Fish Farming: जून का महीना मछली पालन के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है. इस दौरान बढ़ती गर्मी, उमस और मॉनसून की शुरुआत के कारण तालाबों का प्रबंधन चुनौतीपूर्ण हो जाता है. बिहार डेयरी, मत्स्य एवं पशु संसाधन विभाग के अनुसार, यदि मछली पालक इस मौसम में वैज्ञानिक तरीके अपनाएं तो उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ मछलियों को रोगों और अन्य जोखिमों से भी बचाया जा सकता है. विभाग ने जून माह के लिए कई महत्वपूर्ण सुझाव जारी किए हैं, जिनका पालन करना लाभदायक हो सकता है.
प्रजनक मछलियों की देखभाल और प्रजनन कार्य शुरू करें
विभाग के अनुसार जून माह में प्रजनक मछलियों की विशेष देखभाल की जानी चाहिए. भारतीय और विदेशी कार्प प्रजाति की मछलियों का प्रजनन कार्य इस समय शुरू किया जा सकता है. हैचरी और हॉपा ब्रीडिंग यूनिट का संचालन करने वाले मत्स्य पालकों को समय-समय पर विशेषज्ञों की सलाह लेते रहना चाहिए ताकि प्रजनन कार्य बेहतर तरीके से पूरा हो सके. प्रजनक मछलियों द्वारा अंडे देने के बाद उन्हें 1 से 4 मिलीग्राम प्रति लीटर पोटेशियम परमैंगनेट के घोल में एक मिनट तक उपचारित करना चाहिए. इसके विकल्प के रूप में 2 प्रतिशत नमक के घोल का भी उपयोग किया जा सकता है. उपचार के बाद ही मछलियों को तालाब में छोड़ना चाहिए, जिससे संक्रमण की संभावना कम हो जाती है.
मत्स्य बीज संचयन से पहले तालाब की करें पूरी तैयारी
मत्स्य बीज डालने से पहले तालाब की सफाई और तैयारी आवश्यक है. विभाग ने सलाह दी है कि तालाब से जलीय खरपतवार, जलीय कीट और अवांछित मछलियों को पूरी तरह हटाया जाए. इसके बाद हैचरियों से प्राप्त स्पॉन को नर्सरी तालाबों में संचयित किया जा सकता है. ग्रो-आउट तालाबों में इयरलिंग मत्स्य बीज डालने के लिए भी निर्धारित मानक अपनाने की सलाह दी गई है. 100 ग्राम वजन वाले मत्स्य बीज को 2000 प्रति एकड़ तथा 50 ग्राम वजन वाले मत्स्य बीज को 4000 प्रति एकड़ की दर से संचयित किया जाना चाहिए. वहीं मत्स्य बीज का परिवहन हमेशा रात में या सुबह 10 बजे से पहले करना बेहतर माना गया है, ताकि तापमान का असर कम हो.
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गर्मी, उमस और बारिश के दौरान ऑक्सीजन की कमी से बचाव जरूरी
जून में अत्यधिक गर्मी, आर्द्रता और वर्षा की स्थिति तालाबों में घुलनशील ऑक्सीजन की मात्रा को प्रभावित कर सकती है. ऐसी स्थिति में मछलियां तालाब की ऊपरी सतह पर आने लगती हैं और गंभीर हालात में उनकी मृत्यु भी हो सकती है. विभाग ने सलाह दी है कि मौसम खराब रहने पर मछलियों को दिए जाने वाले भोजन की मात्रा आधी कर देनी चाहिए. इसके अलावा पानी में घुलनशील ऑक्सीजन बढ़ाने वाली दवा 400 ग्राम प्रति एकड़ की दर से हर 15 दिन के अंतराल पर सूखे रूप में छिड़कनी चाहिए. साथ ही सुबह और शाम चार-चार घंटे तक ऐरेटर चलाना चाहिए. जिन किसानों के पास ऐरेटर उपलब्ध नहीं है, वे पंप की सहायता से तालाब के पानी को पुनः तालाब में गिराकर ऑक्सीजन का स्तर बढ़ा सकते हैं.
रोग नियंत्रण और जल गुणवत्ता पर रखें लगातार नजर
मछलियों को संक्रमण से बचाने के लिए विभाग ने हर 30 दिन पर 400 ग्राम प्रति एकड़ पोटेशियम परमैंगनेट और 20 किलोग्राम नमक को पानी में घोलकर तालाब में छिड़काव करने की सलाह दी है. इसके अलावा तालाब के पानी के रंग पर भी लगातार नजर रखने को कहा गया है. यदि पानी का रंग अत्यधिक हरा या हल्का लाल दिखाई दे तो चूना और रासायनिक खाद का प्रयोग तुरंत बंद कर देना चाहिए. ऐसी स्थिति में धूप वाले दिन 800 ग्राम कॉपर सल्फेट या 250 ग्राम एट्राजीन (50% W/W) प्रति एकड़ की दर से छिड़काव किया जा सकता है. मत्स्य विशेषज्ञों का मानना है कि जून माह में इन वैज्ञानिक उपायों को अपनाकर मछली पालक उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ रोगों और मौसम से होने वाले नुकसान को काफी हद तक कम कर सकते हैं.