India water storage: देश के कई हिस्सों में मौसम की उठापटक और कमजोर बारिश का असर अब साफ तौर पर दिखाई देने लगा है. इसका सीधा असर पानी के भंडारण पर पड़ा है. देश के बड़े-बड़े जलाशयों में लगातार पानी कम हो रहा है, जिससे आने वाले समय में खेती, पीने के पानी और बिजली उत्पादन को लेकर चिंता बढ़ती जा रही है. केंद्रीय जल आयोग के ताजा आंकड़ों के मुताबिक देश के 166 प्रमुख जलाशयों में इस समय कुल क्षमता का सिर्फ करीब 71 प्रतिशत पानी ही बचा है. खास बात यह है कि पश्चिमी भारत को छोड़कर देश के बाकी सभी इलाकों में जलाशयों का स्तर 80 प्रतिशत से नीचे चला गया है.
आमतौर पर जनवरी के महीने में जलाशयों की स्थिति संतुलित रहती है, लेकिन इस बार हालात कुछ अलग हैं. कमजोर बारिश के चलते कई नदियों और बांधों में पानी तेजी से घटा है. कई जगह तो नदी का तल तक नजर आने लगा है. तमिलनाडु के तिरुचि में कावेरी नदी के मुक्कोंबू बांध के आसपास हालात इसकी साफ तस्वीर पेश कर रहे हैं, जहां पानी रुकने से नदी का बड़ा हिस्सा सूखा दिखाई दिया.
देश के जलाशयों की मौजूदा हालत क्या बताती है
केंद्रीय जल आयोग के अनुसार देश के 166 बड़े जलाशयों की कुल भंडारण क्षमता करीब 183.56 बिलियन क्यूबिक मीटर है. इस समय इनमें लगभग 130.75 बिलियन क्यूबिक मीटर पानी ही मौजूद है, यानी कुल क्षमता का करीब 71.23 प्रतिशत. हालांकि यह स्तर पिछले साल की तुलना में लगभग 7 प्रतिशत ज्यादा और बीते 10 वर्षों के औसत से करीब 23 प्रतिशत ऊपर है, लेकिन लगातार घटता जलस्तर आने वाले समय के लिए चिंता बढ़ा रहा है.
कमजोर बारिश ने बढ़ाई परेशानी
भारतीय मौसम विभाग का कहना है कि इस साल की शुरुआत से अब तक देश के ज्यादातर हिस्सों में बारिश बेहद कम हुई है. देश के 726 जिलों में से करीब 91 प्रतिशत जिलों में या तो सामान्य से बहुत कम बारिश दर्ज की गई है या फिर बारिश बिल्कुल नहीं हुई. जहां जनवरी तक औसतन 10.6 मिलीमीटर बारिश होनी चाहिए थी, वहां अब तक सिर्फ 1.9 मिलीमीटर बारिश हुई है. यही वजह है कि जलाशयों में नया पानी नहीं पहुंच पा रहा है.
पश्चिमी भारत में हालात कुछ बेहतर
देश का पश्चिमी हिस्सा अभी बाकी क्षेत्रों की तुलना में थोड़ी राहत की स्थिति में है. पश्चिमी भारत के 53 बड़े जलाशयों में कुल क्षमता का करीब 82 प्रतिशत पानी मौजूद है. महाराष्ट्र और गुजरात में जलाशयों का स्तर 82 से 83 प्रतिशत के आसपास बना हुआ है. गोवा के एकमात्र बड़े जलाशय में पानी का स्तर लगभग 89 प्रतिशत तक है. इसका कारण यह है कि पिछले मानसून में इस इलाके में अच्छी बारिश हुई थी.
उत्तर भारत में दिखने लगे संकट के संकेत
उत्तर भारत के 11 प्रमुख जलाशयों में पानी का स्तर घटकर करीब 65 प्रतिशत रह गया है. राजस्थान में भंडारण की स्थिति अभी बेहतर है और वहां जलाशयों में करीब 82 प्रतिशत पानी है. वहीं पंजाब में जलस्तर 69 प्रतिशत तक गिर गया है. हिमाचल प्रदेश में हालात ज्यादा चिंताजनक हैं, जहां जलाशयों में सिर्फ 57 प्रतिशत पानी बचा है. पहाड़ी राज्यों में पानी की कमी का असर मैदानी इलाकों तक भी पहुंच सकता है.
दक्षिण भारत में बढ़ती चिंता
दक्षिण भारत के जलाशयों की स्थिति पिछले साल के मुकाबले कमजोर बनी हुई है. यहां के 47 प्रमुख जलाशयों में कुल क्षमता का करीब 65 प्रतिशत पानी ही मौजूद है. आंध्र प्रदेश में जलस्तर करीब 80 प्रतिशत है, लेकिन तेलंगाना और कर्नाटक में यह घटकर 59 प्रतिशत तक आ गया है. केरल में जलाशयों में 66 प्रतिशत और तमिलनाडु में करीब 71 प्रतिशत पानी बचा है. कई जगह नदियों में पानी का बहाव रुकने से हालात और बिगड़ते नजर आ रहे हैं.
पूर्वी भारत में भी राहत नहीं
पूर्वी भारत के 27 बड़े जलाशयों में कुल क्षमता का करीब 69 प्रतिशत पानी ही उपलब्ध है. मेघालय का एकमात्र बड़ा जलाशय अभी भरा हुआ है, लेकिन ओडिशा और त्रिपुरा में भंडारण करीब 73 प्रतिशत तक सिमट गया है. झारखंड में जलस्तर 68 प्रतिशत है, जबकि असम, बिहार और मिजोरम में यह 50 प्रतिशत से भी नीचे चला गया है. पश्चिम बंगाल में भी जलाशयों की स्थिति ज्यादा बेहतर नहीं है.
मध्य भारत में मिली-जुली तस्वीर
मध्य भारत के 28 प्रमुख जलाशयों में कुल क्षमता का करीब 73 प्रतिशत पानी मौजूद है. छत्तीसगढ़ में स्थिति अपेक्षाकृत अच्छी है, जहां भंडारण करीब 83 प्रतिशत है. मध्य प्रदेश में यह 74 प्रतिशत, उत्तर प्रदेश में 66 प्रतिशत और उत्तराखंड में 68 प्रतिशत दर्ज किया गया है. अगर आने वाले दिनों में बारिश कमजोर रही, तो यहां भी हालात बिगड़ सकते हैं.
मौसम विभाग का अनुमान
मौसम विभाग ने अगले सप्ताह देश के कुछ हिस्सों में बारिश की संभावना जताई है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि इससे जलाशयों के स्तर में कोई बड़ी बढ़ोतरी होने की उम्मीद नहीं है. बारिश का दायरा और मात्रा इतनी नहीं होगी कि लंबे समय से चली आ रही पानी की कमी पूरी हो सके. ऐसे में आने वाले महीनों में पानी के सही इस्तेमाल और बेहतर प्रबंधन की जरूरत और भी बढ़ जाती है.