घर की चारदीवारी से बाजार तक, पंचगव्य उत्पादों से महिलाओं की सालाना कमाई 2.5 लाख
कभी घर से बाहर निकलने में झिझकने वाली ग्रामीण महिलाएं आज अपने बनाए उत्पादों से पहचान बना रही हैं. स्वयं सहायता समूह और पंचगव्य उत्पादों ने उनकी जिंदगी बदल दी है. गोबर से बने देसी सामान और हर्बल गुलाल ने न सिर्फ आमदनी बढ़ाई, बल्कि महिलाओं को आत्मनिर्भर भी बनाया है.
Panchgavya Products : कभी जो महिलाएं घर की चारदीवारी से बाहर निकलने में झिझकती थीं, आज वही महिलाएं अपने हुनर से पहचान बना रही हैं. गांव की गलियों से निकलकर उनके बनाए प्रोडक्ट अब बाजारों तक पहुंच रहे हैं. गोमाता से जुड़े पंचगव्य उत्पादों ने न सिर्फ उनकी सोच बदली, बल्कि आमदनी का मजबूत जरिया भी बना दिया. यह कहानी है मेहनत, आत्मविश्वास और आत्मनिर्भरता की.
स्वयं सहायता समूह से मिली नई दिशा
आज के समय में जब पढ़ाई पूरी होते ही ज्यादातर युवा शहरों का रुख करते हैं, वहीं कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो गांव में रहकर ही कुछ नया करने की ठान लेते हैं. उत्तर प्रदेश के संभल जिले के गांव बनियाखेड़ा की अनुपमा सिंह भी ऐसी ही मिसाल हैं. पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने शहर जाने के बजाय अपने गांव में रहकर काम करने का फैसला किया. जानकी महिला स्वयं सहायता समूह से जुड़ते ही उनकी सोच और जिंदगी दोनों बदलने लगीं. समूह की बैठकों से उन्हें सीखने, आगे बढ़ने और आत्मनिर्भर बनने का हौसला मिला. कम ब्याज पर मिले ऋण और नियमित बचत ने उनके सपनों को मजबूत आधार दिया.
गोमय उत्पादों से बनी पहचान
प्रशिक्षण लेने के बाद अनुपमा ने घर पर ही गोबर से मूर्तियां, दीपक, अगरबत्ती, दीवार घड़ी, चौकी और मोबाइल स्टैंड बनाना शुरू किया. त्योहारों और मेलों में इन उत्पादों की अच्छी मांग होने लगी. लोगों को केमिकल से बने सामान के बजाय देसी और प्राकृतिक चीजें पसंद आने लगीं. खास बात यह है कि अनुपमा ने बाजार में बिकने वाले केमिकल रंगों से लोगों को बचाने के लिए हर्बल गुलाल भी तैयार किया. यह गुलाल पूरी तरह सुरक्षित है और होली के समय इसकी मांग तेजी से बढ़ जाती है. धीरे-धीरे उनके बनाए उत्पाद गांव और आसपास के इलाकों में पहचान बनाने लगे.
अन्य महिलाओं को भी मिला रोजगार
अनुपमा की सफलता सिर्फ उनकी अपनी कमाई तक सीमित नहीं रही. उन्होंने अपने समूह की दूसरी महिलाओं को भी काम से जोड़ा. आज कई महिलाएं उनके साथ मिलकर पंचगव्य उत्पाद बना रही हैं. इससे गांव के कई परिवारों की आय बढ़ी है और महिलाएं आत्मनिर्भर बन रही हैं. राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के तहत मिले प्रशिक्षण से उन्हें प्रोसेसिंग और पैकेजिंग की जानकारी मिली. इससे उत्पादों की गुणवत्ता बेहतर हुई और बाजार में भरोसा बढ़ा. अब हर महीने करीब 20 हजार रुपये तक की आमदनी होने लगी है और सालाना कमाई 2.5 लाख रुपये तक पहुंच रही है.
गोमाता बनीं तरक्की का आधार
अनुपमा की कहानी यह बताती है कि अगर सही मार्गदर्शन और मौका मिले, तो ग्रामीण महिलाएं भी बड़े सपने पूरे कर सकती हैं. पंचगव्य जैसे परंपरागत संसाधन आज आधुनिक रोजगार का मजबूत जरिया बन रहे हैं. अब अनुपमा को गांव से लेकर जिले तक उनके काम से जाना जाता है. उनकी सफलता कई दूसरी महिलाओं के लिए प्रेरणा बन रही है. यह कहानी साबित करती है कि आत्मनिर्भर भारत की नींव गांवों से ही मजबूत हो रही है.