अब हरे चारे की नहीं होगी कमी, साइलेज से बढ़ेगा मवेशियों का दूध.. अपनाएं ये तकनीक

डेयरी एवं पशुपालन विभाग किसानों को साइलेज तकनीक अपनाने के लिए जागरूक कर रहा है. इस विधि से हरे चारे को लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है. विशेषज्ञों के अनुसार, साइलेज पशुओं को पौष्टिक आहार देने, दूध उत्पादन बढ़ाने और चारे की कमी के समय बेहतर पोषण उपलब्ध कराने में मददगार साबित हो रहा है.

Saurabh Sharma
नोएडा | Published: 4 May, 2026 | 12:14 PM

Silage Making: पशुओं के लिए सालभर हरा चारा उपलब्ध कराना कई बार किसानों के लिए बड़ी चुनौती बन जाता है. खासतौर पर गर्मी, सूखा या बारिश के दौरान हरे चारे की कमी होने लगती है, जिससे पशुओं के स्वास्थ्य और दूध उत्पादन पर असर पड़ता है. ऐसी स्थिति में साइलेज तकनीक पशुपालकों के लिए बेहद फायदेमंद साबित हो रही है. डेयरी एवं पशुपालन विभाग के अनुसार, साइलेज हरे चारे को एयर टाइट परिस्थितियों में लंबे समय तक सुरक्षित रखने की एक वैज्ञानिक विधि है. इसमें चारे की पौष्टिकता लंबे समय तक बनी रहती है और जरूरत पड़ने पर इसे पशुओं को आसानी से खिलाया जा सकता है. विभाग लगातार किसानों को इस तकनीक के प्रति जागरूक कर रहा है, ताकि चारे की कमी के समय भी पशुओं को संतुलित और पौष्टिक आहार मिल सके.

हरे चारे को लंबे समय तक सुरक्षित रखने की वैज्ञानिक विधि

पशुपालन विभाग के अनुसार, साइलेज बनाने के लिए मक्का, ज्वार, बाजरा या नेपियर घास जैसे हरे चारे का उपयोग किया जाता है. सबसे पहले हरे चारे को छोटे-छोटे टुकड़ों में काटा जाता है. इसके बाद इसे गड्ढे, टैंक या प्लास्टिक बैग में अच्छी तरह दबाकर एयर टाइट तरीके से बंद कर दिया जाता है. जब चारे में हवा नहीं पहुंचती तो उसमें प्राकृतिक प्रक्रिया शुरू होती है, जिससे चारा खराब नहीं होता और लंबे समय तक सुरक्षित रहता है. विशेषज्ञों के मुताबिक, सही तरीके से तैयार किया गया साइलेज कई महीनों तक उपयोग किया जा सकता है. इसका रंग हल्का हरा या सुनहरा होता है और इसमें हल्की खट्टी खुशबू आती है, जो अच्छे साइलेज की पहचान मानी जाती है.

साइलेज से बढ़ता है दूध उत्पादन और पशुओं का स्वास्थ्य

विशेषज्ञों का कहना है कि साइलेज केवल चारा सुरक्षित रखने की तकनीक नहीं, बल्कि पशुओं के बेहतर पोषण  का भी अच्छा माध्यम है. इसमें हरे चारे के जरूरी पोषक तत्व लंबे समय तक बने रहते हैं. यही कारण है कि इसे खाने से पशुओं की सेहत अच्छी रहती है और दूध उत्पादन में भी सुधार देखने को मिलता है. डेयरी एवं पशुपालन विभाग के अनुसार, नियमित रूप से पौष्टिक साइलेज खिलाने से पशुओं की पाचन क्षमता बेहतर होती है और उन्हें ऊर्जा भी पर्याप्त मात्रा में मिलती है. इससे पशु कमजोर नहीं पड़ते और उनकी कार्यक्षमता बनी रहती है. विभाग का मानना है कि यदि किसान समय रहते साइलेज तैयार कर लें तो उन्हें चारे की कमी के दौरान बाजार से महंगा चारा खरीदने की जरूरत नहीं पड़ेगी. इससे लागत कम होगी और पशुपालन व्यवसाय अधिक लाभदायक बन सकेगा.

विभाग किसानों को दे रहा जागरूकता और प्रशिक्षण

डेयरी एवं पशुपालन विभाग द्वारा किसानों को वैज्ञानिक तरीके से साइलेज बनाने का प्रशिक्षण भी दिया जा रहा है. विभाग का कहना है कि सही तकनीक अपनाकर किसान कम खर्च में लंबे समय तक हरा चारा सुरक्षित रख सकते हैं. इसके लिए किसानों को साफ-सफाई, सही नमी और एयर टाइट व्यवस्था का विशेष ध्यान रखने की सलाह दी जाती है. विशेषज्ञों के अनुसार, बदलते मौसम और बढ़ती चारे की समस्या को देखते हुए साइलेज तकनीक  आने वाले समय में पशुपालकों के लिए बेहद महत्वपूर्ण साबित हो सकती है. इससे पशुओं को सालभर पौष्टिक आहार मिलेगा और किसानों की आय बढ़ाने में भी मदद मिलेगी. ग्रामीण क्षेत्रों में डेयरी और पशुपालन से जुड़े किसान अब इस तकनीक को तेजी से अपना रहे हैं. विभाग का कहना है कि अगर किसान वैज्ञानिक पद्धति से साइलेज तैयार करें तो पशुओं के स्वास्थ्य, दूध उत्पादन और आर्थिक लाभ तीनों में बड़ा सुधार देखा जा सकता है.

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