महाराष्ट्र में मछलियों को लेकर बड़ा ऑपरेशन, AI तकनीक से हटेंगी खतरनाक विदेशी प्रजातियां

इस परियोजना का सबसे खास हिस्सा AI तकनीक का इस्तेमाल है. सरकार नॉर्वे से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित तकनीक लाने की तैयारी कर रही है, जिसकी मदद से विदेशी मछलियों की पहचान और उन्हें नियंत्रित किया जाएगा. साथ ही इन मछलियों का इस्तेमाल बाद में फिश फर्टिलाइजर यानी मछली आधारित खाद बनाने में होगा.

Kisan India
नई दिल्ली | Published: 14 May, 2026 | 01:59 PM

Ujani Dam fish project: महाराष्ट्र सरकार ने राज्य के उजनी बांध को बचाने और स्थानीय मछुआरों की आजीविका मजबूत करने के लिए एक बड़ा अभियान शुरू किया है. इस योजना के तहत बांध में तेजी से बढ़ रही विदेशी और नुकसान पहुंचाने वाली मछलियों को हटाया जाएगा और उनकी जगह देसी प्रजातियों की मछलियां छोड़ी जाएंगी. सरकार का मानना है कि इससे जलाशय का प्राकृतिक संतुलन सुधरेगा और मछुआरों की आमदनी भी बढ़ेगी.

उजनी बांध क्यों बना चिंता का कारण?

उजनी बांध महाराष्ट्र के सोलापुर जिले में भीमा नदी पर बना एक बड़ा बांध है. इसकी जल भंडारण क्षमता लगभग 117 टीएमसी बताई जाती है. यह बांध आसपास के इलाकों में सिंचाई और पेयजल का बड़ा स्रोत है. इसके बैकवॉटर क्षेत्र को पक्षी प्रेमियों के लिए भी खास माना जाता है. इसके अलावा हजारों स्थानीय परिवार मछली पालन और मछली कारोबार से अपनी रोजी-रोटी चलाते हैं.

लेकिन पिछले कुछ वर्षों में यहां पानी की गुणवत्ता लगातार खराब हुई है. विशेषज्ञों के अनुसार बिना शोधन वाला सीवेज और रासायनिक कचरा बांध में पहुंचने से जल प्रदूषण बढ़ा है. इसके साथ ही विदेशी मछलियों की बढ़ती संख्या ने स्थानीय मछलियों के अस्तित्व पर खतरा पैदा कर दिया है.

कौन-सी विदेशी मछलियां बन रही हैं खतरा?

बांध में अफ्रीकन कैटफिश, तिलापिया और सकरमाउथ कैटफिश जैसी विदेशी प्रजातियां तेजी से फैल चुकी हैं. इनमें से सकरमाउथ मछली मूल रूप से एक एक्वेरियम प्रजाति मानी जाती है, लेकिन किसी तरह यह बांध तक पहुंच गई.

विशेषज्ञों के अनुसार, ये मछलियां दूसरी मछलियों और उनके अंडों को खा जाती हैं. इससे स्थानीय प्रजातियों की संख्या तेजी से कम होने लगी. कोवरा शिवड़ा, शेंगल, वालंज, अंबाली, शिलान और दूसरी देसी मछलियों पर इसका सबसे ज्यादा असर पड़ा है. स्थानीय मछुआरों का कहना है कि पहले उन्हें आसानी से अच्छी देसी मछलियां मिल जाती थीं, लेकिन अब पकड़ कम होती जा रही है. इससे उनकी आय पर सीधा असर पड़ रहा है.

सरकार ने शुरू किया बड़ा अभियान

सोलापुर जिला प्रशासन ने अब इन विदेशी मछलियों को हटाने के लिए चरणबद्ध योजना शुरू की है. जिला कलेक्टर कार्तिकेयन एस के अनुसार करीब 85 प्रतिशत स्थानीय मछली प्रजातियां प्रभावित हो चुकी हैं.

पहले चरण में मछुआरों को जागरूक किया जाएगा कि वे विदेशी मछलियों को दोबारा पानी में न छोड़ें. इसके लिए अलग कलेक्शन सेंटर बनाए जाएंगे, जहां मछुआरे ऐसी मछलियां जमा कर सकेंगे. इन मछलियों का इस्तेमाल बाद में फिश फर्टिलाइजर यानी मछली आधारित खाद बनाने में किया जाएगा. यह खाद पोटाश से भरपूर मानी जाती है और खेती में उपयोगी होगी.

अब AI तकनीक से हटेंगी विदेशी मछलियां

इस परियोजना का सबसे खास हिस्सा AI तकनीक का इस्तेमाल है. सरकार नॉर्वे से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित तकनीक लाने की तैयारी कर रही है, जिसकी मदद से विदेशी मछलियों की पहचान और उन्हें नियंत्रित किया जाएगा.

विशेषज्ञों का कहना है कि यह भारत में पहली ऐसी कोशिश है, जिसमें किसी जलाशय से आक्रामक विदेशी प्रजातियों को तकनीक के जरिए हटाने की योजना बनाई गई है.

देसी ‘टाइगर ऑफ वाटर्स’ की होगी वापसी

विदेशी मछलियों को हटाने के बाद सरकार उजनी बांध में डेक्कन महसीर जैसी देसी प्रजातियों को छोड़ने की योजना बना रही है. डेक्कन महसीर को “टाइगर ऑफ द वाटर्स” भी कहा जाता है. यह दक्कन क्षेत्र की प्रसिद्ध और कीमती मछली मानी जाती है. बाजार में इसकी अच्छी मांग रहती है और इससे मछुआरों को बेहतर कमाई होने की उम्मीद है.

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