Most Expensive Milk : एक ऐसी सच्चाई जो आपको हैरान कर देगी. कल्पना कीजिए कि बाजार में एक लीटर दूध की कीमत इतनी हो कि उसमें आप शहर के सबसे महंगे इलाके में एक शानदार लग्जरी गाड़ी या छोटा फ्लैट खरीद सकें. सुनने में यह किसी साइंस फिक्शन फिल्म की कहानी लग सकती है, लेकिन मेडिकल साइंस और रिसर्च की दुनिया में यह हकीकत है. जहां गाय-भैंस का दूध हमारी सेहत बनाता है, वहीं एक नन्हा सा जीव ऐसा भी है जिसका दूध जीवन रक्षक दवाओं का आधार बनता है. हम बात कर रहे हैं मादा चूहे के दूध की, जो आज दुनिया का सबसे महंगा तरल पदार्थ बना हुआ है.
सोने से भी महंगा क्यों?
चूहे का दूध (Mouse Milk) महंगा होने का सबसे बड़ा कारण इसकी उपलब्धता है. एक सामान्य गाय दिन भर में कई लीटर दूध दे सकती है, लेकिन एक मादा चूहे से कुछ मिलीलीटर दूध यानी तरल पदार्थ निकालने के लिए भी वैज्ञानिकों को पसीने छूट जाते हैं. एक लीटर दूध इकट्ठा करने के लिए हजारों चूहों की जरूरत पड़ती है और इसमें कई महीनों का समय लग सकता है. यह कोई साधारण दूध नहीं है. इसे लैब में लिक्विड गोल्ड कहा जाता है. इसकी एक-एक बूंद को इकट्ठा करने के लिए माइक्रो-सर्जिकल उपकरणों और बेहद जटिल तकनीकों का इस्तेमाल किया जाता है. यही मेहनत और दुर्लभता इसकी कीमत को 20 लाख रुपये प्रति लीटर के पार ले जाती है.
लैब की चहारदीवारी में छिपा प्रोटीन का खजाना
आखिर इस दूध में ऐसा क्या है जो इसे इतना कीमती बनाता है? दरअसल, मादा चूहे के दूध में कुछ ऐसे बायो-एक्टिव प्रोटीन और पोषक तत्व पाए जाते हैं जो प्राकृतिक रूप से किसी अन्य जीव में नहीं मिलते. वैज्ञानिक रिसर्च के अनुसार, इस दूध में मानव शरीर के लिए जरूरी कुछ विशिष्ट प्रोटीनों की सांद्रता (Concentration) बहुत अधिक होती है. विशेष रूप से जेनेटिक इंजीनियरिंग के माध्यम से तैयार किए गए चूहों के दूध का उपयोग ऐसी दवाएं बनाने में किया जाता है, जो दुर्लभ बीमारियों के इलाज में काम आती हैं. यह दूध केवल आहार नहीं, बल्कि एक जटिल केमिकल फॉर्मूला है.
कहां और कैसे निकाला जाता है यह अमृत?
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, यह दूध आपको किसी डेयरी या किराने की दुकान पर नहीं मिलेगा. इसके लिए दुनिया की सबसे बड़ी प्रयोगशालाओं जैसे हार्वर्ड मेडिकल स्कूल और जापान की RIKEN लैब में खास इंतजाम किए जाते हैं. दूध निकालने की प्रक्रिया बेहद संवेदनशील होती है. वैज्ञानिकों को चूहों को बेहोश करना पड़ता है और फिर बारीक पाइपों (Pipettes) के जरिए दूध की छोटी-छोटी बूंदें जमा करनी पड़ती हैं. यह काम इतना बारीक है कि इसे केवल विशेषज्ञ ही कर सकते हैं. अमेरिका और यूरोप के कुछ रिसर्च सेंटर्स में इस दूध का इस्तेमाल नई पीढ़ी की एंटीबायोटिक्स और हार्मोनल दवाओं के परीक्षण के लिए किया जा रहा है.
दवाइयों की दुनिया का साइलेंट हीरो
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, चूहे का दूध पीने के काम नहीं आता, बल्कि यह इलाज के काम आता है. फार्मास्युटिकल कंपनियां इसका उपयोग कैंसर, अल्जाइमर और जेनेटिक विकारों की दवाओं के रिसर्च में करती हैं. इसके अलावा, प्री-मैच्योर बच्चों के लिए जीवन रक्षक प्रोटीन विकसित करने में भी इस दूध के अवयव मददगार साबित होते हैं. चूंकि यह शोध और परीक्षण बहुत ऊंचे स्तर पर होते हैं, इसलिए इस दूध के खरीदार भी आम इंसान नहीं, बल्कि बड़ी-बड़ी रिसर्च संस्थाएं और दवा कंपनियां होती हैं.