डेयरी कारोबार में सफलता का राज, 15-16 लीटर दूध देने वाली ये भैंस बदल सकती है किस्मत

पशुपालन के जरिए आय बढ़ाने की चाह रखने वाले किसानों के लिए एक खास भैंस नस्ल आकर्षण का केंद्र बनी हुई है. ये नस्ल अधिक दूध उत्पादन, बेहतर फैट और कम रखरखाव लागत के लिए जानी जाती है. डेयरी व्यवसाय शुरू करने वालों के लिए ये लाभदायक और टिकाऊ विकल्प माना जा रहा है.

Saurabh Sharma
नोएडा | Published: 31 May, 2026 | 04:38 PM

Dairy Farming: देश में खेती के साथ पशुपालन भी किसानों की आय बढ़ाने का एक मजबूत साधन बनता जा रहा है. खासकर दूध उत्पादन से जुड़े व्यवसाय में किसानों की रुचि लगातार बढ़ रही है. ऐसे में अधिक दूध देने वाली भैंसों की नस्लों की मांग भी तेजी से बढ़ रही है. विशेषज्ञों के अनुसार, जफराबादी भैंस किसानों के बीच काफी लोकप्रिय हो रही है, जो प्रतिदिन औसतन 15 से 16 लीटर तक दूध देने की क्षमता रखती है. यही वजह है कि डेयरी व्यवसाय शुरू करने वाले किसान इस नस्ल को प्राथमिकता दे रहे हैं.

अधिक दूध और ज्यादा फैट से बढ़ती है कमाई

जफराबादी नस्ल की भैंस सबसे बड़ी खासियत इसकी उच्च दुग्ध उत्पादन  क्षमता है. सामान्य परिस्थितियों में यह प्रतिदिन 15 से 16 लीटर तक दूध दे सकती है. इसके दूध में फैट की मात्रा भी अन्य कई नस्लों की तुलना में अधिक पाई जाती है. अधिक फैट वाले दूध की बाजार में अच्छी मांग रहती है, जिससे किसानों को बेहतर कीमत मिलती है. डेयरी उत्पाद जैसे घी, मक्खन और पनीर बनाने वाले कारोबारियों के लिए भी ऐसा दूध अधिक लाभदायक माना जाता है. यही कारण है कि दूध उत्पादन से जुड़े किसान इस नस्ल को लाभदायक निवेश के रूप में देख रहे हैं.

अलग-अलग जलवायु में आसानी से ढलने की क्षमता

पशुपालन विशेषज्ञों का कहना है कि ये नस्ल विभिन्न प्रकार की जलवायु परिस्थितियों में आसानी से खुद को ढाल लेती है. गर्मी, सामान्य सर्दी और बदलते मौसम  में भी इसका प्रदर्शन बेहतर बना रहता है. यही वजह है कि कई राज्यों में किसान बड़े पैमाने पर इसका पालन कर रहे हैं. मजबूत शरीर और बेहतर अनुकूलन क्षमता के कारण यह नस्ल ग्रामीण क्षेत्रों के साथ-साथ व्यावसायिक डेयरी फार्मों के लिए भी उपयुक्त मानी जाती है. पशुपालकों का मानना है कि सही देखभाल और संतुलित आहार मिलने पर इसकी उत्पादन क्षमता लंबे समय तक बनी रहती है.

कम रखरखाव में बेहतर मुनाफे का अवसर

डेयरी व्यवसाय में लागत एक महत्वपूर्ण पहलू होती है. इस नस्ल की खास बात यह है कि इसका रखरखाव अपेक्षाकृत कम खर्च में किया जा सकता है. हरा चारा, सूखा भूसा और संतुलित आहार इसके लिए पर्याप्त माना जाता है. इसके अलावा इसमें कई सामान्य बीमारियों  के प्रति अच्छी प्रतिरोधक क्षमता देखी जाती है, जिससे पशु चिकित्सा पर होने वाला खर्च भी कम हो सकता है. बाजार में इसकी कीमत आमतौर पर 80 हजार रुपये से 1 लाख रुपये के बीच बताई जाती है. हालांकि शुरुआती निवेश थोड़ा अधिक लग सकता है, लेकिन दूध उत्पादन और लंबे समय तक मिलने वाली आय को देखते हुए यह निवेश लाभदायक साबित हो सकता है. विशेषज्ञों का मानना है कि सीमित भूमि वाले किसान भी इस नस्ल का पालन कर डेयरी व्यवसाय से अच्छी अतिरिक्त आय अर्जित कर सकते हैं.

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