अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन द्वारा 50 फीसदी टैरिफ लगाए जाने से पंजाब और हरियाणा के बासमती चावल उत्पादक और निर्यातक काफी परेशान हैं. उन्हें डर है कि इससे अमेरिका को होने वाला बासमती निर्यात बुरी तरह प्रभावित होगा, जबकि पड़ोसी पाकिस्तान को बड़ा फायदा मिल सकता है. यह भारी टैरिफ दर ट्रंप के 7 अगस्त के कार्यकारी आदेश के बाद लागू हुई. इसमें भारत द्वारा रूस से तेल खरीदने पर 25 फीसदी की अतिरिक्त सजा के रूप में टैक्स जोड़ा गया, जो पहले से ही लागू 25 फीसदी टैक्स के साथ मिलकर कुल 50 फीसदी हो गया. यह नियम 28 अगस्त से लागू हो जाएगा.
हिन्दुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, बासमती एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन के उपाध्यक्ष, रंजीत सिंह जोसन ने इसे ‘डबल झटका’ बताया है. उन्होंने कहा कि भारत हर साल अमेरिका को लगभग 3 लाख टन बासमती चावल (करीब $350 मिलियन मूल्य का) निर्यात करता है. इतने भारी टैक्स से भारतीय निर्यातकों को बड़ा नुकसान होगा. जबकि पाकिस्तान पर सिर्फ 19 फीसदी टैक्स है. वह इस मौके का फायदा उठाकर बाजार में अपनी पकड़ मज़बूत कर सकता है. हालाकि, स्मार्टफोन और दवा जैसे सेक्टर्स जहां ट्रंप प्रशासन के टैरिफ से छूट मिली है. वहीं बासमती चावल को पूरी तरह से अमेरिका की सजा झेलनी पड़ रही है.
ट्रंप ने भारतीय आयात पर टैक्स 26 फीसदी से बढ़ाकर 50 फीसदी कर दिया, जबकि पाकिस्तानी आयात पर टैरिफ 29 फीसदी से घटाकर 19 फीसदी कर दिया, जिससे भारतीय बासमती चावल 31 फीसदी ज्यादा महंगा हो गया है. रंजीत सिंह जोसन कहते हैं कि भारत का नुकसान, पाकिस्तान का फायदा बन गया है. उन्होंने कहा कि पाकिस्तान के व्यापारी पहले ही अमेरिका से ऑर्डर लेने लगे हैं, जबकि भारतीय व्यापारी कीमत के अंतर की वजह से कोई डील नहीं कर पा रहे हैं. उदाहरण के तौर पर अगर अमेरिका में बासमती चावल की कीमत 1,200 डॉलर प्रति टन है, तो भारत से मंगवाने पर अतिरिक्त 600 डॉलर टैक्स देना पड़ेगा, जबकि पाकिस्तान से यही चावल मंगवाने पर सिर्फ 228 डॉलर टैक्स लगेगा. जोसन ने कहा कि इस वक्त हम अमेरिका में अपना चावल बेच ही नहीं सकते.
नई टैरिफ नीति ऐसे समय में आई है जब बासमती चावल का बाजार पहले से ही संकट में है. पिछले कुछ सालों में बासमती की कीमतें लगातार गिर रही हैं. लोकप्रिय किस्में जैसे 1121 और 1509, जो 2022-23 में 4,500 रुपये प्रति क्विंटल बिकती थीं, अब 2023-24 में 3,500-3,600 रुपये तक आ चुकी हैं और इंडस्ट्री को डर है कि ये 3,000 रुपयये तक भी गिर सकती हैं. इस गिरावट का सीधा असर किसानों की रुचि पर पड़ रहा है. तरण तारण (पंजाब) के किसान गुरबक्षीश सिंह का कहना है कि अगर कीमतें ऐसे ही गिरती रहीं तो किसान बासमती छोड़कर साधारण धान की खेती की तरफ लौट सकते हैं, जिसका एमएसपी (न्यूनतम समर्थन मूल्य) अब 2,400 रुपये प्रति क्विंटल से ऊपर है.
गुरबक्षीश सिंह का परिवार सालों से बासमती की खेती कर रहा है, लेकिन अब कीमतों में स्थिरता ना होने के कारण वह चिंतित हैं. इस अनिश्चितता का असर खेती के आंकड़ों में भी दिखने लगा है. पंजाब में बासमती की खेती का रकबा 2015-16 में 7.63 लाख हेक्टेयर था, जो अब 2024-25 में घटकर 6.39 लाख हेक्टेयर रह गया है. 1509, 1121 और 1718 जैसी प्रमुख किस्में, जो कुल बासमती क्षेत्रफल का 80 फीसदी से अधिक कवर करती हैं, अब भी किसानों को घटती कीमतों से जूझने पर मजबूर कर रही हैं.
हरियाणा में बासमती की खेती का रकबा पिछले कुछ सालों में 6.5 से 7.1 लाख हेक्टेयर के बीच रहा है, और 2025 में यह 6.8 लाख हेक्टेयर दर्ज किया गया है. पंजाब और हरियाणा की बासमती दुनियाभर में मशहूर है. खासकर 1121 और 1509 जैसी किस्में, जो भारत के कुल बासमती निर्यात का 40 फीसदी हिस्सा बनाती हैं. पंजाब अकेले देश के कुल बासमती चावल का लगभग 40 फीसदी उत्पादन करता है. हरियाणा के करनाल जिले के बदशाहपुर गांव के किसान, जगदीप सिंह औलख का कहना है कि अमेरिका को जाने वाला बासमती निर्यात भारत के कुल निर्यात का सिर्फ एक छोटा हिस्सा है, लेकिन इसका असर पूरे व्यापार और खेती के पैटर्न पर पड़ता है.
रंजीत सिंह जोसन के मुताबिक, इस स्थिति से छोटे निर्यातक, जिनका सालाना कारोबार 100 करोड़ रुपये के आसपास है, सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं. उन्होंने किसानों से खरीदी की कीमतें 7,100 रुपये से घटाकर 6,200 रुपये प्रति क्विंटल कर दी हैं. इससे देश के अंदर थोक बाजार में दाम 71 रुपये से गिरकर 62 रुपये प्रति किलो हो गए हैं और रिटेल मार्केट में भी जल्द गिरावट देखने को मिल सकती है. मिल मालिकों के गोदामों में अनबिके बासमती चावल का स्टॉक जमा हो गया है, जिससे उन्हें भारी घाटा हो रहा है.