क्या आप भी करना चाहते हैं अफीम की खेती? जानें बीज से लेकर कटाई तक की पूरी प्रक्रिया

अफीम की खेती को काला सोना कहा जाता है, क्योंकि यह किसानों को भारी मुनाफा दिला सकती है. हालांकि, इसकी खेती करना आसान नहीं है. इसके लिए सरकार से विशेष लाइसेंस लेना पड़ता है और हर कदम पर नारकोटिक्स विभाग की निगरानी रहती है. बुवाई से लेकर डोडों से रस निकालने तक, इसमें अनुशासन और कड़ी मेहनत की जरूरत होती है.

Saurabh Sharma
नोएडा | Published: 11 Jan, 2026 | 10:01 PM

Opium Cultivation: खेती की दुनिया में एक ऐसी फसल है जिसे काला सोना कहा जाता है. यह फसल जितनी कीमती है, इसकी सुरक्षा और नियम उतने ही सख्त हैं. हम बात कर रहे हैं अफीम की. अफीम की खेती करना किसी जोखिम भरे मिशन से कम नहीं है, क्योंकि यहां किसान का मुकाबला सिर्फ मौसम से नहीं, बल्कि कड़े सरकारी नियमों से भी होता है. अफीम का एक-एक दाना और उसकी बूंद-बूंद का हिसाब सरकार के पास होता है. लेकिन अगर नसीब और मेहनत साथ दे, तो यह फसल एक ही सीजन में किसान को लखपति बना सकती है. आइए जानते हैं, आखिर कैसे होती है अफीम की यह जादुई और रहस्यमयी खेती.

बिना सरकारी परमिट एक बीज भी बोना है मना

अफीम की खेती  कोई आम फसल नहीं है जिसे आप जब चाहें अपने खेत में उगा लें. इसके लिए सबसे पहले आपको केंद्र सरकार के वित्त मंत्रालय (नारकोटिक्स विभाग) से लाइसेंस लेना पड़ता है. सरकार तय करती है कि किस इलाके में और किस किसान को कितनी जमीन पर अफीम बोने  की इजाजत मिलेगी. लाइसेंस मिलने के बाद विभाग खुद बीज मुहैया कराता है. इस खेती में किसान की जमीन का एक-एक इंच सरकारी रडार पर होता है, और बिना सूचना के एक इंच भी ज्यादा बोना भारी कानूनी मुसीबत खड़ी कर सकता है.

गुलाबी सर्दी में बुवाई और कड़ी निगरानी

अफीम की खेती के लिए मौसम का मिजाज  समझना बहुत जरूरी है. इसकी बुवाई अक्टूबर से नवंबर के बीच, यानी जब गुलाबी ठंड शुरू होती है, तब की जाती है. जवाहर अफीम-539 और जवाहर अफीम-16 जैसी किस्में सबसे ज्यादा पसंद की जाती हैं. एक एकड़ में लगभग 2 किलो बीज लगते हैं. पौधों के बीच  की दूरी का खास ख्याल रखना पड़ता है ताकि उन्हें फैलने की जगह मिले. इस दौरान नारकोटिक्स विभाग के अधिकारी खेत का दौरा करते हैं और फसल की स्थिति की पूरी रिपोर्ट तैयार करते हैं.

डोडे से निकलता है कीमती रस

बुवाई के करीब 100 दिन बाद, पौधों पर गोल-गोल डोडे (फल) आने लगते हैं. यही वो समय है जब किसान की असली परीक्षा शुरू होती है. इन डोडों पर बहुत सावधानी से चीरा लगाया जाता है. चीरा लगाने के बाद रातभर उसमें से दूध जैसा एक तरल पदार्थ निकलता है, जो हवा के संपर्क में आकर गाढ़ा और काला हो जाता है. सूरज निकलने से पहले ही किसान को इस जमे हुए रस को इकट्ठा करना होता है. यही वह कच्ची अफीम है जिसकी कीमत बाजार में आसमान छूती है और जो दवाइयों के काम  आती है.

जोखिम और सुरक्षा- हर बूंद का हिसाब

अफीम की खेती जितनी मुनाफेदार है, उतनी ही नाजुक भी. जरा सी ओलावृष्टि या बेमौसम बारिश पूरी फसल तबाह कर सकती है. इसके अलावा कीटों का खतरा भी बना रहता है, जिसके लिए हर 8-10 दिन में कीटनाशकों का छिड़काव करना पड़ता है. सबसे बड़ी चुनौती है सुरक्षा. किसान को रात-रात भर जागकर अपने खेत की रखवाली करनी पड़ती है ताकि कोई चोरी न हो जाए. कटाई के बाद, किसान को पूरी पैदावार सरकार को सौंपनी होती है. सरकार अफीम की शुद्धता और वजन के आधार पर किसान को भुगतान करती है.

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Published: 11 Jan, 2026 | 10:01 PM

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