UP में हरे चारे की 45 फीसदी कमी, किसान पशुओं को खिलाएं साइलेज.. बढ़ जाएगा दूध उत्पादन

उत्तर प्रदेश में हरे चारे की कमी का मुख्य कारण पारंपरिक चरागाह  और घास के मैदानों पर कब्जा होना है. पिछले वर्षों में करीब 65,000 हेक्टेयर चरागाह भूमि पर अतिक्रमण हो गया था. इनमें से लगभग 50,000 हेक्टेयर जमीन को खाली कराया जा चुका है और 6,000 हेक्टेयर में हरे चारे की खेती शुरू हो गई है.

Kisan India
नोएडा | Updated On: 1 Mar, 2026 | 01:24 PM

Agriculture News: महाराष्ट्र, तमिलनाडु और झारखंड सहित कई राज्यों में डेयरी कंपनियों ने दूध के दाम बढ़ा दिए हैं. डेयरी कंपनियों का कहना है कि चारे की कमी और बढ़ते खर्च की वजह से किसानों के लिए दूध उत्पादन ज्यादा खर्चीला हो गया. ऐसे में कीमतें बढ़ानी पड़ी. इसी बीच हरे चारे की कमी को लेकर उत्तर प्रदेश से एक बड़ी खबर सामने आई है. उत्तर प्रदेश के कुल 166.84 लाख हेक्टेयर कृषि भूमि में सिर्फ 2.41 लाख हेक्टेयर (1.5 फीसदी से कम) ही हरे चारे की खेती के लिए है. इसमें भी भारी असंतुलन है. हरे चारे के लिए निर्धारित भूमि का 80 फीसदी से ज्यादा हिस्सा केवल गन्ने की खेती में है. ऐसे में गर्मी बढ़ने पर पशुओं के लिए हरे चारे की किल्लत हो सकती है.

पशुपालन निदेशक मेम पाल सिंह ने कहा है कि इस असंतुलन के कारण हरे चारे  की 45 फीसदी कमी है, जबकि सूखे चारे की आपूर्ति लगभग 3 फीसदी अधिक है. इस कमी का सीधा असर दूध उत्पादन, मवेशियों के स्वास्थ्य और ग्रामीण क्षेत्रों में पशुपालन की लागत बढ़ने पर पड़ रहा है. इस स्थिति को देखते हुए, मुख्य सचिव एसपी गोयल की अध्यक्षता में एक टास्क फोर्स समय-समय पर बैठकें कर रही है, ताकि सुधारात्मक कदम तय किए जा सकें.

साइलाज की खेती को मिलेगा बढ़ावा

हाल ही में हुई बैठक में कृषि, बागवानी, राजस्व, पशुपालन और कई अन्य विभागों के अधिकारी शामिल हुए. साथ ही राज्य और बाहर के विशेषज्ञ वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए जुड़े. विशेषज्ञों ने कहा कि हरे चारे की फसलें विविध बनानी चाहिए, साइलेज बनाने को बढ़ावा देना चाहिए और गेहूं की भूसी,  धान की झाड़ी और मक्का की तनों जैसी फसल अवशेषों का सही उपयोग करना चाहिए, ताकि ये बेकार न जाएं या जलाए न जाएं. हालांकि चर्चा में लिए जा रहे कदम महत्वाकांक्षी हैं, अधिकारी मानते हैं कि हरे चारे की कमी को पूरा करने के लिए जमीन पर लगातार काम करना होगा, खासकर जब पशु आहार की कीमतें बढ़ रही हैं और डेयरी मुनाफा दबाव में है. सिंह ने कहा कि संबंधित विभागों को अगली बैठक में ठोस योजना पेश करनी है.

65,000 हेक्टेयर चरागाह भूमि पर अतिक्रमण

मेम पाल सिंह के अनुसार, उत्तर प्रदेश में हरे चारे की कमी का मुख्य कारण पारंपरिक चरागाह  और घास के मैदानों पर कब्जा होना है. पिछले वर्षों में करीब 65,000 हेक्टेयर चरागाह भूमि पर अतिक्रमण हो गया था. इनमें से लगभग 50,000 हेक्टेयर जमीन को खाली कराया जा चुका है और 6,000 हेक्टेयर में हरे चारे की खेती शुरू हो गई है. उन्होंने कहा कि अब राज्य चारा उत्पादन को सीधे पशुओं की जरूरत से जोड़ने की योजना बना रहा है. 7,000 से ज्यादा गोशालाओं में रहने वाले करीब 12 लाख निराश्रित गोवंश को पास के खेतों में उगाए जा रहे हरे चारे से जोड़ा जाएगा, ताकि चारे की आपूर्ति स्थानीय, भरोसेमंद और सस्ती हो सके.

अधिकारियों ने कहा कि अब केवल सरकारी प्रयासों पर निर्भर रहने के बजाय किसान उत्पादक संगठन (FPO), गैर-सरकारी संगठन और स्थानीय युवाओं को भी हरे चारे की खेती के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा. सरकार उन्हें अच्छे बीज, तकनीकी मार्गदर्शन और अन्य सहयोग देगी. उगाया गया चारा किसानों, डेयरी यूनिट्स और गोशालाओं को बेचा जा सकेगा.

हरा चारा खाने से बढ़ता है दूध उत्पादन

बता दें कि हरा चारा पोषण में सूखे चारे से बहुत बेहतर है. रोजाना पर्याप्त हरा चारा मिलने से गोवंश का स्वास्थ्य सुधरेगा और दूध उत्पादन बढ़ेगा. दूधारू पशुओं को हरे चारे के रूप में बरसीम, मक्का और जई खिलाना चाहिए. इससे दूध उत्पादन में अच्छी बढ़ोतरी हो सकती है. यह प्रोटीन और जरूरी पोषक तत्वों का सस्ता और बेहतर स्रोत है. हरा चारा पाचन को बेहतर बनाता है, जिससे महंगा बाजार का दाना कम देना पड़ता है. इससे पशु स्वस्थ रहते हैं और दूध में वसा (फैट) की मात्रा बनाए रखने में भी मदद मिलती है.

Get Latest   Farming Tips ,  Crop Updates ,  Government Schemes ,  Agri News ,  Market Rates ,  Weather Alerts ,  Equipment Reviews and  Organic Farming News  only on KisanIndia.in

Published: 1 Mar, 2026 | 01:20 PM

खीरे की फसल के लिए किस प्रकार की मिट्टी सबसे अच्छी मानी जाती है?