नए साल की शुरुआत के साथ ही देश की चीनी इंडस्ट्री में एक अहम नीतिगत बदलाव देखने को मिला है. केंद्र सरकार ने जनवरी महीने के लिए घरेलू बाजार में चीनी की बिक्री का कोटा घटा दिया है. दिलचस्प बात यह है कि यह फैसला ऐसे समय में आया है, जब 2025-26 सीजन में चीनी उत्पादन बढ़ने का अनुमान है. यानी एक तरफ उत्पादन में तेजी है, तो दूसरी ओर मांग में सुस्ती ने सरकार और उद्योग दोनों की चिंता बढ़ा दी है.
जनवरी के लिए बिक्री कोटा 2.2 फीसदी घटा
बिजनेस लाइन की रिपोर्ट के अनुसार, केंद्र सरकार ने जनवरी 2026 के लिए घरेलू बिक्री हेतु 22 लाख टन चीनी आवंटित की है. यह पिछले साल जनवरी के मुकाबले 2.2 फीसदी कम है, जब 22.5 लाख टन चीनी बाजार में बेचने की अनुमति दी गई थी. सरकार हर महीने मिलों को बिक्री कोटा देती है, ताकि बाजार में कीमतों को संतुलित रखा जा सके और किसानों को समय पर भुगतान हो सके.
शुरुआती चार महीनों में कुल आवंटन भी कम
अगर पूरे सीजन की बात करें, तो अक्टूबर से जनवरी तक यानी पहले चार महीनों में कुल 88 लाख टन चीनी की घरेलू बिक्री को मंजूरी दी गई है. यह आंकड़ा पिछले सीजन की इसी अवधि के मुकाबले 4.3 फीसदी कम है. उत्पादन बढ़ने के बावजूद कोटा घटने से साफ है कि सरकार मांग को लेकर सतर्क रुख अपनाए हुए है.
मांग कमजोर, बिक्री पर असर
उद्योग सूत्रों के अनुसार इस साल चीनी की मांग अपेक्षा से कमजोर रही है. अक्टूबर-नवंबर के दौरान वास्तविक बिक्री पिछले साल की तुलना में करीब 50 हजार टन कम रही. कम मांग और ज्यादा उत्पादन के इस मेल ने सरकार के लिए चीनी प्रबंधन को और जटिल बना दिया है. बाजार में अतिरिक्त चीनी आने का खतरा बना हुआ है, जिससे कीमतों पर दबाव पड़ सकता है.
किसानों के भुगतान को लेकर चिंता
चीनी उद्योग पहले ही आगाह कर चुका है कि अगर बिक्री और नकदी प्रवाह में सुधार नहीं हुआ, तो गन्ना किसानों के भुगतान में देरी हो सकती है. मिलों की आय सीधे तौर पर बिक्री कोटे और बाजार भाव पर निर्भर करती है. ऐसे में कोटा घटने का असर किसानों तक भी पहुंच सकता है.
राज्यों के बीच कोटे में अंतर
सरकार के मिल-वार कोटा आदेश से पता चलता है कि इस बार राज्यों के बीच आवंटन में असमानता देखने को मिली है. कर्नाटक की चीनी मिलों को जनवरी में 3,49,588 टन चीनी बेचने की अनुमति दी गई है, जबकि पिछले साल यह आंकड़ा 4,25,348 टन था. यानी कर्नाटक का कोटा करीब 18 फीसदी घटा है.
इसके उलट, दो बड़े उत्पादक राज्यों उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र को ज्यादा कोटा मिला है. उत्तर प्रदेश की मिलों को 7.06 लाख टन का घरेलू बिक्री कोटा दिया गया है, जो पिछले साल के 6.86 लाख टन से 2.8 फीसदी अधिक है. वहीं महाराष्ट्र को 8.57 लाख टन का कोटा मिला है, जो 4.7 फीसदी की बढ़ोतरी को दर्शाता है.
कोटा घटने की असली वजह क्या है
उद्योग से जुड़े जानकारों का कहना है कि कर्नाटक में किसानों के आंदोलन का इस फैसले से कोई लेना-देना नहीं है. कोटा आवंटन एक तय फार्मूले के तहत किया जाता है, जो सभी राज्यों पर समान रूप से लागू होता है. कुछ मिलों ने अपने घरेलू बिक्री कोटे को अन्य राज्यों की मिलों के निर्यात कोटे से आपस में बदल लिया है, और इसी वजह से अंतिम आंकड़ों में अंतर दिख रहा है.
उदाहरण के तौर पर, कर्नाटक की समीरवाड़ी चीनी मिल ने 12 हजार टन से अधिक का घरेलू कोटा सरेंडर कर दिया और बदले में अन्य राज्यों की मिलों से निर्यात कोटा हासिल किया. इसके बाद इस मिल का निर्यात कोटा बढ़कर 35,449 टन हो गया. इसी तरह महाराष्ट्र की कुछ सहकारी मिलों ने भी घरेलू कोटे के बदले अपना निर्यात कोटा बढ़ाया है.
उत्पादन रिकॉर्ड स्तर की ओर
2025-26 सीजन में देश का कुल चीनी उत्पादन 343 लाख टन तक पहुंचने का अनुमान है, जो पिछले सीजन के 300 लाख टन से काफी अधिक है. इस साल निर्यात कोटा भी बढ़ाकर 15 लाख टन कर दिया गया है, जबकि पिछले साल यह 10 लाख टन था.
हालांकि, एथनॉल के लिए चीनी का उपयोग घट गया है. इस बार एथनॉल कोटा 29 लाख टन रखा गया है, जो पिछले साल 35 लाख टन था. चूंकि सी-हैवी मोलासेस से एथनॉल बनाना ज्यादा फायदेमंद होता है, इसलिए मिलें इस साल गन्ने से सीधे एथनॉल बनाने की बजाय ज्यादा चीनी उत्पादन पर जोर दे रही हैं.
शुरुआती महीनों में उत्पादन तेज
उद्योग संगठननेशनल फेडरेशन ऑफ कोऑपरेटिव शुगर फैक्ट्रीज लिमिटेड (एनएफसीएसएफ) के अनुसार, अक्टूबर से दिसंबर 2025 के बीच देश में 118.3 लाख टन चीनी का उत्पादन हुआ है. यह पिछले साल की समान अवधि के 95.60 लाख टन से करीब 24 फीसदी ज्यादा है.
राज्यवार आंकड़ों पर नजर डालें तो महाराष्ट्र में अब तक 48.70 लाख टन, उत्तर प्रदेश में 35.65 लाख टन और कर्नाटक में 22.10 लाख टन चीनी का उत्पादन हो चुका है. हालांकि बिहार, हरियाणा, मध्य प्रदेश, तेलंगाना और तमिलनाडु में उत्पादन में गिरावट दर्ज की गई है.