारा शुरू करना हो, तो उसकी मात्रा धीरे-धीरे बढ़ानी चाहिए, ताकि पशु का पाचन तंत्र आसानी से उसे पचा सके.

साथ ही पशुओं को हमेशा साफ पानी देना और समय-समय पर उनका स्वास्थ्य परीक्षण कराना भी जरूरी है. अगर पशु में अफरा के लक्षण दिखाई दें, तो बिना देरी किए तुरंत पशु चिकित्सक से संपर्क करना चाहिए.

समय पर इलाज से बच सकती है जान

अफरा रोग को नजरअंदाज करना पशुपालकों के लिए भारी पड़ सकता है. कई बार किसान इसके शुरुआती लक्षणों पर ध्यान नहीं देते, जिससे बीमारी गंभीर हो जाती है. इसलिए जरूरी है कि पशुपालक इस बीमारी के बारे में जागरूक रहें और समय रहते सही इलाज कराएं. पशुओं को सही आहार, नियमित देखभाल और समय-समय पर डॉक्टर की सलाह देने से उन्हें स्वस्थ रखा जा सकता है और अफरा जैसी बीमारी से बचाया जा सकता है.

Get Latest   Farming Tips ,  Crop Updates ,  Government Schemes ,  Agri News ,  Market Rates ,  Weather Alerts ,  Equipment Reviews and  Organic Farming News  only on KisanIndia.in

लेटेस्ट न्यूज़