Tamil Nadu News: तमिलनाडु के धर्मपुरी जिले के हरूर और पप्पिरेड्डीपट्टी इलाके में गन्ना किसान परेशान हैं. गन्ने की कटाई और मिल तक ढुलाई की मजदूरी इस साल बढ़कर करीब 1,350 रुपये प्रति टन हो गई है. पिछले साल यही खर्च 850 रुपये था. बढ़ी लागत से किसानों की कमाई घट रही है. इसलिए उन्होंने मिल प्रशासन से मजदूरी पर सब्सिडी की मांग की है. किसानों का कहना है कि बढ़ती लागत के कारण उनकी कमाई का बड़ा हिस्सा मजदूरी में ही चला जा रहा है.
गोपालापुरम स्थित सुब्रमणिया शिवा को-ऑपरेटिव शुगर मिल ने पिछले महीने पेराई शुरू की है, जहां करीब 1.04 लाख टन गन्ने की पेराई होने की उम्मीद है. लेकिन मजदूरी दरों में तेज उछाल ने किसानों की चिंता बढ़ा दी है. गन्ने का दाम 3,650 रुपये प्रति टन तय है (राज्य सरकार की सहायता राशि के बिना), लेकिन इसमें से लगभग आधी रकम मजदूरी खर्च में चली जा रही है. किसानों का कहना है कि अगर यही हाल रहा तो उन्हें घाटा उठाना पड़ सकता है.
इलाके में मजदूरों की भारी कमी है
हरूर के किसान पी. मूर्ति ने कहा कि इलाके में मजदूरों की भारी कमी है, जिसकी वजह से लागत लगातार बढ़ रही है. उनके अनुसार, अभी मजदूरी 1,350 रुपये प्रति टन है, लेकिन सीजन के अंत तक यह 1,700 रुपये तक पहुंच सकती है. ऐसे में गन्ने की खेती करना दिन-ब-दिन मुश्किल होता जा रहा है और किसानों को गंभीर नुकसान का सामना करना पड़ सकता है.
इतने मजदूरों की पड़ती है जरूरत
पप्पिरेड्डीपट्टी के किसान एस. विजयकुमार ने कहा कि एक एकड़ गन्ने के खेत से करीब 45 से 50 टन उत्पादन होता है और इसके लिए लगभग 15 मजदूरों की जरूरत पड़ती है. मजदूर गन्ने की कटाई, छंटाई, सफाई, बंडल बनाने और मिल तक लोडिंग का काम करते हैं. पूरे खेत को साफ करने में करीब दो दिन लगते हैं. उन्होंने कहा कि मजदूरों को ज्यादा मेहनताना मिलने से कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन मजदूरी में अचानक हुई बढ़ोतरी ने किसानों को चौंका दिया है. किसानों को उम्मीद थी कि खर्च करीब 1,000 रुपये प्रति टन रहेगा, लेकिन इससे कहीं ज्यादा बढ़ गया.
किसान प्रशासन से मजदूरी लागत में मदद की मांग कर रहे हैं
हरूर के किसान एम. सेल्वराज ने कहा कि वे पिछले कुछ सालों से मिल प्रशासन से मजदूरी लागत में मदद की मांग कर रहे हैं. अगर सब्सिडी के रूप में सहायता मिल जाए, तो किसानों पर पड़ने वाला आर्थिक बोझ कुछ हद तक कम हो सकता है. इस मुद्दे पर सुब्रमणिया शिवा को-ऑपरेटिव शुगर मिल की प्रबंध निदेशक आर. प्रिया ने कहा कि इसमें मिल की कोई गलती नहीं है. मजदूर किसान खुद रखते हैं और मजदूरी दर भी आपस में तय करते हैं. उन्होंने यह भी बताया कि पोंगल से पहले गन्ने की कटाई जल्दी कराने की होड़ के कारण मजदूर ज्यादा पैसे मांग रहे हैं. वहीं, किसानों द्वारा मांगी जा रही सब्सिडी पर अधिकारियों ने साफ कहा कि यह उनके अधिकार क्षेत्र में नहीं आता और यह सरकार की नीतिगत फैसला है.