Poppy farming: रबी सीजन आते ही किसानों के मन में यह सवाल जरूर उठता है कि ऐसी कौन-सी फसल है, जो कम जमीन में भी बड़ी कमाई दे सकती है. गेहूं, चना और सरसों के बीच एक ऐसी फसल भी है, जिसे दुनिया की सबसे महंगी खेती कहा जाता है. यह फसल है अफीम, जिसकी कीमत अंतरराष्ट्रीय बाजार में करीब दो लाख रुपये प्रति किलो तक मानी जाती है. सुनने में यह किसी सपने जैसी लगती है, लेकिन इसकी खेती उतनी ही सख्त नियमों और निगरानी में होती है.
अफीम की खेती आम किसानों के लिए नहीं है. यह खेती जितनी मुनाफे वाली है, उतनी ही जिम्मेदारी और कानून की पाबंदियों से जुड़ी हुई है. यही वजह है कि इसे “विशेष किसानों की विशेष खेती” भी कहा जाता है.
क्या है अफीम और क्यों है इतनी कीमती
अफीम एक औषधीय पौधे से प्राप्त होने वाला पदार्थ है, जिसका इस्तेमाल दवाइयों के निर्माण में किया जाता है. इससे मॉर्फिन, कोडीन जैसी महत्वपूर्ण दर्द निवारक दवाएं बनाई जाती हैं, जिनकी मांग पूरी दुनिया में रहती है. इसी कारण अफीम की कीमत बेहद ज्यादा होती है.
हालांकि आमतौर पर अफीम का नाम सुनते ही लोगों के मन में नशे की छवि उभरती है, लेकिन भारत में इसकी खेती पूरी तरह से कानूनी और नियंत्रित तरीके से की जाती है. यहां उगाई जाने वाली अफीम सीधे सरकारी एजेंसियों को दी जाती है, ताकि इसका गलत इस्तेमाल न हो.
एक बीघा में कितना उत्पादन और कितनी कमाई
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, अगर उत्पादन की बात करें तो एक बीघा जमीन से औसतन 15 से 16 किलो अफीम प्राप्त होती है. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसकी कीमत करीब 2 लाख रुपये प्रति किलो मानी जाती है. इसके अलावा अफीम के पौधे से मिलने वाला पोस्ता दाना भी किसानों की अतिरिक्त आय का जरिया बनता है, जिसकी कीमत करीब 1 लाख रुपये प्रति क्विंटल तक होती है.
यानी सही देखभाल, सरकारी मानकों और तय शर्तों के साथ यह खेती किसान को कुछ ही सीजन में लखपति बना सकती है. हालांकि यह कमाई हर किसान के हिस्से में नहीं आती, क्योंकि इसकी खेती हर किसी को करने की अनुमति नहीं होती.
कौन कर सकता है अफीम की खेती
भारत में अफीम की खेती केवल उन्हीं किसानों को करने की इजाजत है, जिन्हें सरकार से लाइसेंस प्राप्त होता है. यह लाइसेंस केंद्रीय नारकोटिक्स ब्यूरो द्वारा जारी किया जाता है. बिना लाइसेंस अफीम की खेती करना पूरी तरह अवैध है और गंभीर अपराध की श्रेणी में आता है.
फिलहाल भारत में अफीम की खेती केवल मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश के कुछ अधिसूचित जिलों तक सीमित है. इन जिलों में भी वही किसान अफीम बो सकते हैं, जो वर्षों से सरकारी नियमों का पालन करते आ रहे हों और जिनका रिकॉर्ड साफ हो.
मिट्टी और मौसम की भूमिका
अफीम की खेती के लिए रेतीली दोमट मिट्टी सबसे उपयुक्त मानी जाती है. मिट्टी का पीएच स्तर 6.5 से 8 के बीच होना चाहिए, ताकि पौधों की बढ़वार अच्छी हो सके. बुवाई से पहले खेत में गोबर की खाद और वर्मी कंपोस्ट डालना जरूरी होता है, जिससे मिट्टी की उर्वरता बनी रहे.
यह खेती पूरी तरह से रबी सीजन की फसल है. इसकी बुवाई आमतौर पर अक्टूबर से नवंबर के बीच की जाती है. ठंडा और शुष्क मौसम अफीम की फसल के लिए सबसे अनुकूल माना जाता है.
सरकारी निगरानी में होती है पूरी खेती
अफीम की खेती की सबसे खास बात यह है कि इसकी पूरी प्रक्रिया सरकारी निगरानी में होती है. बुवाई से लेकर कटाई और संग्रह तक हर कदम पर प्रशासन की नजर रहती है. तय मात्रा से कम या ज्यादा उत्पादन होने पर भी जांच होती है. किसान को उगाई गई पूरी अफीम सरकार को ही सौंपनी होती है. खुले बाजार में इसकी बिक्री पूरी तरह प्रतिबंधित है.
अवैध कारोबार पर सख्त सजा
अगर कोई किसान या व्यक्ति अफीम की अवैध खेती या व्यापार करता है, तो उसके खिलाफ एनडीपीएस एक्ट के तहत कड़ी कार्रवाई होती है. इस कानून के तहत लंबी जेल की सजा और भारी जुर्माने का प्रावधान है. यही वजह है कि अफीम की खेती को “उच्च जोखिम, उच्च जिम्मेदारी वाली खेती” कहा जाता है.
समझदारी और नियमों के साथ ही मुनाफा
अफीम की खेती वाकई दुनिया की सबसे महंगी खेती मानी जाती है, लेकिन यह हर किसी के लिए नहीं है. यह फसल उन किसानों के लिए है, जो नियमों का सख्ती से पालन कर सकते हैं और सरकारी प्रक्रिया को पूरी ईमानदारी से निभा सकते हैं. सही हाथों में यह खेती वरदान है, लेकिन जरा-सी लापरवाही इसे बड़ी मुसीबत में भी बदल सकती है.