अमरूद जो स्वाद और रंगत में सेब को देता है टक्कर, पाकिस्तान से लेकर ओमान तक में है डिमांड

मौजूदा वक्त में करीब 1,000 हेक्टेयर में इसकी खेती होती है. खासकर कौशांबी जिले के मुरतगंज और चइल ब्लॉकों में किसान इसकी सबसे ज्यादा खेती करते हैं. इन दोनों ब्लॉकों को उत्तर प्रदेश सरकार ने 'फ्रूट बेल्ट' घोषित किया है.

Kisan India
नोएडा | Updated On: 6 Aug, 2025 | 07:56 PM

ऐसे तो पूरे देश में बागानी की खेती होती है, लेकिन जब भी अमरूद की बात होती है, तो सबसे पहले लोगों के जेहन में इलाहाबाद का नाम उभर कर सामने आता है. क्योंकि ‘इलाहाबादी सुर्खा अमरूद’ अपने स्वाद और खुशबू के लिए भारत ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में मशहूर है. यही वजह है कि प्रयागराज तीर्थाटन करने आने वाले श्रद्धालु ‘इलाहाबादी सुर्खा अमरूद’ का आनंद लेना नहीं भूलते हैं. खास बात यह है कि इसे जीआई टैग भी मिला हुआ है.

इलाहाबादी सुर्खा अमरूद का ऊपरी हिस्सा सेब जैसा चमकीला लाल रंग लिए रहता है, लेकिन अंदर से गहरा गुलाबी और मीठी खुशबू इसे दूसरों से अलग बनाती है. इसे इलाहाबाद सेबिया या ‘हरी सोना’ भी कहा जाता है. यह सिर्फ एक फल नहीं, बल्कि यहां की सांस्कृतिक पहचान है, जिसे भौगोलिक संकेत (GI) टैग भी मिला है. इसकी तारीफ कविताओं और कहानियों में भी मिलती है. 1800 के दशक के अंत में मशहूर कवि अकबर इलाहाबादी ने इसे एक दिव्य फल बताया था, जो देवताओं की भूमि के लिए ही बना है. आज भी इसे खाने वाले लोग इसे ‘स्वर्ग का आनंद’ कहते हैं.

सुरखा अमरूद की खासियत

इस फल की शुरुआत इलाहाबाद जिले के अब्बूबकरपुर गांव में एक अनजाने पौधे से हुई थी. यह खास किस्म यहां की उपजाऊ दोआब की मिट्टी में खूब फलती-फूलती है, खासकर कौशांबी जिला और प्रयागराज के कौरिहार में किसान इसकी बड़े स्तर पर खेती करते हैं. सुर्खा अमरूद की खासियत इसे भारत में उगने वाली अन्य अमरूद की किस्मों से अलग बनाती है. जहां आमतौर पर अमरूद का अंदरूनी हिस्सा सफेद होता है, वहीं सुरखा का अंदरूनी भाग गहरा गुलाबी रंग का होता है.

कब मिला जीआई टैग

इसका स्वाद मीठा और तेज होता है. साथ ही बीज भी कम होते हैं और इसका आकार दोनों सिरे से थोड़ा दबा हुआ होता है. कहा जाता है कि संगम के जितनी नजदीक बाग होते हैं, इसकी रंगत उतनी ही ज्यादा गहरी होती है, जो इस क्षेत्र के अनोखे जलवायु और मिट्टी की खासियत को दर्शाता है. साल 2007 से 08 में ‘इलाहाबादी सुर्खा अमरूद’ को उसकी खासियत और प्रयागराज क्षेत्र से गहरे जुड़ाव के लिए प्रतिष्ठित जीआई (भौगोलिक संकेत) टैग मिला. यह टैग इलाहाबाद सुर्खा अमरूद उत्पादक कल्याण संघ के पास है, जो यह साबित करता है कि इसका स्वाद और रंग सिर्फ इसी इलाके में पाए जाते हैं और कहीं दोहराए नहीं जा सकते.

1000 हेक्टेयर में किसान करते हैं खेती

मौजूदा वक्त में करीब 1,000 हेक्टेयर में इसकी खेती होती है. खासकर कौशांबी जिले के मुरतगंज और चइल ब्लॉकों में किसान इसकी सबसे ज्यादा खेती करते हैं. इन दोनों ब्लॉकों को उत्तर प्रदेश सरकार ने ‘फ्रूट बेल्ट’ घोषित किया है. ये इलाके जिले की कुल बागवानी का लगभग 75 फीसदी उत्पादन करते हैं. नवंबर से फरवरी के पीक सीजन में यहां से रोजाना करीब 50 टन सुरखा अमरूद बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में भेजे जाते हैं.

लखनऊ से पहले बार ओमान हुआ निर्यात

इस खास अमरूद की लोकप्रियता अब भारत तक ही सीमित नहीं रही. जनवरी 2024 में उत्तर प्रदेश सरकार ने पहली बार इलाहाबादी सुर्खा को लखनऊ से ओमान एक्सपोर्ट कर इतिहास रच दिया. इसके अलावा पाकिस्तान और सऊदी अरब में भी इलाहाबादी सुर्खा अमरूद की मांग बहुत है. इसका रेट सेब के बराबर होता है. ऐसे यह 100 से 120 रुपये किलो बिकता है. मौजूदा वक्त में सुर्खा अमरूद का बढ़ावा देने के लिए कृषि वैज्ञानिकों और नई तकनीकों, जैसे फल बैगिंग (जिससे फल का आकार बेहतर होता है और कीटों से सुरक्षा मिलती है), का भी सहयोग लिया जा रहा है. इसका मकसद किसानों की आमदनी बढ़ाना और दुनिया को इस लाजवाब अमरूद का स्वाद चखाना है.

सुरखा अमरूद से जुड़े फैक्ट्स

  • साल 2007 में मिला जीआई टैग
  • प्रयागराज और कौशांबी जिले में होती है खेती
  • कीमत 100 से 120 रुपये किलो
  • 1,000 हेक्टेयर में किसान करते हैं इसकी खेती
  • रोजाना करीब 50 टन सुरखा अमरूद दूसरे  राज्यों में होता है निर्यात
  • विदेशों में भी होता है सुर्खा अमरूद का निर्यात

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Published: 6 Aug, 2025 | 07:43 PM
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